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    सूरए नहल, आयतें 125-128, (कार्यक्रम 473)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 125 की तिलावत सुनें।ادْعُ إِلَى سَبِيلِ رَبِّكَ بِالْحِكْمَةِ وَالْمَوْعِظَةِ الْحَسَنَةِ وَجَادِلْهُمْ بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ بِمَنْ ضَلَّ عَنْ سَبِيلِهِ وَهُوَ أَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِينَ (125)(हे पैग़म्बर! लोगों को) तत्वदर्शी बातों तथा अच्छे उपदेश द्वारा अपने पालनहार के मार्ग की ओर बुलाइये और (विरोधियों के साथ) उस पद्धति से शास्त्रार्थ किजिए जो सबसे अच्छी है। निसंदेह आपका पालनहार उन लोगों के बारे में अधिक ज्ञान रखता है जो उसके मार्ग से विचलित हो गए हैं और वह मार्गदर्शित लोगों के बारे में भी अधिक जानकारी रखता है। (16:125)इस आयत में और इसके बाद की कुछ आयतों में जो सूरए नहल की अंतिम आयतें हैं, पैग़म्बर तथा सभी मुस्लिम बुद्धिजीवियों और प्रशिक्षकों से सिफ़ारिश की गई है कि लोगों को ईश्वर और सत्य के मार्ग की ओर बुलाने में उचित शैलियों से लाभ उठाएं क्योंकि स्पष्ट सी बात है कि सभी लोगों को एक ही पद्धति से किसी बात के लिए आमंत्रित नहीं किया जा सकता। हर किसी के साथ उसी की भाषा और उसकी समझ व योग्यता के अनुसार बात करनी चाहिए। बुद्धिजीवियों और शिक्षित लोगों के साथ तर्क की भाषा में, साधारण लोगों के साथ अच्छे उपदेश द्वारा और हठधर्मी लोगों के साथ प्रभावी एवं द्विपक्षीय संवाद और शास्त्रार्थ के माध्यम से बात करनी चाहिए।तत्वदर्शिता पूर्ण शैली का निमंत्रण सदैव अच्छा व स्वीकार्य होता है क्योंकि तर्क प्रस्तुत करने की शैली, जो बुद्धि पर आधारित होती है, संवाद तथा वैचारिक व वैज्ञानिक मामलों में सभी बुद्धिमान लोगों की बातों का आधार होती है किंतु उपदेश और शास्त्रार्थ संभावित रूप से अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी हो सकता है। इसी कारण क़ुरआने मजीद की इस आयत में अच्छे उपदेश और अच्छे शास्त्रार्थ की सिफ़ारिश की गई है क्योंकि संभव है कि उपदेशक अपनी बड़ाई जताने और दूसरे के अपमान के उद्देश्य से उपदेश दे। इस स्थिति में उसकी बात का प्रभाव होने के स्थान पर प्रतिकूल परिणाम सामने आता है और जिसे उपदेश दिया जा रहा है उसकी भावनाएं आहत होती हैं और वह उपदेशक के प्रति घृणा का आभास करता है।इसी प्रकार बहस और शास्त्रार्थ के संबंध में क़ुरआन मजीद की सिफ़ारिश है कि तुम्हारी बहस की शैली दूसरे पक्ष से बेहतर होनी चाहिए क्योंकि वास्तविक लक्ष्य विवाद, टकराव और हठधर्मी नहीं बल्कि उससे अपनी बात मनवाना और उसे अपनी ओर आकृष्ट करना है। विरोधियों के साथ बहस और शास्त्रार्थ सत्य, न्याय और सच्चाई पर आधारित होना चाहिए न कि धोखे, अपमान, अनादर और डांटने डपटने पर।आगे चलकर आयत कहती है कि पैग़म्बर का दायित्व लोगों को निमंत्रण देना है और कौन उसे स्वीकार करता है और कौन अस्वीकार कर देता है, इससे पैग़म्बर का कोई संबंध नहीं है और ईश्वर इस बात को भली भांति जानता है कि किसने हृदय से सत्य को स्वीकार किया है और किसने स्वीकार नहीं किया है।इस आयत से हमने सीखा कि धर्म का प्रचार विभिन्न शैलियों में लोगों की परिस्थितियों व आवश्यकताओं के अनुसार होना चाहिए ताकि उसका सही प्रभाव पड़ सके।लोगों को ईश्वर के मार्ग पर बुलाने के लिए बौद्धिक व भावनात्मक दोनों शैलियों का प्रयोग किया जाना चाहिए ताकि उसका प्रभाव स्थाई रहे।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 126 की तिलावत सुनें।وَإِنْ عَاقَبْتُمْ فَعَاقِبُوا بِمِثْلِ مَا عُوقِبْتُمْ بِهِ وَلَئِنْ صَبَرْتُمْ لَهُوَ خَيْرٌ لِلصَّابِرِينَ (126)और यदि तुम (किसी अत्याचारी को) दण्डित करो तो केवल उसी मात्रा में दण्डित करो जितना तुम्हें दण्डित किया गया है और यदि तुम धैर्य से काम लो तो निश्चित रूप से यह काम धैर्यवानों के लिए सर्वोत्तम है। (16:126)पिछली आयत में विरोधियों के साथ उचित शैली में बहस व शास्त्रार्थ करने की सिफ़ारिश करने के पश्चात इस आयत मे ईश्वर कहता है कि यदि वे इससे आगे बढ़ जाएं और अत्याचार करें तो तुम भी उनके उत्तर में उन्हीं जैसा व्यवहार अपना सकते हो किंतु यदि तुम उन्हें दंडित न करते हुए संयम से काम लो तो यह तुम्हारे हित में है।इतिहास में वर्णित है कि उहुद नामक युद्ध में पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के चाचा हज़रत हमज़ा अलैहिस्सलाम की शहादत और उनके शरीर के अंगों को काटे जाने के पश्चात ईश्वर की ओर से यह आयत आने के बाद पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने कहा कि वे संयम से काम लेंगे और हज़रत हमज़ा के हत्यारे को क्षमा कर देंगे।इस आयत से हमने सीखा कि अपने विरोधियों और शत्रुओं तक के साथ न्याय से काम लेना चाहिए और उन पर अत्याचार नहीं करना चाहिए।जो आनंद संयम में है वह प्रतिशोध में नहीं है। विरोधियों के संबंध में केवल क़ानून का सहारा लेना सदैव ही लाभदायक नहीं होता बल्कि शिष्टाचार और नैतिकता का पालन भी आवश्यक है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 127 और 128 की तिलावत सुनें।وَاصْبِرْ وَمَا صَبْرُكَ إِلَّا بِاللَّهِ وَلَا تَحْزَنْ عَلَيْهِمْ وَلَا تَكُ فِي ضَيْقٍ مِمَّا يَمْكُرُونَ (127) إِنَّ اللَّهَ مَعَ الَّذِينَ اتَّقَوْا وَالَّذِينَ هُمْ مُحْسِنُونَ (128)और (हे पैग़म्बर!) संयम से काम लीजिए और आपका संयम ईश्वर की सहायता से ही (संभव) है। और न तो उनके लिए दुखी होइए और न ही उनकी चालों से अपना दिल छोटा कीजिए। (16:127) निश्चित रूप से ईश्वर उन लोगों के साथ है जो उससे डरते हैं और भले कर्म करते हैं। (16:128)स्पष्ट है कि कुछ लोग द्वेष और हठधर्म के कारण सत्य को स्वीकार करने और अपने दायित्व को मानने के लिए तैयार नहीं होते चाहे वे पैग़म्बरों जैसे सबसे पवित्र लोगों की ज़बान से ही सत्य को क्यों न सुन लें। अतः यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को सांत्वना देते हुए कहती है कि यद्यपि आपने इन लोगों के मार्गदर्शन के लिए अत्यधिक कठिनाइयां सहन की हैं किंतु अंततः न केवल यह कि कुछ लोग सत्य को स्वीकार नहीं करेंगे बल्कि उसका विरोध करने पर उतर आएंगे।वे आरोप लगा कर, परिहास करके, धमकी देकर, यातनाएं देकर, युद्ध आरंभ करके और रक्तपात करके ईश्वरीय धर्म इस्लाम को मिटाने का प्रयास करेंगे किंतु आप इससे दुखी व चिंतित न हों बल्कि अपने अभियान पर दृढ़ता के साथ डटे रहिए क्योंकि ईश्वर पवित्र लोगों का समर्थक व सहायक है और किसी भी स्थिति में उन्हें अकेला नहीं छोड़ता।इन आयतों से हमने सीखा कि धर्म के प्रचार और लोगों के मार्गदर्शन के संबंध में अत्यधिक संयम से काम लेना और कठिनाइयों को सहन करना चाहिए।ईश्वर पर भरोसा करना तथा उसकी गुप्त सहायताओं पर ईमान रखना चाहिए ताकि शत्रुओं के साथ सहृदयता का व्यवहार किया जा सके और कठिनाइयों के संबंध में धैर्य व संयम से काम लिया जा सके।