islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए नहल, आयतें 66-69, (कार्यक्रम 458)

    सूरए नहल, आयतें 66-69, (कार्यक्रम 458)

    Rate this post

    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 66 की तिलावत सुनें। وَإِنَّ لَكُمْ فِي الْأَنْعَامِ لَعِبْرَةً نُسْقِيكُمْ مِمَّا فِي بُطُونِهِ مِنْ بَيْنِ فَرْثٍ وَدَمٍ لَبَنًا خَالِصًا سَائِغًا لِلشَّارِبِينَ (66)और निश्चित रूप से तुम्हारे लिए चौपायों में शिक्षा (सामग्री) है। जो कुछ उनके पेट में है उसमें से गोबर और रक्त के बीच से हम ही तुम्हें शुद्ध (दूध) से तृप्त करते हैं कि जो पीने वालों के लिए अत्यंत सुखद है। (16:66)इससे पहले कहा गया कि वर्षा की ईश्वरीय अनुकंपा, धरती में जीवन का कारण है। यह आयत ईश्वर की एक अन्य अनुकंपा, दूध की ओर संकेत करती है। ईश्वर कि जो आकाश के बादलों के बीच से जीवन प्रदान करने वाले पानी को बरसाता है, वही दूध को, जो सभी दुग्ध पदार्थों का स्रोत है, चौपायों के पचे हुए आहार तथा उनकी रक्त नाड़ियों के बीच से गुज़ारता है किंतु यह दूध इतना शुद्ध व पवित्र होता है कि इसमें न गोबर की गंध आती है और न ही रक्त का रंग।ऐसा प्रतीत होता है कि ईश्वर ने सभी चौपायों के भीतर एक बहुत बड़ा शोधक तंत्र बना रखा है जो हरे रंग की घास से सफ़ेद रंग का दूध बना कर मनुष्य को प्रदान करता है कि जो एक सुखद पेय है। दूध, पानी भी है और आहार भी तथा मनुष्य के शरीर व बुद्धि के विकास में उसकी बड़ी प्रभावी भूमिका है।इस आयत से हमने सीखा कि चौपायों के बीच दूध बनने का तंत्र तथा रक्त व गोबर के बीच से उसका निकलना, ईश्वर की महान शक्ति तथा मनुष्यों के संबंध में उसकी अपार दया का परिचायक है, अतः मनुष्य को इससे शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए।निष्ठा के लिए समाज में रहते हुए अच्छे व बुरे कारकों का सामना करना आवश्यक है, इस प्रकार से कि मनुष्य अपने निकट के वातावरण से प्रभावित न हो।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 67 की तिलावत सुनें। وَمِنْ ثَمَرَاتِ النَّخِيلِ وَالْأَعْنَابِ تَتَّخِذُونَ مِنْهُ سَكَرًا وَرِزْقًا حَسَنًا إِنَّ فِي ذَلِكَ لَآَيَةً لِقَوْمٍ يَعْقِلُونَ (67)और खजूर के पेड़ तथा अंगूर के फलों से भी तुम मादक पेय एवं भली रोज़ी प्राप्त करते हो। निश्चित रूप से इसमें (भी) बुद्धि से काम लेने वालों के लिए स्पष्ट निशानी है। (16:67)पानी तथा दूध जैसी दो अनुकंपाओं के वर्णन के बाद कि जो दो प्राकृतिक एवं ईश्वरीय पेय हैं, इस आयत में फलों को निचोड़ने से प्राप्त होने वाले पेय पदार्थों की ओर संकेत करते हुए कहा गया है कि तुम लोग खजूर तथा अंगूर के शीरे से भी पेय बनाते हो किंतु उनमें से शराब जैसे कुछ पेय नशा लाने वाले हैं तो कुछ स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हैं।यह बात भी तुम्हारे लिए शिक्षा सामग्री होनी चाहिए और तुम्हें यह पाठ लेना चाहिए कि ईश्वर ने जो कुछ तुम्हें प्रदान किया है वह पवित्र व शुद्ध है और यह तुम हो जो उसे अपवित्र व अशुद्ध बनाते हो।इस आयत से हमने सीखा कि फलों के बीच मनुष्य के लिए पौष्टिकता की दृष्टि से खजूर तथा अंगूर का विशेष स्थान है और इन दोनों फलों से बनने वाली वस्तुओं की संख्या बहुत अधिक है।जो कुछ ईश्वर ने बनाया है वह अच्छा है, यह हम हैं कि जो कभी कभी ईश्वर की बनाई हुई वस्तुओं से अनुचित लाभ उठाते हैं।आइए अब सूरए नहल की आयत नंबर 68 और 69 की तिलावत सुनें। وَأَوْحَى رَبُّكَ إِلَى النَّحْلِ أَنِ اتَّخِذِي مِنَ الْجِبَالِ بُيُوتًا وَمِنَ الشَّجَرِ وَمِمَّا يَعْرِشُونَ (68) ثُمَّ كُلِي مِنْ كُلِّ الثَّمَرَاتِ فَاسْلُكِي سُبُلَ رَبِّكِ ذُلُلًا يَخْرُجُ مِنْ بُطُونِهَا شَرَابٌ مُخْتَلِفٌ أَلْوَانُهُ فِيهِ شِفَاءٌ لِلنَّاسِ إِنَّ فِي ذَلِكَ لَآَيَةً لِقَوْمٍ يَتَفَكَّرُونَ (69)और तुम्हारे पालनहार ने मधुमक्खी के पास अपना संदेश वहि भेजा कि पर्वतों, पेड़ों तथा मकानों की ऊंचाइयों पर अपने लिए छत्ता बना। (16:68) फिर हर प्रकार के फलों का रस चूस, फिर अपने पालनहार द्वारा प्रशस्त किए गए मार्ग पर चल। उसके पेट से एक पेय निकलता है जिसके विभिन्न रंग होते हैं, जो सभी लोगों के लिए स्वास्थ्यदायक है। निसंदेह इसमें चिंतन करने वालों के लिए एक निशानी है। (16:69)पिछली आयत में दूध की अनुकंपा का उल्लेख करने के पश्चात इन आयतों में मनुष्य के लिए एक अन्य ईश्वरीय अनुकंपा अर्थात मधु का वर्णन किया गया है। आयतें कहती हैं कि यह ईश्वर है जिसने मधु मक्खी को यह सिखाया कि वह पर्वतों एवं मरुस्थलों में छत्ता लगाए व फूलों का रस चूसे। यह ईश्वर ही है जिसने इस छोटे से प्राणी में एक बड़ा शोधनतंत्र बना रखा है, इस प्रकार से कि मधुमक्खी जो कुछ चूसती है उसे स्वास्थ्यदायक पदार्थ में परिवर्तित कर देती है।यदि कोई अत्याचारी व्यक्ति फलों से मादक पेय बनाता है तो मधुमक्खी फूलों से मधु बनाती है जिससे अनेक रोगों का उपचार होता है। मधु ऐसा द्रव्य है जिसे कोई भी वस्तु ख़राब नहीं कर सकती और जो हर स्थिति में सभी के लिए प्रभावी एवं लाभदायक है।बहुत विचित्र बात है कि यह छोटा सा प्राणी मधु भी बनाता है और ख़तरनाक विष भी, अतः मनुष्य को चिंतन करके ईश्वर की शक्ति व तत्वदर्शिता को समझना चाहिए और साथ ही ईश्वरीय अनुकंपाओं से उचित ढंग से लाभ उठाना चाहिए।इन आयतों से हमने सीखा कि पशुओं के व्यवहार, उनकी उस प्रवृत्ति के आधार पर होते हैं जो ईश्वर ने उनके भीतर रखी है, जिस प्रकर से पैग़म्बरों के पास आने वाला विशेष ईश्वरीय संदेश, वहि मार्गदर्शन का कारण है उसी प्रकार पशुओं की प्रवृत्ति उनके लिए निर्धारित मार्ग पर चलने का कारण बनती है।मधुमक्खी जैसे छोटे से प्राणी के भीतर मधु, छत्ता व मोम बनाने के साथ ही विष पैदा करने की क्षमता, ईश्वरीय शक्ति की एक निशानी तथा सृष्टि का एक चमत्कार है।