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    सूरए नहल, आयतें 22-25, (कार्यक्रम 448)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 22 और 23 की तिलावत सुनें।إِلَهُكُمْ إِلَهٌ وَاحِدٌ فَالَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْآَخِرَةِ قُلُوبُهُمْ مُنْكِرَةٌ وَهُمْ مُسْتَكْبِرُونَ (22) لَا جَرَمَ أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ مَا يُسِرُّونَ وَمَا يُعْلِنُونَ إِنَّهُ لَا يُحِبُّ الْمُسْتَكْبِرِينَ (23)तुम्हारा पालनहार, अनन्य ईश्वर है तो जो लोग प्रलय के दिन पर ईमान नहीं रखते, उनके हृदय (सत्य का) इन्कार करते हैं, और यही लोग अहंकारी हैं। (16:22) निश्चित रूप से जो कुछ वे छिपाते हैं और जो कुछ प्रकट करते हैं, ईश्वर उससे अवगत है, निसंदेह वह अहंकारियों को पसंद नहीं करता। (16:23)इससे पहले क़ुरआने मजीद की आयतों में वस्तुओं की रचना में ईश्वर के अतिरिक्त सभी के अक्षम होने की बात की गई थी। ये आयतें कहती हैं कि काल्पनिक और झूठे देवता नहीं बल्कि अनन्य ईश्वर ही उपासना के योग्य है। आगे चलकर आयतें प्रलय के दिन के इन्कार का मुख्य कारण, द्वेष, हठधर्मी, अहंकार तथा सत्य के प्रति घमण्ड की भावना है। इसी प्रकार जो बात ईमान वालों के सही मार्ग पर आने का कारण बनी है वह उनका सत्य प्रेम तथा सत्य को स्वीकार करने की भावना है।जो लोग स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझते हैं, वे सत्य को स्वीकार करने के स्थान पर सदैव उसके इन्कार का प्रयास करते हैं चाहे उन्हें यह ज्ञात ही हो कि उनकी बात तथा उनके कर्म सही नहीं हैं किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि लोग यह नहीं समझते कि उनके सभी कर्म एवं विचार, ईश्वर की दृष्टि में हैं और कोई भी बात उससे छिपी हुई नहीं है।इन आयतों से हमने सीखा कि कुफ़्र तथा ईश्वर के इन्कार का मुख्य कारण, अज्ञानता नहीं अहंकार है, वास्तविकता से अनभिज्ञ होना नहीं बल्कि वास्तविकता के प्रति घमण्ड है।प्रलय पर आस्था, मनुष्य को विनम्र बना देती है और इसी प्रकार प्रलय के इन्कार का कारण घमण्ड एवं अहंकार है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 24 की तिलावत सुनें।وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ مَاذَا أَنْزَلَ رَبُّكُمْ قَالُوا أَسَاطِيرُ الْأَوَّلِينَ (24)और जब उनसे पूछा जाता है कि तुम्हारे पालनहार ने क्या उतारा है तो वे कहते हैं कि ये तो पिछले लोगों की कहानियां हैं। (16:24)हमें ज्ञात है कि क़ुरआने मजीद सृष्टि के आरंभ व अंत, प्रलय तथा लोगों के धार्मिक कर्तव्यों के बारे में ईश्वरीय आदेशों की किताब है। इसके अतिरिक्त इसमें व्यक्तिगत, पारिवारिक तथा सामाजिक व्यवहारों के संबंध में इस्लामी शिष्टाचार का भी वर्णन है। इसी प्रकार क़ुरआने मजीद की कु छ आयतों में पिछली जातियों के इतिहास का भी वर्णन है।जो लोग इन्कार एवं द्वेष की भावना के साथ क़ुरआने मजीद को देखते हैं वे उसकी सभी शिक्षाओं एवं नैतिकताओं की अनदेखी करते हुए केवल उसमें वर्णित पिछली जातियों के इतिहास पर ध्यान देते हैं और उसे कहानी बताते हैं जबकि कहानियां प्रायः झूठी और गढ़ी हुई होती हैं और उनका कोई आधार नहीं होता। हर जाति की अपनी कुछ गढ़ी हुई कहानियां होती हैं।जबकि क़ुरआने मजीद में पिछली जातियों के बारे में जो कुछ कहा गया है उसका उल्लेख इतिहास की पुस्तकों में भी हुआ है तथा अनेक ऐतिहासिक साक्ष्य उसकी पुष्टि करते हैं, अलबत्ता क़ुरआन में वर्णित इतिहास का बड़ा भाग बनी इस्राईल जाति तथा हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम व फ़िरऔन की घटना के संबंध में है।इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इस्लाम सहित ईश्वरीय धर्मों के अनुयाइयों के बीच कुछ अंधविश्वास एवं ग़लत आस्थाएं प्रचलित हैं जिनका कोई आधार नहीं है। क़ुरआने मजीद इस प्रकार के विचारों का घोर विरोधी है, इसी कारण इस महान आसमानी किताब में अंध विश्वास की कोई बात नहीं है। कुछ अंधविश्वास, गढ़ी गई हदीसों अर्थात पैग़म्बर तथा उनके परिजनों के कथनों से संबंधित हैं जिन्हें शत्रुओं ने जान बूझ कर तथा मित्रों ने अज्ञानता के कारण गढ़ा है।इस आयत से हमने सीखा कि वास्तविकताओं तथा धार्मिक एवं ईश्वरीय शिक्षाओं को तुच्छ समझना, घमंड एवं अहंकार की निशानियों में से है।विरोधी, क़ुरआन की घटनाओं को कहानियां कहते हैं जबकि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के काल के अधिकांश लोग, पिछले लोगों के बारे में क़ुरआने मजीद में वर्णित बातों से पूर्णतः अनभिज्ञ थे, इस आधार पर इन घटनाओं को कहानी नहीं कहा जा सकता।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 25 की तिलावत सुनते हैं।لِيَحْمِلُوا أَوْزَارَهُمْ كَامِلَةً يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَمِنْ أَوْزَارِ الَّذِينَ يُضِلُّونَهُمْ بِغَيْرِ عِلْمٍ أَلَا سَاءَ مَا يَزِرُونَ (25)उन्हें प्रलय के दिन अपने पापों का बोझ भी उठाना होगा तथा उन लोगों के पापों के बोझ का एक भाग भी उठाना पड़ेगा, जिन्हें उन्होंने उनकी अज्ञानता के कारण पथभ्रष्ट कर दिया था और जान लो कि क्या ही बुरा बोझ वे उठाएंगे। (16:25)घमंडी व अहंकारी लोग न केवल यह कि स्वयं आसमानी किताबों के सत्य होने को स्वीकार नहीं करते बल्कि दूसरों को भी बहकाने का प्रयास करते हैं। स्वाभाविक है कि प्रलय के दिन इस प्रकार के लोग अपने कर्मों का फल भी पाएंगे और जिन्हें उन्होंने पथभ्रष्ट किया है, उनके पापों के कारण भी वे दंडित होंगे।पैग़म्बरे इस्लाम तथा उनके परिजनों के कथनों में आया है कि जो कोई किसी अच्छे मार्ग का आधार रखता है वह अपने पारितोषिक के अतिरिक्त उस पर चलने वालों के पारितोषिक में भी सहभागी होता है, इसी प्रकार जो कोई किसी ग़लत मार्ग का आधार रखता है तो वह उस मार्ग पर चल कर भटकने वालों को मिलने वाले दंड में भी बराबर का भागीदार होता है।इस आयत से हमने सीखा कि जो कोई दूसरे को पाप का निमंत्रण देगा और उसके पाप का मार्ग प्रशस्त करेगा वह उसके दंड में भी सहभागी होगा।अधिकतर पथभ्रष्टताओं का कारण, अज्ञानता है और शत्रु अपने प्रचारों में लोगों की अज्ञानता से सबसे अधिक लाभ उठाता है।