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    सूरए नहल, आयतें 38-42, (कार्यक्रम 452)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 38 और 39 की तिलावत सुनें।وَأَقْسَمُوا بِاللَّهِ جَهْدَ أَيْمَانِهِمْ لَا يَبْعَثُ اللَّهُ مَنْ يَمُوتُ بَلَى وَعْدًا عَلَيْهِ حَقًّا وَلَكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ (38) لِيُبَيِّنَ لَهُمُ الَّذِي يَخْتَلِفُونَ فِيهِ وَلِيَعْلَمَ الَّذِينَ كَفَرُوا أَنَّهُمْ كَانُوا كَاذِبِينَ (39)और वे ईश्वर की बड़ी बड़ी सौगंध खाते हैं कि जो कोई मर जाएगा ईश्वर उसे पुनः जीवित नहीं करेगा, जबकि यह ईश्वर का एक सच्चा वादा है (कि वह मरे हुए लोगों को जीवित करेगा) किंतु अधिकांश लोग नहीं समझते। (16:38) (यह इस लिए आवश्यक है) ताकि ईश्वर उन लोगों के लिए उस वास्तविकता को स्पष्ट कर दे जिसके बारे में उनके बीच मतभेद था और ताकि ईश्वर का इन्कार करने वाले जान लें कि वे झूठे थे। (16:39)इससे पहले हमने कहा कि कुफ़्र एवं अनेकेश्वरवाद में ग्रस्त लोग, जो अपने हठधर्म एवं द्वेष के कारण सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते, अपने मार्गदर्शन के लिए कोई संभावना बाक़ी नहीं रखते, इसी कारण ईश्वर उन्हें अपने मार्गदर्शन से वंचित कर देता है।ये आयतें कहती हैं कि वे मृत्यु को जीवन का अंत समझते हैं और कहते हैं कि ईश्वर मरे हुए लोगों को उनके कर्मों का बदला देने के लिए पुनः जीवित नहीं करेगा और जो कोई इस संसार में मर जाता है वह पुनः जीवित नहीं होता। रोचक बात यह है कि वे अपनी इस बात के लिए ईश्वर की सौगंध भी खाते हैं क्योंकि जिस व्यक्ति के मन में ईश्वर की सही पहचान नहीं होती वह उसे ऐसा व्यक्तित्व समझता है जिसकी उपासना, मूर्तियों के माध्यम से की जाती है और मूर्तियां मनुष्य को उससे निकट करती हैं।स्वाभाविक है कि इस प्रकार का भगवान जिसकी मानव जीवन में कोई भूमिका नहीं है, जिसने केवल मनुष्य तथा संसार की रचना की है तथा संसार का संचालन किसी अन्य के हाथ में दे दिया हो, निश्चित रूप से मनुष्य के मरने के बाद उसका कोई कार्यक्रम नहीं होगा किंतु ईश्वर कहता है कि प्रलय के दिन यह बात स्पष्ट होगी कि वे पैग़म्बर जो स्वर्ग व नरक का वादा करते थे, झूठे थे अथवा वे लोग जो इस वास्तविकता का इन्कार करते थे? प्रलय के दिन यह वास्तविकता स्पष्ट होगी किंतु उस दिन काफ़िरों को कोई लाभ नहीं होगा क्योंकि उस दिन वापसी का कोई मार्ग नहीं होगा।इन आयतों से हमने सीखा कि प्रलय का आना तथा मरे हुए लोगों का जीवित होना, ईश्वर के उन अटल वादों में से है जिन पर विश्वास रखना, ईश्वर पर विश्वास रखने से अलग नहीं है।कुछ लोग द्वेष और हठधर्म के कारण प्रलय का इन्कार करते हैं किंतु प्रलय का इन्कार करने वाले अधिकांश लोग अपनी अज्ञानता तथा ईश्वर की सही पहचान न होने के कारण प्रलय का इन्कार करते हैं।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 40 की तिलावत सुनें।إِنَّمَا قَوْلُنَا لِشَيْءٍ إِذَا أَرَدْنَاهُ أَنْ نَقُولَ لَهُ كُنْ فَيَكُونُ (40)और जब हम किसी वस्तु का इरादा करते हैं तो उससे हमारा कथन यह होता है कि हो जा! तो वह हो जाती है। (16:40)यह आयत क़ुरआने मजीद की अत्यंत संक्षिप्त आयतों में से एक है जिसमें जीवों एवं वस्तुओं की सृष्टि के संबंध में ईश्वर के इरादे की भूमिका का वर्णन किया गया है।मनुष्य जब भी किसी वस्तु को अपनी कल्पना में लाना चाहता है तो वह केवल इरादे की सहायता से ही उसे अपने मन में साक्षात कर सकता है तथा इसके लिए उसे किसी अन्य बात की आवश्यकता नहीं होती। निश्चित रूप से ईश्वर जो मनुष्य का रचयिता है उसे किसी भी वस्तु की रचना में इरादे के अतिरिक्त किसी अन्य बात की आवश्यकता नहीं होती।इस आयत में जो यह कहा गया है कि ईश्वर कहता है कि हो जा तो वह वस्तु हो जाती है तो यह लोगों को समझाने के लिए है अन्यथा ईश्वर को सृष्टि के लिए कुछ कहने की आवश्यकता नहीं होती, उसके इरादा करते ही वह वस्तु अस्तित्व में आ जाती है।इस आयत से हमने सीखा कि प्रलय में संदेह का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि ईश्वर की शक्ति इससे कहीं अधिक है कि उसमें सृष्टि की पुनः रचना की क्षमता न हो।जो ईश्वर अपने एक इरादे से वस्तुओं को अस्तित्व में ले आता हो क्या वह वस्तुओं को, जो अन्य पदार्थों में परिवर्तित हो गई हैं, उनकी पहली स्थिति पर नहीं लौटा सकता?आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 41 और 42 की तिलावत सुनें।وَالَّذِينَ هَاجَرُوا فِي اللَّهِ مِنْ بَعْدِ مَا ظُلِمُوا لَنُبَوِّئَنَّهُمْ فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَلَأَجْرُ الْآَخِرَةِ أَكْبَرُ لَوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ (41) الَّذِينَ صَبَرُوا وَعَلَى رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَ (42)और जिन लोगों ने अत्याचार का शिकार बनने के बाद ईश्वर (के मार्ग) में पलायन किया, उन्हें हम इसी संसार में अच्छा ठिकाना प्रदान करेंगे और यदि वे जानें तो निश्चित रूप से प्रलय का पारितोषिक अधिक बड़ा है। (16:41) ये वे लोग हैं जिन्होंने संयम से काम लिया है और अपने पालनहार पर भरोसा करते हैं। (16:42)इस्लाम धर्म का एक आदेश, अपने तथा अपने परिवार के धर्म एवं आस्था की रक्षा के लिए अपने क्षेत्र, ठिकाने एवं नगर से पलायन करना है। ईश्वर पर ईमान रखने वाले व्यक्ति को अत्याचारी समाज में न तो घुलना-मिलना चाहिए और न ही इस बात की अनुमति देनी चाहिए कि उस पर अत्याचार हो अथवा उसका अनादर किया जाए। उसे अत्याचारी से संघर्ष करना तथा उसके समक्ष डट जाना चाहिए, या फिर उस क्षेत्र से पलायन कर जाना चाहिए ताकि उसकी आस्था सुरक्षित रहे।जैसा की पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा उस समय के मुसलमानों ने मक्का नगर से मदीने की ओर पलायन किया था और अनेक कठिनाइयां तथा समस्याएं सहन करने के बावजूद अपनी आस्था पर डटे रहे और उन्होंने ईश्वर पर भरोसा करके अंततः अनेकेश्वरवादियों को पराजित कर दिया।इन आयतों में ईश्वर कहता है कि जो कोई ईश्वर के लिए पलायन करता है तो इस संसार में भी उसकी स्थिति बेहतर हो जाती है और वह धैर्य, प्रतिरोध तथा ईश्वर पर भरोसे के कारण प्रलय में भी अधिक बड़ा पारितोषिक प्राप्त करेगा।इन आयतों से हमने सीखा कि यदि हम अत्याचारी का मुक़ाबला नहीं कर सकते तो हमें इस बात का अधिकार नहीं है कि हम यह कह कर उसका अत्याचार सहन कर लें कि हमारे पास कोई मार्ग नहीं है, उस क्षेत्र से पलायन कर जाना चाहिए।यद्यपि अपने क्षेत्र व नगर से पलायन करना अत्यंत कठिन है किंतु इसके पश्चात शांति व आराम प्राप्त होता है और यह ईश्वर का अटल वचन है।