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    सूरए नहल, आयतें 53-57, (कार्यक्रम 455)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 53 और 54 की तिलावत सुनें। وَمَا بِكُمْ مِنْ نِعْمَةٍ فَمِنَ اللَّهِ ثُمَّ إِذَا مَسَّكُمُ الضُّرُّ فَإِلَيْهِ تَجْأَرُونَ (53) ثُمَّ إِذَا كَشَفَ الضُّرَّ عَنْكُمْ إِذَا فَرِيقٌ مِنْكُمْ بِرَبِّهِمْ يُشْرِكُونَ (54)और तुम्हारे पास जो भी अनुकंपा है वह ईश्वर की ओर से है तो जब भी तुम्हें कोई हानि पहुंचती है तो तुम ईश्वर के समक्ष गिड़गिड़ाते हो। (16:53) फिर जब वह उस कड़ाई को तुम से दूर कर देता है तो तुम में से एक गुट दूसरों को अपने पालनहार का समकक्ष ठहराता है। (16:54)इन आयतों में दो विषयों पर बल दिया गया है, एक तो यह कि सभी अनुकंपाएं और जो कुछ तुम्हारे पास है वह ईश्वर की ओर से है। चाहे वह शारीरिक अनुकंपाएं हों, व्यक्तिगत अनुकंपाएं हों, या फिर पानी, वनस्पति, मिट्टी, पशु तथा धरती व आकाश जैसी बाहरी अनुकंपाएं। तो फिर लोग क्यों दूसरों को ईश्वर का समकक्ष ठहराते हैं और उनका आज्ञापालन करते हैं? ईश्वर के अतिरिक्त किसी की भी उपासना अनेकेश्वरवाद है।इन आयतों में वर्णित दूसरा विषय यह है कि जब कभी प्राकृतिक आपदाओं के कारण या फिर रोग व संकट के कारण वे दुख व समस्या में ग्रस्त होते हैं तो ईश्वर की शरण में आते हैं और उससे प्रार्थना करते हैं कि वह उनके दुखों को समाप्त कर दे किंतु जब उनकी समस्याएं समाप्त हो जाती हैं तो वे ईश्वर को भुला कर अन्य लोगों व वस्तुओं को अपनी समस्याओं के समाधान का कारण बताते हैं, यह भी एक प्रकार का अनेकेश्वरवाद है।इन आयतों से हमने सीखा कि इस बात की ओर से सचेत रहना चाहिए कि ईश्वरीय अनुकंपाओं के कारण प्राप्त होने वाला सुख व ऐश्वर्य हमें ईश्वर की याद की ओर से निश्चेत न कर दे कि इसका परिणाम अनेकेश्वरवाद के रूप में निकलता है।ईश्वर पर ईमान और उससे प्रार्थना, केवल दुखों व कठिनाइयों के समय और अस्थायी व सामयिक नहीं बल्कि स्थायी व निरंतर होनी चाहिए।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 55 की तिलावत सुनें। لِيَكْفُرُوا بِمَا آَتَيْنَاهُمْ فَتَمَتَّعُوا فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ (55)ताकि जो कुछ हमने (अनुकंपाओं में से) उन्हें दिया है, उसके प्रति कृतघ्न रहें। तो आनंद उठाओ कि शीघ्र ही तुम्हें पता चल जाएगा (कि अनुकंपाओं के प्रति कृतघ्नता का दण्ड क्या है?) (16:55)पिछली आयतों के विषय को जारी रखते हुए यह आयत कहती है कि अनुकंपाएं मिलने या कठिनाइयों के समाप्त होने के समय अनेकेश्वरवाद का परिणाम यह होता है कि व्यक्ति अनुकंपाओं के प्रति कृतघ्न हो जाता है और जो कुछ ईश्वर ने उसे प्रदान किया है उसका इन्कार कर देता है।स्वाभाविक है कि इस स्थिति में कृतघ्न व्यक्ति, लोक-परलोक में ईश्वरीय दण्ड में ग्रस्त होगा। यद्यपि वह अनुकंपाओं से लाभ उठाता है किंतु यह उसके कल्याण का कारण नहीं बनता बल्कि कभी-कभी यही अनुकंपाएं उसके लिए दण्ड का कारण बन जाती हैं।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय अनुकंपाओं के प्रति कृतघ्नता, एक प्रकार का कुफ़्र व अनेकेश्वरवाद है जिसका परिणाम ईश्वरीय कोप के रूप में निकलता है।लोगों की कृतघ्नता से ईश्वर अपनी अनुकंपाओं को बंद नहीं करता बल्कि वह उन्हें उनसे लाभान्वित होने का अवसर प्रदान करता है, किंतु यह वस्तुतः उनके लिए मोहलत है जो ईश्वर ने उन्हें दी है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 56 और 57 की तिलावत सुनें। وَيَجْعَلُونَ لِمَا لَا يَعْلَمُونَ نَصِيبًا مِمَّا رَزَقْنَاهُمْ تَاللَّهِ لَتُسْأَلُنَّ عَمَّا كُنْتُمْ تَفْتَرُونَ (56) وَيَجْعَلُونَ لِلَّهِ الْبَنَاتِ سُبْحَانَهُ وَلَهُمْ مَا يَشْتَهُونَ (57)और जो कुछ हमने उन्हें आजीविका स्वरूप प्रदान किया है, अनेकेश्वरवादी उसमें से उन मूर्तियों के लिए भी एक भाग बनाते हैं जो कुछ भी नहीं समझतीं। ईश्वर की सौगंध कि जो कुछ तुम आरोप लगाते हो उसके बारे में तुमसे प्रश्न किया जाएगा। (16:56) और वे ईश्वर के लिए पुत्रियां ठहराते हैं जबकि वह (किसी भी प्रकार की संतान से) पवित्र है तथा अपने लिए वही बात ग्रहण करते हैं जो वे पसंद करते हैं। (16:57)ये आयतें अनेकेश्वरवादियों की अंधविश्वासपूर्ण आस्थाओं तथा अनुचित कर्मों की ओर संकेत करते हुए कहती हैं वे ईश्वरीय अनुकंपाओं का एक भाग मूर्तियों तथा उपासना स्थलों के लिए विशेष कर देते हैं जबकि उन्हें अपने इस कार्य का उत्तर देना होगा कि उन्होंने किस अधिकार से ऐसा किया है और ईश्वरीय अनुकंपाओं से अनेकेश्वरवाद तथा मूर्तीपूजा के लिए लाभ उठाया है।आगे चलकर आयतें कहती हैं कि अनकेश्वरवादी फ़रिश्तों को ईश्वर की पुत्रियां समझते थे। उनकी इस आस्था में तीन मूल त्रुटियां थीं। प्रथम तो यह कि वे ईश्वर के लिए संतान होने की आस्था रखते थे जबकि ईश्वर की कोई संतान नहीं है।दूसरे यह कि वे फ़रिश्तों को लड़कियां समझते थे जबकि फ़रिश्ते पुत्र-पुत्री तथा महिला व पुरुष नहीं होते।और तीसरे यह कि वे लड़कियों को अपने अपमान का कारण समझते थे और कभी-कभी तो उन्हें जीवित धरती में गाड़ देते थे, इस प्रकार जिस बात को वे स्वयं के लिए अपमान समझते थे वही बात ईश्वर से संबंधित कर देते थे।ये सब वे निराधार बातें तथा आरोप हैं जिनका उन्हें उत्तर देना होगा और स्पष्ट है कि उनमें इन निराधार आरोपों का उत्तर देने की क्षमता नहीं है।इन आयतों से हमने सीखा कि हमें इस बात का अधिकार नहीं है कि ईश्वरीय अनुकंपाओं को उस स्थान पर प्रयोग करें जहां ईश्वर राज़ी नहीं है, चाहे विदित रूप में हम उन अनुकंपाओं के स्वामी ही क्यों न हों।ऐसे लोगों या ऐसी वस्तुओं से आशा लगाना तथा उन पर भरोसा करना जिन्हें स्वयं अपने भविष्य के बारे में कोई ज्ञान न हो, ईश्वर पर एक प्रकार का आरोप है।ईश्वर की सांसारिक अनुकंपाएं पथभ्रष्ट लोगों सहित सभी को प्राप्त होती हैं और वह इस संसार में किसी को भी अपनी अनुकंपाओं से वंचित नहीं रखता।