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    सूरए नहल, आयतें 17-21, (कार्यक्रम 447)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 17 और 18 की तिलावत सुनें।أَفَمَنْ يَخْلُقُ كَمَنْ لَا يَخْلُقُ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ (17) وَإِنْ تَعُدُّوا نِعْمَةَ اللَّهِ لَا تُحْصُوهَا إِنَّ اللَّهَ لَغَفُورٌ رَحِيمٌ (18)तो क्या जो रचना करता है वह उसके समान हो सकता है जो रचना नहीं करता? क्या तुम विचार नहीं करते? (16:17) और यदि तुम ईश्वर की अनुकंपाओं को गिनना चाहो तो उन्हें गिन नहीं सकते, निश्चित रूप से ईश्वर अत्यंत क्षमाशील एवं दयावान है। (16:18)सूरए नहल के आरंभ से यहां तक धरती व आकाश में कुछ ईश्वरीय अनुकंपाओं तथा विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों एवं पशुओं का उल्लेख किया गया। ये आयतें कहती हैं कि ईश्वरीय अनुकंपा केवल इन्हीं वस्तुओं में सीमित नहीं है बल्कि उनकी संख्या इतनी अधिक है कि कोई भी उन्हें गिनने में सक्षम नहीं है। तो फिर कुछ अज्ञानी लोग किस प्रकार ईश्वर की ओर से निश्चेत हो कर प्रतिमाओं, लोगों, पशुओं एवं अन्य वस्तुओं की उपासना करते हैं?क्या ये निर्जीव या जीवंत वस्तुएं, जो स्वयं ही किसी की रचना हैं और किसी वस्तु की रचना करने की क्षमता नहीं रखतीं, इस योग्य हैं कि रचयिता ईश्वर की भांति इन्हें देखा जाए और इनकी उपासना की जाए?चूंकि पैग़म्बरों का एक महत्वपूर्ण दायित्व, लोगों को सचेत करना तथा उनकी अंतरात्मा एवं वास्तविक प्रवृत्ति को जगाना है, अतः ये आयतें प्रश्न के रूप में यह विषय प्रस्तुत करती हैं ताकि अनेकेश्वरवादी स्वयं चिंतन करें तथा इन स्पष्ट प्रश्नों के उत्तर खोजें।इन आयतों से हमने सीखा कि अन्य लोगों को ईश्वर की पहचान तथा उसकी उपासना का निमंत्रण देने में उनकी अंतरात्मा को झिंझोड़ना चाहिए ताकि सोई हुई बुद्धि व प्रवृत्ति जाग जाए और वे स्वयं ही इस निष्कर्ष तक पहुंच जाएं कि ईश्वर के अतिरिक्त किसी की उपासना नहीं की जा सकती।ईश्वर की पहचान एक बहुत ही स्वाभाविक बात है और इसके लिए दार्शनिक तर्क लाने की नहीं बल्कि केवल टोकने और याद दिलाने की आवश्यकता है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 19 की तिलावत सुनें।وَاللَّهُ يَعْلَمُ مَا تُسِرُّونَ وَمَا تُعْلِنُونَ (19)और ईश्वर हर उस बात से अवगत है जिसे तुम छिपाते या प्रकट करते हो। (16:19)ईश्वरीय अनुकंपाओं के उल्लेख तथा उनके रचयिता की पहचान की आवश्यकता पर बल दिए जाने के बाद इस आयत में कहा गया है कि ईश्वर न केवल यह कि सभी का रचयिता है बल्कि वह हर बात की ज्ञानी भी है तथा अपनी रचनाओं की हर बात से पूर्ण रूप से अवगत है।ऐसा नहीं है कि ईश्वर ने अपनी रचनाओं की सृष्टि करने के बाद उन्हें उनकी स्थिति पर छोड़ दिया है, बल्कि वह उनकी क्षण-क्षण की परिस्थितियों से अवगत है और कोई भी बात उससे छिपी हुई नहीं है। विशेष कर मनुष्यों के द्वारा चयन तथा किए गए कर्मों से वह पूर्णतः अवगत है। ईश्वर कार्यों के संबंध में उनकी भावनाओं व प्रेरकों से भी, जो अन्य लोगों से छिपी हुई होती हैं, अवगत है तथा इसी के आधार पर उनके संबंध में निर्णय करता है।इस आयत से हमने सीखा कि यदि हम यह विश्वास कर लें कि ईश्वर हमारे सभी कर्मों से अवगत है तो हम बुराइयों से दूर हो जाएंगे।ईश्वर के निकट गुप्त व प्रकट का कोई अर्थ नहीं है, हर वस्तु उसके निकट एक समान है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 20 और 21 की तिलावत सुनें।وَالَّذِينَ يَدْعُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ لَا يَخْلُقُونَ شَيْئًا وَهُمْ يُخْلَقُونَ (20) أَمْوَاتٌ غَيْرُ أَحْيَاءٍ وَمَا يَشْعُرُونَ أَيَّانَ يُبْعَثُونَ (21)और जिन्हें वे ईश्वर के सिवा पुकारते हैं, वे तो स्वयं किसी वस्तु की रचन नहीं करते बल्कि वे तो स्वयं रचे जाते हैं। (16:20) वे जीवित नहीं बल्कि मरे हुए हैं और उन्हें तो यह भी ज्ञात नहीं है कि वे पुनः कब उठाए जाएंगे। (16:21)ये आयतें एक बार पुनः उसी बिंदु पर बल देते हुए जिसका वर्णन पिछली आयत में किया गया था, कहती हैं कि क्यों अनेकेश्वरवादी ऐसी मूर्तियों एवं वस्तुओं की उपासना करते हैं जो स्वयं निर्जीव एवं शक्तिहीन रचनाएं हैं, जो न तो रचना की क्षमता रखती हैं और न किसी को जीवन प्रदान कर सकती हैं।क्या यह संभव है कि जो वस्तु स्वयं ही निर्जीव हो वह किसी अन्य को जीवन प्रदान कर सके? इन वस्तुओं को तो अपने अंत के बारे में भी कुछ पता नहीं है कि उनके साथ क्या होगा? तो फिर किस प्रकार ये निर्जीव वस्तुएं हम मनुष्यों के भविष्य के बारे में प्रभावी हो सकती हैं?शायद कुछ लोग यह सोचें कि ये आयतें पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के काल के अनेकेश्वरवादियों के बारे में हैं और अब इनकी प्रासंगिकता समाप्त हो गई है किंतु वास्तविकता यह है कि आज के विकसित संसार में भी अनेक स्थानों पर करोड़ों लोग प्रतिमाओं की उपासना करते हैं तथा ईश्वर एवं प्रलय पर विश्वास नहीं रखते।इन आयतों से हमने सीखा कि वह ईश्वर पूजनीय है जो ज्ञान, शक्ति व जीवन रखता हो, प्रतिमाओं में ये विशेषताएं नहीं पाई जातीं।प्रलय के दिन, पूजी जाने वाली प्रतिमाओं को भी लाया जाएगा जो अपने पूजने वालों के विरुद्ध गवाही देंगी।