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    सूरए नहल, आयतें 62-65, (कार्यक्रम 457)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 62 की तिलावत सुनें। وَيَجْعَلُونَ لِلَّهِ مَا يَكْرَهُونَ وَتَصِفُ أَلْسِنَتُهُمُ الْكَذِبَ أَنَّ لَهُمُ الْحُسْنَى لَا جَرَمَ أَنَّ لَهُمُ النَّارَ وَأَنَّهُمْ مُفْرَطُونَ (62)और अनेकेश्वरवादी जो कुछ अपने लिए पसंद नहीं करते थे, उसे ईश्वर के लिए गढ़ लेते हैं और उनकी ज़बान झूठ ही यह कहती है कि उनका अंत भला होगा जबकि निश्चित रूप से उनके लिए नरक है और निश्चय ही (नरक में जाने वालों में) वे अग्रणी होंगे। (16:62)इससे पहले हमने बताया था कि अनेकेश्वरवादी अपने पथभ्रष्ठ एवं अंधविश्वासपूर्ण विचारों व आस्थाओं के आधार पर लड़कियों को अपने लिए अपमान व लज्जा का कारण समझते थे जबकि वे फ़रिश्तों को लड़कियां मानते थे तथा उन्हें ईश्वर की पुत्रियां कहते थे।यह आयत कहती है कि किस प्रकार उनकी ज़बान ईश्वर के संबंध में इतना बड़ा झूठ कहती है और वे स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ व उच्च समझते हैं?इस आयत से हमने सीखा कि जो बात हम अपने लिए पसंद नहीं करते उसे दूसरे लोगों के लिए भी पसंद नहीं करना चाहिए, ईश्वर की तो बात ही अलग है कि जो हमारा स्वामी और रचयिता है।हमें स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ नहीं समझना चाहिए तथा अपने मन में यह व्यर्थ विचार नहीं पालना चाहिए कि अच्छा अंत केवल हमारा ही होगा।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 63 की तिलावत सुनें। تَاللَّهِ لَقَدْ أَرْسَلْنَا إِلَى أُمَمٍ مِنْ قَبْلِكَ فَزَيَّنَ لَهُمُ الشَّيْطَانُ أَعْمَالَهُمْ فَهُوَ وَلِيُّهُمُ الْيَوْمَ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ (63)(हे पैग़म्बर!) ईश्वर की सौगंध! हमने आपसे पहले वाली जातियों की ओर भी पैग़म्बरों को भेजा था किंतु शैतान ने उनके (बुरे) कर्मों को उन्हें सुसज्जित करके दिखाया तो आज वही उनका अभिभावक है और उनके लिए अत्यंत पीड़ादायक दण्ड है। (16:63)पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के साथ मक्का नगर के अनेकेश्वरवादियों का व्यवहार अत्यंत बुरा था और उन्हें इस्लाम का निमंत्रण देने के पैग़म्बर के सभी प्रयासों की वे अनदेखी करते थे जिसके कारण पैग़म्बर को बहुत दुख होता था।यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को सांत्वना देते हुए कहती है कि इतिहास में सभी पैग़म्बरों के साथ ऐसा ही व्यवहार किया गया है, सभी पैग़म्बरों को मानसिक यातनाएं झेलनी पड़ी हैं अतः आप इनकी बातों से चिंतित न हों।यह आयत इसी प्रकार मनुष्य के समक्ष मौजूद एक बहुत बड़े ख़तरे की ओर संकेत करते हुए कहती है कि शैतान, बुरे कर्मों को अच्छा करके दिखाता है ताकि लोग उन्हें स्वीकार कर लें और सरलता से अपने बुरे कर्मों को न छोड़ें।इस आयत से हमने सीखा कि विभिन्न जातियों के लिए पैग़म्बर भेजना, एक ईश्वरीय परंपरा है जो पूरे इतिहास में मौजूद रही है।मनुष्य के भीतर शैतान के घुसने का मार्ग, बुराइयों को अच्छा करके दिखाना तथा पापों का औचित्य दर्शाना है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 64 की तिलावत सुनें।وَمَا أَنْزَلْنَا عَلَيْكَ الْكِتَابَ إِلَّا لِتُبَيِّنَ لَهُمُ الَّذِي اخْتَلَفُوا فِيهِ وَهُدًى وَرَحْمَةً لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ (64)(हे पैग़म्बर!) हमने आप पर यह (आसमानी) किताब इस लिए भेजी है ताकि जिस बात में उनके बीच मतभेद है उसे स्पष्ट रूप से बयान कर दीजिए। और यह किताब ईमान वालों के लिए संपूर्ण मार्गदर्शन तथा दया है। (16:64)यह आयत क़ुरआने मजीद को मार्गदर्शन की किताब बताते हुए कहती है कि यह किताब कल्याण व मुक्ति की ओर मनुष्य के मार्गदर्शन के लिए आई है और उसे ईश्वरीय दया की प्राप्ति के मार्ग पर ले जाती है।स्पष्ट है कि मार्गदर्शन के लिए आवश्यक है कि सत्य व असत्य के मार्ग को अलग-अलग करके दिखाया जाए और इनमें से हर मार्ग की विशेषताओं तथा उस मार्ग पर चलने वाले के अंत का वर्णन किया जाए। यदि लोग, ईश्वरीय किताब के आधार पर सत्य व असत्य को पहचान जाएंगे तो मार्गदर्शन के स्रोत तक पहुंच जाएंगे और ईमान ले आएंगे।इस आयत से हमने सीखा कि विचार व कर्म के मतभेद में सत्य व असत्य की कसौटी, क़ुरआने मजीद है और पैग़म्बर का दायित्व ईश्वरीय किताब के आधार पर इस बात का वर्णन करना है।ईश्वर की दया का पात्र बनने की मूल शर्त, उसके मार्गदर्शन को स्वीकार करना है, जो ईश्वरीय मार्गदर्शन को स्वीकार नहीं करता वह ईश्वरीय दया की आशा कैसे रख सकता है?आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 65 की तिलावत सुनें।وَاللَّهُ أَنْزَلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَأَحْيَا بِهِ الْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَا إِنَّ فِي ذَلِكَ لَآَيَةً لِقَوْمٍ يَسْمَعُونَ (65)ईश्वर ने आकाश से पानी उतारा तो उसके माध्यम से उसने मृत धरती को जीवित किया। निश्चित रूप से इसमें उन लोगों के लिए (स्पष्ट) निशानी है जो (सत्य बात को) सुनते हैं। (16:65)पिछली आयत में आसमानी किताब भेजे जाने के माध्यम से लोगों के मार्गदर्शन की ओर संकेत करने के पश्चात क़ुरआने मजीद इस आयत में कहता है कि ईश्वर, वर्षा भेज कर मरी हुई धरती को जीवित करता है। जी हां, क़ुरआने मजीद का आना, वर्षा के आने की भांति ही लोगों के लिए जीवन व कल्याण का कारण है। अल्बत्ता उन लोगों के लिए जो ईश्वरीय आयतों को सुनते, उनके बारे में मंथन करते और उनके संदेशों को अपने जीवन में व्यवहारिक बनाते हैं।वसंत ऋतु का आना स्वयं ईश्वर की निशानियों में से एक है क्योंकि पेड़ों और वनस्पतियों को नया जीवन मिलता है और मृत धरती जीवित हो जाती है। प्रलय के दिन भी मरे हुए लोग, ईश्वर की इच्छा से जीवित होंगे और उन्हें नया जीवन प्राप्त होगा।इस आयत से हमने सीखा कि पानी, जो मनुष्यों और सभी जीवों के जीवन का कारण है, ईश्वर की सबसे बड़ी अनुकंपाओं में से एक है। पानी का बरसना भी अन्य प्राकृतिक एवं भौतिक बातों की भांति ईश्वरीय इच्छा पर निर्भर है।क़ुरआने मजीद की आयतों को पढ़ने और सुनने से मनुष्य का मन व हृदय जीवित होता है और उसे सत्य की पहचान प्राप्त होती है।