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    सूरए नहल, आयतें 35-37, (कार्यक्रम 451)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 35 की तिलावत सुनें।وَقَالَ الَّذِينَ أَشْرَكُوا لَوْ شَاءَ اللَّهُ مَا عَبَدْنَا مِنْ دُونِهِ مِنْ شَيْءٍ نَحْنُ وَلَا آَبَاؤُنَا وَلَا حَرَّمْنَا مِنْ دُونِهِ مِنْ شَيْءٍ كَذَلِكَ فَعَلَ الَّذِينَ مِنْ قَبْلِهِمْ فَهَلْ عَلَى الرُّسُلِ إِلَّا الْبَلَاغُ الْمُبِينُ (35)और अनेकेश्वरवादी कहते हैं कि यदि ईश्वर चाहता तो हम और हमारे पूर्वज उसके अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु की उपासना न करते और न ही हम उसके आदेश के बिना किसी वस्तु को वर्जित ठहराते। यही कार्य उन लोगों ने भी किया था जो इनसे पहले थे। तो क्या पैग़म्बरों पर स्पष्ट संदेश पहुंचाने के अतिरिक्त कोई अन्य दायित्व भी है? (16:35)अनेकेश्वरवादी अपनी आस्थाओं के औचित्य के लिए, अपने विवश होने की बात करते हैं। वे कहते हैं कि ईश्वर चाहता है कि हम मूर्तियों की पूजा करें और यदि वह ऐसा न चाहता तो हम उसी की उपासना करते। अनेकेश्वरवादियों का यह अनुचित तर्क क़ुरआने मजीद की अन्य आयतों में भी आया है।जबकि ईश्वर ने मनुष्य को बुद्धि प्रदान की है तथा अपने पैग़म्बरों को भेजा है ताकि वह सत्य और असत्य को भली भांति पहचान सके। दूसरी ओर उसने मनुष्य को अधिकार भी दिया है ताकि वह सही मार्ग का चयन कर सके। मनुष्य अपने चयन के अधिकार के साथ, सत्य के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है या फिर सत्य का मार्ग छोड़ कर असत्य को स्वीकार कर सकता है।इस आधार पर जिस प्रकार ईश्वर किसी को ईमान लाने पर विवश नहीं करता, उसी प्रकार कोई इस बात के लिए भी विवश नहीं है कि अनेकेश्वरवादी हो जाए। मनुष्य को ईमान या अनेकेश्वरवाद में से किसी एक के चयन का अधिकार है। इसके अतिरिक्त इस बात पर भी ध्यान रहना चाहिए कि चूंकि ईश्वर ने लोगों के मार्गदर्शन के साधन उपलब्ध कराए हैं तो इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई भी पथभ्रष्ट नहीं हो सकता।इस आयत से हमने सीखा कि ग़लत व अनुचित कर्मों व विचारों का औचित्य दर्शाना, उन कर्मों व विचारों से भी अधिक ख़तरनाक है क्योंकि इससे तौबा व प्रायश्चित की संभावना समाप्त हो जाती है।पैग़म्बरों का दायित्व, लोगों तक ईश्वर का संदेश पहुंचाना है, उन्हें ईमान लाने पर विवश करना नहीं।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 36 की तिलावत सुनें।وَلَقَدْ بَعَثْنَا فِي كُلِّ أُمَّةٍ رَسُولًا أَنِ اُعْبُدُوا اللَّهَ وَاجْتَنِبُوا الطَّاغُوتَ فَمِنْهُمْ مَنْ هَدَى اللَّهُ وَمِنْهُمْ مَنْ حَقَّتْ عَلَيْهِ الضَّلَالَةُ فَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَانْظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُكَذِّبِينَ (36)और निश्चित रूप से हमने हर समुदाय में एक पैग़म्बर भेजा कि ईश्वर की उपासना करो तथा ताग़ूत अर्थात अत्याचारी शासकों से दूर रहो। तो उनमें से एक गुट का ईश्वर ने मार्गदर्शन किया तथा एक अन्य गुट पर पथभ्रष्टता सिद्ध हो कर रही। तो धरती में सैर करो और देखो की झुठलाने वालों का अंजाम क्या हुआ। (16:36)अपने तथा अपने पूर्वजों के अनेकेश्वरवाद के संबंध में अनेकेश्वरवादियों के अनुचित तर्कों का उल्लेख करने के पश्चात यह आयत कहती है कि ईश्वर की ओर से लोगों के मार्गदर्शन में कोई कमी नहीं की गई है तथा उसने हर समुदाय में अपने पैग़म्बर भेजे हैं जिन्होंने लोगों के मार्गदर्शन की भूमि प्रशस्त की है तथा उन्हें सीधा मार्ग दिखाया है।सीधा मार्ग, ईश्वर का आज्ञापालन तथा उसकी उपासना और अत्याचारी शासकों के सामने सिर न झुकाना है। स्वाभाविक है कि जो लोग अपने चयन के अधिकार के साथ, पैग़म्बरों के मार्ग को चुनेंगे, उन्हें ईश्वरीय मार्गदर्शन प्राप्त होगा किंतु जो लोग सत्य का इन्कार करेंगे और उसे स्वीकार नहीं करेंगे वे पथभ्रष्टता में ग्रस्त होंगे और ये दोनों बातें ईश्वर से नहीं स्वयं मनुष्य से संबंधित हैं।इस आयत से हमने सीखा कि अत्याचारी शासकों से संघर्ष, सभी पैग़म्बरों के कार्यक्रमों में सर्वोपरि रहा है।धर्म, राजनीति से अलग नहीं है, और अत्याचारी शासकों का आज्ञापालन, धर्म पर ईमान से मेल नहीं खाता।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 37 की तिलावत सुनें।إِنْ تَحْرِصْ عَلَى هُدَاهُمْ فَإِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي مَنْ يُضِلُّ وَمَا لَهُمْ مِنْ نَاصِرِينَ (37)(हे पैग़म्बर!) यद्यपि आप उनके मार्गदर्शन की बहुत अधिक लालसा रखते हैं किंतु जिसे ईश्वर ने (उसके ग़लत चयन के कारण) पथभ्रष्ट कर दिया हो वह उसका कदापि मार्गदर्शन नहीं करेगा और उनके लिए कोई सहायक नहीं होगा। (16:37)यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा अन्य ईमान वालों को सांत्वना देते हुए कहती है कि इस बात की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए की संसार के सभी लोग ईमान ले आएंगे और हठधर्मी पथभ्रष्ठों के लिए स्वयं को अप्रसन्न नहीं करना चाहिए क्योंकि वे सत्य के साथ मुक़ाबले का प्रयास कर रहे हैं और ऐसा नहीं है कि वे सत्य को समझ नहीं पाए हैं और काफ़िर हो गए हैं बल्कि वे द्वेष एवं हठधर्म के चलते ही सत्य को स्वीकार नहीं कर रहे हैं।स्वाभाविक है कि यह आयत उन काफ़िरों तथा अनेकेश्वरवादियों के बारे में है जो सत्य और वास्तविकता से संघर्ष कर रहे हैं। ईश्वर ने इन लोगों के ह्रदयों पर ठप्पा लगा दिया है और अब उनके मार्गदर्शन की संभावना नहीं है, किंतु आज के बहुत से अनेकेश्वरवादी और काफ़िर ऐसे नहीं हैं और वे अज्ञानता के कारण इस प्रकार की आस्था रखते हैं जिससे ईमान वालों का दायित्व बढ़ जाता है क्योंकि उन्हें सभी के कानों तक सत्य की आवाज़ पहुंचाने का प्रयास करना चाहिए। अनुभवों से पता चलता है कि यदि ईमान वाले अपने दायित्वों का सही ढंग से पालन करें तो बहुत से लोग ईमान ले आते हैं तथा ईश्वरीय मार्गदर्शन का स्वागत करते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि कभी कभी मनुष्य पथभ्रष्टता में इतना डूब जाता है कि उसकी मुक्ति का कोई मार्ग नहीं बचता अतः न तो इस संसार में उसका मार्गदर्शन हो पाता है और न ही प्रलय में कोई उसकी सहायता कर सकता है।जिन लोगों के मार्गदर्शन की आशा न रह गई हो उनके लिए अपने आपको अप्रसन्न नहीं करना चाहिए किंतु साधारण लोगों के सुधार के लिए जिनके मार्गदर्शन की आशा हो, प्रयास करना चाहिए।