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    सूरए नहल, आयतें 26-29, (कार्यक्रम 449)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 26 की तिलावत सुनें।قَدْ مَكَرَ الَّذِينَ مِنْ قَبْلِهِمْ فَأَتَى اللَّهُ بُنْيَانَهُمْ مِنَ الْقَوَاعِدِ فَخَرَّ عَلَيْهِمُ السَّقْفُ مِنْ فَوْقِهِمْ وَأَتَاهُمُ الْعَذَابُ مِنْ حَيْثُ لَا يَشْعُرُونَ (26)निश्चित रूप से जो लोग उनसे पहले थे, उन्होंने भी चालें चली थीं तो ईश्वर (के दण्ड) ने उनकी इमारतों को नीवों की ओर से आ लिया तो उनके ऊपर छत गिर पड़ी। और दण्ड इस प्रकार से आया कि जिसके बारे में वे सोच भी नहीं सकते थे। (16:26)इससे पहले कुफ़्र तथा पथभ्रष्टता के नेताओं की ओर से क़ुरआने मजीद के संबंध में किए जाने वाले व्यवहार का वर्णन करते हुए कहा गया था कि वे ईश्वरी शिक्षाओं को तुच्छ समझ कर और उनके संबंध में अपमान जनक व्यवहार अपना कर, आम लोगों को पथभ्रष्ट करना चाहते हैं।यह आयत कहती है कि पिछले लोगों की शैली भी यही थी और वे ईश्वरीय आयतों के संबंध में षड्यंत्र करने तथा चालें चलने का प्रयास करते थे किंतु यह जान लेना चाहिए कि ईश्वर उन्हें भी लोक-परलोक में अत्यंत कड़े दण्ड में ग्रस्त करेगा।अल्बत्ता प्रायः ईश्वरीय दण्ड पहले से बता कर नहीं आता ताकि अपराधियों के पास भागने का कोई मार्ग न रहे, इसी प्रकार ईश्वरीय दण्ड किसी विशेष स्थान से नहीं आता कि मनुष्य उससे दूर हो जाए। यही कारण है कि इस आयत में क़ुरआने मजीद ने कहा है कि ईश्वरीय दण्ड ऐसे स्थान से आता है जिसके बारे में मनुष्य सोच भी नहीं सकता।इस आयत से हमने सीखा कि जब कभी धर्म का आधार ख़तरे में पड़ जाता है तब स्वयं ईश्वर उसकी रक्षा करता है और षड्यंत्रों का उत्तर देता है।जो लोग ईश्वरीय आयतों का मुक़ाबला करने के लिए धूर्तता और छल से काम लेते हैं वे ईश्वरीय दण्ड में ग्रस्त होंगे और उनके पास भागने का कोई मार्ग नहीं होगा।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 27 की तिलावत सुनें।ثُمَّ يَوْمَ الْقِيَامَةِ يُخْزِيهِمْ وَيَقُولُ أَيْنَ شُرَكَائِيَ الَّذِينَ كُنْتُمْ تُشَاقُّونَ فِيهِمْ قَالَ الَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ إِنَّ الْخِزْيَ الْيَوْمَ وَالسُّوءَ عَلَى الْكَافِرِينَ (27)फिर ईश्वर प्रलय के दिन उन्हें अपमानित करेगा और उनसे पूछेगा कि कहां हैं मेरे वे समकक्ष जिनके बारे में तुम (पैग़म्बर तथा ईमान वालों के साथ) विवाद व झगड़ा किया करते थे? उस समय वे लोग जिन्हें ज्ञान दिया गया होगा, कहेंगे कि निश्चित रूप से आज अपमान व बुराई काफ़िरों के लिए है। (16:27)काफ़िरों द्वारा ईमान वालों तथा उनके विचारों एवं मान्यताओं को तुच्छ समझने का परिणाम प्रलय में काफ़िरों के अपमान तथा ईश्वर के कड़े दण्ड में ग्रस्त होने के रूप में सामने आएगा। जो लोग संसार में ज्ञान एवं बुद्धिमत्ता के दावे के साथ ईमान वालों को अज्ञानी एवं मूर्ख समझते थे, वे प्रलय के दिन उनकी बातों के सत्य होने को समझ जाएंगे और अपनी अज्ञानता को स्वीकार करेंगे और यह स्वयं बहुत बड़ा दण्ड है।क़ुरआने मजीद की संस्कृति में ज्ञान व अज्ञानता का अर्थ केवल समझना और न समझना नहीं बल्कि इससे कहीं अधिक व्यापक है। ज्ञानी वह है जिसके विचार व कर्म, सत्य के आधार पर हों, चाहे उसे बहुत से ज्ञानों के बारे में जानकारी न हो, तथा अज्ञानी वह है जिसके विचार तथा कर्म असत्य के आधार पर हों, चाहे वह समस्त ज्ञानों में दक्ष ही क्यों न हो। इस आयत में भी उन्हीं लोगों को ज्ञानी बताया गया है जो कुफ़्र एवं अनेकेश्वरवाद के समक्ष डट जाते हैं और एकेश्वरवाद पर ईमान रखते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि यदि हम किसी भी व्यक्ति या वस्तु को वह महत्व देंगे जो ईश्वर ने उसे प्रदान नहीं किया है तो प्रलय के दिन हमें ईश्वर के समक्ष उत्तरदायी होना पड़ेगा।वास्तविक ज्ञान को मनुष्य में ईमान और कर्म का कारण बनना चाहिए और ऐसा ज्ञान ईश्वरीय उपहार होता है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 28 और 29 की तिलावत सुनें।الَّذِينَ تَتَوَفَّاهُمُ الْمَلَائِكَةُ ظَالِمِي أَنْفُسِهِمْ فَأَلْقَوُا السَّلَمَ مَا كُنَّا نَعْمَلُ مِنْ سُوءٍ بَلَى إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ (28) فَادْخُلُوا أَبْوَابَ جَهَنَّمَ خَالِدِينَ فِيهَا فَلَبِئْسَ مَثْوَى الْمُتَكَبِّرِينَ (29)और अपने ऊपर अत्याचार करने वाले लोगों के प्राण, फ़रिश्ते उनके शरीरों से निकालते हैं तो वे नतमस्तक हो जाते हैं और कहते हैं कि हमने कोई बुरा कर्म नहीं किया है, (जबकि ऐसा नहीं है) बल्कि जो कुछ तुम करते रहे हो उससे निश्चित रूप से ईश्वर भली भांति अवगत है। (16:28) तो नरक के द्वारों में से उसमें प्रविष्ट हो जाओ कि तुम सदैव उसमें रहोगे। और क्या ही बुरा है घमण्डियों का ठिकाना। (16:29)ये आयतें संसार में काफ़िरों की मृत्यु तथा उनके नरक में जाने के समय का उल्लेख करते हुए कहती हैं कि जब ईश्वरीय फ़रिश्ते, काफ़िरों की जान निकालने लगते हैं तो वे स्वयं को ईश्वर एवं इस्लाम के प्रति समर्पित बताते हुए अपने ईमान की घोषणा करते हैं। वे अपने पिछले कर्मों तक का इन्कार कर देते हैं।किंतु स्पष्ट है कि उनकी ओर से ईमान की घोषणा का कोई मूल्य नहीं है क्योंकि यह घोषणा अपने अधिकार से नहीं बल्कि विवश्ता के कारण है। इसके अतिरिक्त उनके इन्कार से कोई परिवर्तन नहीं आने वाला है क्योंकि ईश्वर हर एक के समस्त कर्मों से पूर्णतः अवगत है और उससे कोई भी बात छिपी हुई नहीं है।एक अन्य बिंदु यह कि इस्लामी विचारधारा में मृत्यु का अर्थ, शरीर से आत्मा का अलग होना है। इस दृष्टिकोण के आधार पर मृत्यु का अर्थ, मनुष्य का सदा के लिए समाप्त होना नहीं है।इन आयतों से हमने सीखा कि इस्लामी संस्कृति में, मृत्यु, अंत नहीं है बल्कि जीवन के एक नए चरण का आरंभ है।अपने आप पर अत्याचार, अत्याचार का एक स्पष्ट उदाहरण है और इसका प्रभाव अन्य लोगों पर अत्याचार से कम नहीं होता।कुफ़्र एवं ईश्वर के इन्कार का मूल कारण, सत्य एवं वास्तविकता के संबंध में घमण्ड एवं अहंकार है।