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    सूरए नहल, आयतें 7-11, (कार्यक्रम 445)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर ७ और ८ की तिलावत सुनें।وَتَحْمِلُ أَثْقَالَكُمْ إِلَى بَلَدٍ لَمْ تَكُونُوا بَالِغِيهِ إِلَّا بِشِقِّ الْأَنْفُسِ إِنَّ رَبَّكُمْ لَرَءُوفٌ رَحِيمٌ (7) وَالْخَيْلَ وَالْبِغَالَ وَالْحَمِيرَ لِتَرْكَبُوهَا وَزِينَةً وَيَخْلُقُ مَا لَا تَعْلَمُونَ (8)और चौपाए तुम्हारे बोझ को ऐसे नगरों तक ढोते हैं जहाँ तक तुम (शरीर के) अत्यधिक श्रम के बिना नहीं पहुंचने वाले थे, निश्चित रूप से तुम्हारा पालनहार अत्यधिक कृपालु व दयावान है। (16:7) और (तुम्हारे पालनहार ने) घोड़ों, ख़च्चरों तथा गधों की रचना की ताकि तुम उनकी सवारी कर सको और वे तुम्हारे लिए शोभा का साधन रहें, और तुम्हारा पालनहार ऐसी वस्तुओं की रचना करता है जिन्हें तुम जानते भी नहीं हो। (16:8)इससे पहले हमने कहा था कि ईश्वर ने आकाशों, धरती तथा मनुष्यों की रचना करने के पश्चात पशुओं की रचना की तथा मानव जीवन में उनके विभिन्न लाभों की ओर संकेत किया। ये आयतें मनुष्यों के लिए पशुओं के कुछ अन्य लाभों का वर्णन करती हैं। मनुष्य के पिछले इतिहास में लोगों के सामानों तथा बोझ और यात्रियों को पशुओं के माध्यम से ही एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाया जाता था।आज भी मोटर गाड़ी, रेलगाड़ी तथा विमान जैसे यातायात के आधुनिक साधनों के बावजूद बहुत से ग्रामीण क्षेत्रों में सामान ढोने के लिए पशुओं का ही प्रयोग किया जाता है जबकि पर्वतीय क्षेत्रों में चौपायों विशेष कर ख़च्चर के प्रयोग के अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं होता।रोचक बात यह है कि विकसित संसार में घुड़सवारी गर्व एवं शोभा की बात है तथा अब भी अत्यंत ख़राब मौसम में एवं कठिन पर्वतीय मार्गों से गुज़रने के लिए ख़च्चर तथा घोड़े की उपयोगिता मनुष्य द्वारा बनाई गई गाड़ियों से अधिक है।इन आयतों से हमने सीखा कि यह ईश्वर की दया व कृपा है कि यद्यपि चौपायों की शक्ति मनुष्य से अधिक है किंतु वे उसका आज्ञापालन करते हैं।सृष्टि व रचना के मामले में ईश्वर का हाथ खुला हुआ है और वह अपने ज्ञान तथा तत्वदर्शिता के आधार पर वस्तुओं एवं जीवों की रचना करता है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर ९ की तिलावत सुनें।وَعَلَى اللَّهِ قَصْدُ السَّبِيلِ وَمِنْهَا جَائِرٌ وَلَوْ شَاءَ لَهَدَاكُمْ أَجْمَعِينَ (9)और ईश्वर के लिए आवश्यक है कि वह (अपने बंदों को) संतुलित मार्ग दिखाए और कुछ मार्ग भटकाने वाले होते हैं और यदि ईश्वर चाहता तो तुम सबका (विवश्तापूर्ण) मार्गदर्शन कर देता। (16:9)ईश्वर द्वारा मनुष्य को दी जाने वाली अनुकंपाओं के वर्णन के पश्चात इस आयत में एक अन्य ईश्वरीय अनुकंपा अर्थात मार्गदर्शन की ओर संकेत करते हुए कहा गया है कि मनुष्य के सामने दो मार्ग हैं, एक मार्ग वह है जो ईश्वर ने उसके समक्ष रखा है और जो संतुलन का मार्ग है तथा मनुष्य को गंतव्य तक पहुंचाता है। दूसरा मार्ग पथभ्रष्ठता का है जो उसे कर्म एवं आस्था में कमी तथा अतिशयोक्ति में ग्रस्त करता है और गंतव्य तक पहुंचने से रोक देता है।मनुष्य को इन दोनों मार्गों में से एक का चयन करना चाहिए तथा ईश्वर ने उसे किसी भी मार्ग के चयन में विवश नहीं किया है क्योंकि विवश करने के कारण किए गए कर्म का कोई लाभ नहीं है और ईश्वर की परंपरा भी यह है कि वह लोगों को चयन के लिए स्वतंत्रता प्रदान करता है।इस आयत से हमने सीखा कि जो बातें ईश्वर ने अपने ऊपर अनिवार्य की हैं उनमें से एक लोगों का मार्गदर्शन है किंतु मार्गदर्शन स्वीकार करना या न करना स्वयं लोगों के हाथ में है।चयन का अधिकार, ईश्वर की इच्छा है, अतः किसी को भी कोई धर्म स्वीकार करने के लिए विवश नहीं किया जाना चाहिए।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर १० और ११ की तिलावत सुनें।هُوَ الَّذِي أَنْزَلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً لَكُمْ مِنْهُ شَرَابٌ وَمِنْهُ شَجَرٌ فِيهِ تُسِيمُونَ (10) يُنْبِتُ لَكُمْ بِهِ الزَّرْعَ وَالزَّيْتُونَ وَالنَّخِيلَ وَالْأَعْنَابَ وَمِنْ كُلِّ الثَّمَرَاتِ إِنَّ فِي ذَلِكَ لَآَيَةً لِقَوْمٍ يَتَفَكَّرُونَ (11)वही है जिसने आकाश से तुम्हारे लिए पानी बरसाया जिसमें तुम्हारे लिए पेयजल भी है और जिसमें से पौधे भी (उगते) हैं जिसमें (तुम अपने चौपायों को) चराते हो। (16:10) ईश्वर उसी पानी से तुम्हारे लिए खेत, ज़ैतून के पेड़, खजूर, अंगूर तथा हर प्रकार के फल उगाता है। निश्चित रूप से इस बात में उन लोगों के लिए स्पष्ट निशानी है जो चिंतन करते हैं। (16:11)ये आयतें ईश्वर की सबसे बड़ी एवं सबसे महत्वपूर्ण अनुकंपा अर्थात वर्षा की ओर संकेत करते हुए कहती हैं, यह ईश्वर है जो तुम्हारे लिए पानी बरसाता है जो तुम्हारे और तुम्हारे पशुओं के जीवन का कारण है। इसी पानी से पौधे उगते हैं तथा विभिन्न प्रकार के फल एवं खाद्य सामग्री पैदा होती है जो तुम्हारे तथा तुम्हारे पशुओं के लिए आवश्यक है।यदि तुम इस बारे में सोच विचार करो तो तुम देखोगे कि पानी की अनुकंपा ईश्वर की दया व कृपा की कितनी बड़ी निशानी है। अल्बत्ता इन आयतों में ईश्वर ने विभिन्न फलों में से खजूर, ज़ैतून तथा अंगूर की ओर संकेत किया है और आहार विशेषज्ञों का कहना है कि इन तीन फलों में जितनी पौष्टिकता पाई जाती है उतनी अन्य फलों में नहीं होती।इन आयतों से हमने सीखा कि वर्षा का पानी, पानी भी है और आहार का स्रोत भी है क्योंकि मनुष्य का आहार या तो पौधों से प्राप्त होता है या फिर पशुओं के मांस से और ये दोनों वर्षा पर निर्भर हैं।सृष्टि के बारे में चिंतन और विचार आवश्यक है ताकि मनुष्य यह जान सके कि उगाना किसान का नहीं बल्कि ईश्वर का कार्य है, ईश्वर ने समस्त वस्तुएं मनुष्य के लिए पैदा की हैं तो फिर मनुष्य को पूर्ण रूप से ईश्वर का हो जाना चाहिए।