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    सूरए नहल, आयतें 43-47, (कार्यक्रम 453)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 43 और 44 की तिलावत सुनें।وَمَا أَرْسَلْنَا مِنْ قَبْلِكَ إِلَّا رِجَالًا نُوحِي إِلَيْهِمْ فَاسْأَلُوا أَهْلَ الذِّكْرِ إِنْ كُنْتُمْ لَا تَعْلَمُونَ (43) بِالْبَيِّنَاتِ وَالزُّبُرِ وَأَنْزَلْنَا إِلَيْكَ الذِّكْرَ لِتُبَيِّنَ لِلنَّاسِ مَا نُزِّلَ إِلَيْهِمْ وَلَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُونَ (44)और (हे पैग़म्बर!) हमने आपसे पूर्व भी पुरूषों को ही रसूल बना कर भेजा था जिनकी ओर हम अपना विशेष संदेश वहि भेजा करते थे। (उनसे कह दीजिए कि) यदि तुम्हें ज्ञान न हो तो उन लोगों से पूछो जिन्हें ज्ञान है। (16:43) (हमने उन पैग़म्बरों को) स्पष्ट चमत्कारों तथा किताब के साथ (भेजा) तथा आपके पास भी किताब भेजी है ताकि आप लोगों को वे सब बातें स्पष्ट रूप से बता दें जो उनके लिए भेजी गई हैं, शायद वे चिंतन करने लगें। (16:44)जैसा कि इस्लामी इतिहास में वर्णित है, कुछ अनेकेश्वरवादियों को इस बात में संदेह था कि ईश्वर किसी मनुष्य को अपना दूत और पैग़म्बर बना कर भेजेगा। उन्हें आशा थी कि फ़रिश्तों अथवा इसी प्रकार के जीवों को ईश्वर की ओर से इस प्रकार के भारी दायित्व के लिए चुना जाएगा।ये आयतें कहती हैं कि यह पहली बार नहीं है कि ईश्वर ने किसी मनुष्य को पैग़म्बर बनाया हो किंतु तुम्हें इस पर आश्चर्य है और इसी बहाने से तुम इस बात को स्वीकार करने से इन्कार कर रहे हो। अन्य धर्मों तथा आसमानी किताब के अनुयाइयों से पूछो तो वे तुम्हें बताएंगे कि उनके पैग़म्बर भी स्वयं उन्हीं की भांति मनुष्य थे।हज़रत नूह, इब्राहीम, ईसा, मूसा व उन्हीं जैसे अन्य पैग़म्बर मनुष्य ही थे जिन्होंने लोगों तक ईश्वर का संदेश पहुंचाने का दायित्व निभाया था तथा उनमें से हर एक ने अपनी पैग़म्बरी के प्रमाण स्वरूप कोई ईश्वरीय चमत्कार प्रस्तुत किया था।पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास भी, पिछले पैग़म्बरों की भांति, ईश्वरीय किताब भी थी तथा अपनी पैग़म्बरी को प्रमाणित करने के लिए ईश्वरीय चमत्कार भी थे, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण स्वयं क़ुरआने मजीद है। यह ऐसी किताब है जो लोगों के मार्गदर्शन के लिए आई है तथा पैग़म्बर का दायित्व है कि उसे स्पष्ट रूप से लोगों के समक्ष प्रस्तुत करें तथा लोगों का दायित्व है कि वे उसके बारे में चिंतन करें तथा उससे लाभ उठाएं।यह आयत इसी प्रकार एक मूल सिद्धांत की ओर संकेत करते हुए कहती है कि ज्ञान न होने की स्थिति में ज्ञानियों से संपर्क करना चाहिए। पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने परिजनों को इस आयत के सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है। पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों के ज्ञान का स्रोत, स्वयं पैग़म्बर का ज्ञान है और उनके ज्ञान का स्रोत ईश्वर का अथाह ज्ञान है।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय पैग़म्बर जिन्न अथवा फ़रिश्ते नहीं बल्कि मनुष्य ही थे ताकि लोग यह न कह सकें कि पैग़म्बर जिन बातों की शिक्षा देते थे हम उन्हें व्यवहारिक नहीं बना सकते थे।धर्म से संबंधित बातों को, धर्म के बारे में आधा-अधूरा ज्ञान रखने वाले कठमुल्लों से नहीं बल्कि धर्म के ज्ञानियों से पूछना चाहिए।ईश्वर के बड़े पैग़म्बरों के पास ईश्वरीय किताब भी थी और ईश्वरीय चमत्कार भी ताकि लोग, सत्य और असत्य को समझने में संदेह एवं शंका का शिकार न हों।पैग़म्बर का दायित्व, क़ुरआन का स्पष्ट शब्दों में वर्णन करना है तथा लोगों का दायित्व उसे स्वीकार करना तथा उसके बारे में चिंतन करना है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 45, 46 और 47 की तिलावत सुनें।أَفَأَمِنَ الَّذِينَ مَكَرُوا السَّيِّئَاتِ أَنْ يَخْسِفَ اللَّهُ بِهِمُ الْأَرْضَ أَوْ يَأْتِيَهُمُ الْعَذَابُ مِنْ حَيْثُ لَا يَشْعُرُونَ (45) أَوْ يَأْخُذَهُمْ فِي تَقَلُّبِهِمْ فَمَا هُمْ بِمُعْجِزِينَ (46) أَوْ يَأْخُذَهُمْ عَلَى تَخَوُّفٍ فَإِنَّ رَبَّكُمْ لَرَءُوفٌ رَحِيمٌ (47)जो लोग चाल चल कर बुरे कर्म कर रहे हैं, क्या वे इस बात की ओर से निश्चिंत हो गए हैं कि ईश्वर उन्हें धरती में नहीं धंसाएगा? अथवा इस प्रकार उन्हें दण्डित करे कि उन्हें पता ही न चले? (16:45) या उन्हें चलते-फिरते पकड़ ले तो वे उस दण्ड को निष्क्रिय बनाने वाले नहीं हैं? (16:46) अथवा सहसा ही उन्हें ऐसी स्थिति में पकड़ ले जब उन्हें (दण्ड का) खटका लगा हो? तो निश्चित रूप से तुम्हारा पालनहार अत्यंत करुणामय एवं दयावान है। (16:47)क़ुरआने मजीद द्वारा काफ़िरों तथा अनेकेश्वरवादियों को इतिहास के बारे में चिंतन करने तथा पैग़म्बरों के सच्चे कथनों का इन्कार करने वालों के अंत से पाठ सीखने का निमंत्रण दिए जाने के पश्चात इन आयतों में कहा गया है कि सत्य के विरोध का दण्ड प्रलय से विशेष नहीं है बल्कि संभव है कि इसी संसार में ईश्वर अत्याचारियों को अपने दण्ड में ग्रस्त करे।रात को सोते समय या दिन में परिश्रम के समय ईश्वर का दण्ड आता है और अत्याचारी ऐसे स्थान से दण्डित होते हैं जिसके बारे में उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। ऐसे समय में उनके पास दण्ड से बचने का कोई मार्ग नहीं होता। अल्बत्ता ईश्वर अपनी दया व कृपा के कारण काफ़िरों को दण्डित करने में जल्दी नहीं करता और उन्हें मोहलत देता है ताकि वे हठधर्म छोड़ कर सत्य को स्वीकार कर लें।इन आयतों में तीन प्रकार के दण्डों का उल्लेख किया गया है, ज़मीनी दण्ड, आसमानी दण्ड तथा मानसिक दण्ड।इन आयतों से हमने सीखा कि लोगों तक सभी तर्कपूर्ण बातें पहुंचाने के बाद ही ईश्वरीय दण्ड आता है और जब तक लोगों तक सभी तर्क नहीं पहुंचा दिए जाते, उन्हें दण्डित नहीं किया जाता।काफ़िरों तथा ईमान वालों सभी को जान लेना चाहिए कि ईश्वरीय ज्ञान व शक्ति के सामने अत्याचारियों की हर प्रकार की चाल विफल व निष्क्रिय रहेगी तथा कोई भी व्यक्ति या शक्ति ईश्वरीय दण्ड को नहीं रोक सकती।संसार में ईश्वरीय दण्ड के समय, स्थान तथा प्रकार का अनुमान नहीं लगाया जा सकता, अतः उससे बचने की संभावना भी नहीं है।ईश्वरीय दण्ड, द्वेष व प्रतिशोध के आधार पर नहीं बल्कि मानवता के प्रशिक्षण के लिए होता है।