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    सूरए नहल, आयतें 48-52, (कार्यक्रम 454)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 48 की तिलावत सुनें। أَوَلَمْ يَرَوْا إِلَى مَا خَلَقَ اللَّهُ مِنْ شَيْءٍ يَتَفَيَّأُ ظِلَالُهُ عَنِ الْيَمِينِ وَالشَّمَائِلِ سُجَّدًا لِلَّهِ وَهُمْ دَاخِرُونَ (48)क्या उन्होंने ईश्वर द्वारा बनाई गई वस्तुओं को नहीं देखा है कि किस प्रकार उनकी छायाएं दाहिनी और बाईं ओर से फैलती हैं और अपने पालनहार के प्रति विनम्रता के साथ उसके समक्ष नतमस्तक हो जाती हैं। (16:48)यह आयत वस्तुओं की छाया को, जो विनम्रता की निशानी समझी जाती है, ईश्वर के समक्ष नतमस्तक होने की स्थिति में बताती है ताकि यह समझा सके कि न केवल ईश्वर की समस्त रचनाएं बल्कि उनकी छायाएं तक ईश्वर के समक्ष नतमस्तक और विनम्र हैं।स्पष्ट है कि ईश्वर की सभी रचनाएं उसके द्वारा बनाए गए क़ानूनों के अधीन हैं और इस बात की तनिक भी संभावना नहीं है कि ईश्वर ने उनकी प्रवृत्ति में जो नियम रखे हैं उनका वे थोड़ा सा भी उल्लंघन करें। दूसरे शब्दों में वे अपने रचयिता के आदेशों का संपूर्ण पालन करती हैं और जो मार्ग उनके सामने रखा गया है उससे तनिक भी विचलित नहीं होतीं।जब वस्तुएं इस प्रकार ईश्वर की इच्छा के समक्ष नतमस्तक रहती हैं तो उनकी छायाएं भी जो स्वयं उनके अधीन हैं, प्रकृति के क़ानून का पालन करती हैं जिन्हें ब्रहमाण्ड के रचयिता ने बनाया है।इस आयत से हमने सीखा कि संपूर्ण सृष्टि चाहे वे वस्तुएं हों अथवा उनकी विशेषताएं, ईश्वर की इच्छा तथा उसके आदेशों का पालन करती है।जब संपूर्ण सृष्टि ईश्वर के समक्ष सज्दे की स्थिति में है तो क्यों मनुष्य ईश्वर का सज्दा न करके एकजुट सृष्टि की शोभा को कलंकित करे।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 49 और 50 की तिलावत सुनें। وَلِلَّهِ يَسْجُدُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ مِنْ دَابَّةٍ وَالْمَلَائِكَةُ وَهُمْ لَا يَسْتَكْبِرُونَ (49) يَخَافُونَ رَبَّهُمْ مِنْ فَوْقِهِمْ وَيَفْعَلُونَ مَا يُؤْمَرُونَ (50)और जीवों तथा फ़रिश्तों में से जो कुछ आकाशों और धरती में है वह ईश्वर के समक्ष नतमस्तक है और (अपने पालनहार के आदेश की) अवहेलना नहीं करता। (16:49) ये लोग अपने पालनहार से जिसे उन पर प्रभुत्व प्राप्त है, डरते हैं तथा जिसका उन्हें आदेश दिया गया है, उसका पालन करते हैं। (16:50)पिछली आयत में समस्त सृष्टि के ईश्वर के समक्ष सजदा करने अथवा नतमस्तक रहने का उल्लेख करने के पश्चात क़ुरआने मजीद इन आयतों में कहता है कि न केवल धरती पर मौजूद वस्तुएं व जीव बल्कि फ़रिश्तों जैसी आसमानी रचनाएं भी सदैव ईश्वर के समक्ष नतमस्तक रहती हैं और उसके आदेशों का पूर्ण रूप से पालन करती हैं। आसमानी रचनाएं न तो कभी ईश्वर के प्रति घमण्ड का प्रदर्शन करतीं हैं और न ही उद्दण्डता दिखाती हैं क्योंकि उन्हें ज्ञात है कि ईश्वर उनके सभी कर्मों को देख रहा है अतः वे उसके किसी भी आदेश की अवहेलना नहीं करतीं।इस संबंध में कि वस्तुओं एवं जीवों के सजदे का अभिप्राय क्या है? दो दृष्टिकोण पाए जाते हैं, एक विचार यह है कि इसका तात्पर्य, सृष्टि के नियमों एवं क़ानूनों के प्रति प्राकृतिक रूप से नतमस्तक रहना है जबकि दूसरे दृष्टिकोण में कहा गया है कि इसका अर्थ सोच समझ कर अपनी इच्छा से सजदा करना है, भले ही हम मनुष्य इस बात को समझ न पाएं।क़ुरआने मजीद की अन्य आयतों की समीक्षा से प्रतीत होता है कि सजदे के संबंध में दूसरा दृष्टिकोण, क़ुरआने मजीद के दृष्टिगत है क्योंकि एक अन्य स्थान पर क़ुरआने मजीद में कहा गया है कि तुम लोग ईश्वर की रचनाओं के गुणगान तथा सजदे को समझने की क्षमता नहीं रखते, जबकि पहले दृष्टिकोण में जिस सजदे का उल्लेख किया गया है उसे हम भली भांति समझ सकते हैं, इस आधार पर सजदे का तात्पर्य, सोच समझ कर इच्छा के साथ किया जाने वाला सजदा है।इन आयतों से हमने सीखा कि केवल इस धरती पर ही नहीं बल्कि ब्रहमाण्ड के अन्य गृहों में भी जीवों का अस्तित्व है जैसा कि सूरए शूरा की 29वीं आयत में भी इस ओर संकेत किया गया है।ईश्वर से हमारा भय, अपने पापों के कारण है, किंतु फ़रिश्ते ईश्वर के उच्च स्थान व उसकी महानता के कारण उससे डरते हैं, जिस प्रकार से कि ईश्वर के पैग़म्बर तथा उसके प्रिय बंदे उससे डरते हैं।फ़रिश्ते ईश्वर की ऐसी पवित्र रचना हैं जो हर काम सही और संपूर्ण ढंग से करते है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 51 की तिलावत सुनें। وَقَالَ اللَّهُ لَا تَتَّخِذُوا إِلَهَيْنِ اثْنَيْنِ إِنَّمَا هُوَ إِلَهٌ وَاحِدٌ فَإِيَّايَ فَارْهَبُونِ (51)और ईश्वर ने कहा है कि दो पूज्य (ईश्वर) ग्रहण न करो कि निश्चित रूप से वह अनन्य ईश्वर है तो केवल मुझ से ही डरते रहो। (16:51)ईश्वर के समक्ष पूरी सृष्टि के नतमस्तक होने का वर्णन करने के पश्चात यह आयत कहती है कि तुम मनुष्य क्यों अन्य वस्तुओं एवं जीवों व मनुष्यों को ईश्वर का समकक्ष ठहराते हो जबकि तुम्हारा रचयिता एक व अनन्य है और उसके अतिरिक्त किसी में भी उपासना योग्य होने की क्षमता नहीं है।यदि मनुष्य ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य को दृष्टिगत न रखे और किसी अन्य की उपासना न करे तो स्वाभाविक है कि वह किसी से भी भयभीत नहीं होगा बल्कि केवल अपने ईश्वर से डरेगा और ईश्वर से उसका भय इस बात का कारण बनेगा कि वह अपने दायित्वों का भली भांति पालन करे और अपनी परिपूर्णता के मार्ग पर चले, जिस प्रकार से एक छात्र अपने शिक्षक से भय के कारण शैक्षिक व नैतिक रूप से प्रगति करता है।इस आयत से हमने सीखा कि सृष्टि के कार्यों के संबंध में दो विरोधाभासी अर्थात एक भले और एक बुरे स्रोत के बारे में आस्था रखना सही नहीं क्योंकि सृष्टि का एकमात्र स्रोत ईश्वर है और सभी वस्तुएं उसी की ओर से हैं, चाहे कुछ को हम बुरा ही क्यों न समझें।ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य से डरना, एक प्रकार का अनेकेश्वरवाद है और ईमान वाला व्यक्ति ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य से नहीं डरता।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 52 की तिलावत सुनें। وَلَهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَلَهُ الدِّينُ وَاصِبًا أَفَغَيْرَ اللَّهِ تَتَّقُونَ (52)और जो कुछ आकाशों और धरती में है वह उसी का है और धर्म भी सदैव उसी का है तो क्या तुम उसके अतिरिक्त किसी से डरते हो? (16:52)यह आयत कहती है कि सृष्टि और संसार की व्यवस्था भी तथा धर्म तथा धार्मिक नियमों की व्यवस्था भी केवल ईश्वर ही की है। उसके अतिरिक्त किसी ने भी किसी भी वस्तु की न तो रचना की है और न ही किसी को क़ानून बनाने का अधिकार है, तो फिर क्यों कुछ लोग ईश्वर से तो नहीं डरते किंतु दूसरों से भयभीत रहते हैं?इस आयत से हमने सीखा कि बंदगी एवं उपासन ईश्वर के अतिरिक्त किसी की भी नहीं की जा सकती बल्कि यह केवल अनन्य ईश्वर के लिए वैध है।सृष्टि के नियम व क़ानून बनाने का अधिकार उसी को है जो उसका रचयिता है।