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    सूरए नहल, आयतें 30-34, (कार्यक्रम 450)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 30 और 31 की तिलावत सुनें।وَقِيلَ لِلَّذِينَ اتَّقَوْا مَاذَا أَنْزَلَ رَبُّكُمْ قَالُوا خَيْرًا لِلَّذِينَ أَحْسَنُوا فِي هَذِهِ الدُّنْيَا حَسَنَةٌ وَلَدَارُ الْآَخِرَةِ خَيْرٌ وَلَنِعْمَ دَارُ الْمُتَّقِينَ (30) جَنَّاتُ عَدْنٍ يَدْخُلُونَهَا تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ لَهُمْ فِيهَا مَا يَشَاءُونَ كَذَلِكَ يَجْزِي اللَّهُ الْمُتَّقِينَ (31)और जब ईश्वर से डरने वालों से पूछा जाता है कि तुम्हारे पालनहार ने क्या भेजा है? तो वे कहते हैं कि उन लोगों के लिए भलाई (व कल्याण) जो भले कर्म करते हैं, उनके लिए इस संसार में भी भला प्रतिफल है और प्रलय का घर (तो) उत्तम है ही, और ईश्वर से डरने वालों के लिए वह क्या ही भला घर है। (16:30) उसमें पेड़ों से भरे बाग़ होंगे जिनमें लोग प्रविष्ट होंगे, उसके (पेड़ों के) नीचे से नहरें बह रही होंगी, वहां जो वे चाहेंगे, वह वस्तु होगी, इस प्रकार ईश्वर, स्वयं से डरने वालों को पारितोषिक देता है। (16:31)इन आयतों में ईश्वर का भय रखने वालों का उल्लेख किया गया है जो सभी बुराइयों एवं पापों से दूर रहते हैं और यदि कभी कोई अनुचित कार्य कर भी देते हैं तो तुरंत ईश्वर से तौबा व प्रायश्चित करके स्वयं को पवित्र बना लेते हैं। क़ुरआने मजीद कहता है कि इन लोगों की दृष्टि में जो कुछ ईश्वर की ओर से भेजा गया है वह व्यक्ति तथा समाज के लिए भलाई व कल्याण का कारण तथा वस्तुतः सर्वोत्तम है। वे कहते हैं कि हर भले कर्म का लोक-परलोक में अवश्य ही प्रतिफल मिलता है।रोचक बात यह है कि इन आयतों में धर्म के बारे में सबसे छोटे किंतु इसी के साथ सबसे व्यापक शब्द का प्रयोग किया गया है, और वह है, ख़ैर जिसका अर्थ होता है, भलाई। जो लोग धन-दौलत, संपत्ति, पद व शक्ति को भलाई समझते हैं उनके मुक़ाबले में ईश्वर से डरने वाले, ईश्वरीय शिक्षाओं तथा आदेशों को भलाई व मुक्ति का कारण और सबसे श्रेष्ठ समझते हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद भले कर्मों का निमंत्रण देता है तथा भले कर्म करने वाले लोक-परलोक में भलाई का फल पाते हैं क्योंकि ईश्वर की परंपरा, भले कर्म करने वालों को पारितोषिक देने पर आधारित है।जो संसार के वर्जित आनंदों से मुंह मोड़ लेता है, उसे परलोक की अमर व अनुदाहरणीय भलाइयां प्राप्त होती हैं।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 32 की तिलावत सुनें।الَّذِينَ تَتَوَفَّاهُمُ الْمَلَائِكَةُ طَيِّبِينَ يَقُولُونَ سَلَامٌ عَلَيْكُمُ ادْخُلُوا الْجَنَّةَ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ (32)वे लोग जो (अनेकेश्वरवाद एवं पापों की बुराई से) पवित्र हैं, जब फ़रिश्ते उनके शरीर से उनकी आत्मा निकालते हैं तो उनसे कहते हैं कि तुम पर ईश्वर का सलाम व शांति हो, जो कर्म तुमने किए हैं उनके फल स्वरूप स्वर्ग में प्रविष्ट हो जाओ। (16:32)इस सूरे की 28वीं आयत में अनेकेश्वरवादियों को अत्याचारी कहा गया था, यह आयत ईमान वालों का पवित्र लोगों के रूप में परिचय कराती है और कहती है कि, मृत्यु का क्षण, जो बहुत ही कड़ा समय होता है और फ़रिश्ते आत्मा को शरीर से अलग करते हैं, ईमान वालों के लिए अत्यंत शांति का समय होता है और वे सुरक्षा का आभास करते हैं क्योंकि ईश्वरीय फ़रिश्ते आकर उन्हें सलाम करते हैं और ईमान वालों को आरंभ में ही ईश्वरीय स्वर्ग की शुभ सूचना दे देते हैं।अल्बत्ता स्पष्ट है कि ईमान का दावा करने वाला हर व्यक्ति पवित्र एवं सदाचारी नहीं होता बल्कि ईश्वर से डरने वाले लोगों में ही, जिनका उल्लेख पिछली आयतों में हुआ है, ये विशेषताएं पाई जाती हैं। ऐसे लोग हर प्रकार की बुराई से दूर होते हैं और उनके हृदयों में द्वेष व ईर्ष्या नहीं होती है।इस आयत से हमने सीखा कि मृत्यु, मनुष्य का अंत नहीं है बल्कि यह उसके सांसारिक जीवन का अंत तथा नई परिस्थितियों में एक नए जीवन का आरंभ है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा उनके परिजनों के कथनानुसार क़ब्र, या तो नरक का गढ़ा होती है या फिर स्वर्ग का बाग़ होती है।दूसरों से भेंट के समय सलाम करना, ईश्वरीय परंपरा है जिस पर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने भी अत्यधिक बल दिया है। अस्सलामो अलैकुम एक छोटा सा वाक्य है जिसमें ईश्वरीय दया व शांति की कामना की जाती है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 33 और 34 की तिलावत सुनें।هَلْ يَنْظُرُونَ إِلَّا أَنْ تَأْتِيَهُمُ الْمَلَائِكَةُ أَوْ يَأْتِيَ أَمْرُ رَبِّكَ كَذَلِكَ فَعَلَ الَّذِينَ مِنْ قَبْلِهِمْ وَمَا ظَلَمَهُمُ اللَّهُ وَلَكِنْ كَانُوا أَنْفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ (33) فَأَصَابَهُمْ سَيِّئَاتُ مَا عَمِلُوا وَحَاقَ بِهِمْ مَا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ (34)क्या काफ़िरों को इसके अतिरिक्त किसी अन्य बात की प्रतीक्षा है कि उनके पास (मृत्यु के) फ़रिश्ते या ईश्वरीय (दण्ड का) आदेश आए? जो लोग उनसे पहले थे, उन्होंने भी यही किया था और ईश्वर ने उन पर अत्याचार नहीं किया बल्कि उन्होंने स्वयं ही अपने ऊपर अत्याचार किया था। (16:33) तो उन्होंने जो बुराइयां की थीं उसका बदला उन तक पहुंच गया और जिस बात का वे परिहास करते थे, उसने उन्हें आ लिया। (16:34)हठधर्मी लोग, जो सत्य को सुनने तथा उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते थे, चूंकि तर्कहीन बातें करते थे, इसी लिए पैग़म्बरों से इसी संसार में ईश्वरीय दण्ड के भेजे जाने की इच्छा जताते थे और कहते थे कि हम तो ईमान नहीं लाएंगे, यदि तुम हमें ईश्वरीय दण्ड में ग्रस्त कर सकते हो तो कर दो।किंतु ईश्वर की परंपरा यह नहीं है कि वह संसार में काफ़िरों को दण्डित करे अन्यथा संसार के सभी लोग उस पर ईमान लाने पर विवश होते और विवश्तापूर्ण स्वीकार की गई बात का कोई मूल्य नहीं होता।इन आयतों में कहा गया है कि संपूर्ण इतिहास में अवज्ञाकारियों की परंपरा यह रही है कि वे ईश्वर की ओर से दण्ड आने की प्रतीक्षा करते रहे हैं और उनके द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों एवं दुष्कर्मों के परिणाम स्वरूप ईश्वर उन्हें लोक-परलोक में दण्डित करता है, और इस बात की भी संभावना रहती है कि वे इस बात को समझ ही न पाएं कि उन्हें दण्डित किया जा रहा है।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय दण्ड, पालनहार के अत्याचार का चिन्ह नहीं हैं, बल्कि उस अत्याचार का परिणाम हैं जो काफ़िर व अनेकेश्वरवादी अपने ऊपर करते हैं।जिन बातों पर ईश्वर इसी संसार में दण्डित करता है, उनमें से एक दूसरों विशेष कर धार्मिक मान्यताओं का परिहास करना है।