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    सूरए नहल, आयतें 70-72, (कार्यक्रम 459)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 70 की तिलावत सुनें।وَاللَّهُ خَلَقَكُمْ ثُمَّ يَتَوَفَّاكُمْ وَمِنْكُمْ مَنْ يُرَدُّ إِلَى أَرْذَلِ الْعُمُرِ لِكَيْ لَا يَعْلَمَ بَعْدَ عِلْمٍ شَيْئًا إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ قَدِيرٌ (70)और ईश्वर ने ही तुम्हारी रचना की, फिर वही तुम्हें मृत्यु देता है और तुममें से कुछ को इतनी बुरी आयु तक पलटा दिया जाता है कि वह ज्ञान के बाद भी (बुढ़ापे के कारण) कुछ न जान सके। निश्चित रूप से ईश्वर हर बात का जानने वाला तथा हर बात में सक्षम है। (16:70)इससे पहले वर्षा, पानी, दूध तथा मधु जैसी ईश्वरीय अनुकंपाओं का उल्लेख करने के पश्चात क़ुरआने मजीद इस आयत में मनुष्य की सृष्टि, उसके बुढ़ापे और फिर आयु के अंत में मृत्यु की ओर संकेत करते हुए कहता है कि जिसने तुम्हें पैदा किया है वही तुम्हें इस संसार से ले जाएगा क्योंकि इस संसार में मनुष्य का सदा के लिए रहना, ईश्वर की परम्परा नहीं है।जो लोग इस संसार में लंबी आयु बिताते हैं, समय बीतने के साथ-साथ उनकी शक्ति और क्षमता में कमी होने लगती है, यहां तक कि मनुष्य उन बातों को भी भूलने लगता है जिनका उसे भली भांति ज्ञान था। अतः हमें अपनी अल्पायु में प्रलय के लिए आवश्यक सामग्री एकत्रित करनी चाहिए।इस आयत से हमने सीखा कि जीना और मरना ईश्वर के हाथ में तथा इसमें मनुष्य की कोई भूमिका नहीं है।केवल आयु के लंबी होने का कोई मूल्य नहीं है क्योंकि बहुत से लोग अपनी अल्पायु में ही समाज की अत्यधिक सेवा कर जाते हैं जबकि लंबी आयु वाले बहुत से लोग स्वयं और समाज को क्षति पहुंचाने के अतिरिक्त कुछ नहीं करते।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 71 की तिलावत सुनें।وَاللَّهُ فَضَّلَ بَعْضَكُمْ عَلَى بَعْضٍ فِي الرِّزْقِ فَمَا الَّذِينَ فُضِّلُوا بِرَادِّي رِزْقِهِمْ عَلَى مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُمْ فَهُمْ فِيهِ سَوَاءٌ أَفَبِنِعْمَةِ اللَّهِ يَجْحَدُونَ (71)और ईश्वर ने आजीविका में तुममें से कुछ को कुछ अन्य पर प्राथमिकता दी है, तो जिनको प्राथमिकता दी गई है वे अपनी आजीविका उनकी ओर नहीं पलटा देते जो उनके हाथों के नीचे हैं ताकि सभी बराबर हो जाएं तो क्या वे ईश्वर की अनुकंपा का इन्कार कर रहे हैं? (16:71)रोज़ी या आजीविका में अंतर, ईश्वर की तत्वदर्शिता का एक भाग है क्योंकि यदि सभी लोग हर बात में समान होते तो सामाजिक संबंध, कि जो मनुष्यों की एक दूसरे से विभिन्न आवश्यकताओं के कारण अस्तित्व में आते हैं, स्थापित ही न हो पाते। इस स्थिति में लोगों की परिपूर्णता और दानशीलता, त्याग, संयम, विनम्रता इत्यादि जैसी नैतिक विशेषताएं प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त नहीं होता।इस आधार पर लोगों की योग्यताओं व क्षमताओं में अंतर उनकी रोज़ी में अंतर का कारण बनता है किंतु यह बात सक्षम व ज्ञानी लोगों द्वारा अपने अधीन लोगों पर अत्याचार व ज़ोर-ज़बरदस्ती करने के अर्थ में नहीं है बल्कि इसके विपरीत इसके कारण उन्हें अपने अधीन लोगों की सहायता करनी चाहिए और समाज के लोगों के बीच प्रेम व बंधुत्व का वातावरण उत्पन्न करना चाहिए।इस आयत से हमने सीखा कि रोज़ी में कमी या वृद्धि, मनुष्य की विभिन्न योग्यताओं व क्षमताओं की स्वाभाविक मांग है किंतु इस्लाम ने धनवानों को वंचितों के साथ बंधुत्व और समानता की सिफ़ारिश की है तथा वंचित व दरिद्र लोगों को धनवानों की संपत्ति में सहभागी बताया है।वंचितों की सहायता न करना, एक प्रकार से ईश्वरीय अनुकंपाओं के प्रति कृतघ्नता है और इसके बुरे परिणाम निकलते हैं।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 72 की तिलावत सुनें।وَاللَّهُ جَعَلَ لَكُمْ مِنْ أَنْفُسِكُمْ أَزْوَاجًا وَجَعَلَ لَكُمْ مِنْ أَزْوَاجِكُمْ بَنِينَ وَحَفَدَةً وَرَزَقَكُمْ مِنَ الطَّيِّبَاتِ أَفَبِالْبَاطِلِ يُؤْمِنُونَ وَبِنِعْمَةِ اللَّهِ هُمْ يَكْفُرُونَ (72)और ईश्वर ने तुम्हीं में से तुम्हारा जोड़ा बनाया है और उसी जोड़े से संतान तथा उनकी संतान बनाई है तथा तुम्हें पवित्र वस्तुओं में से आजीविका प्रदान की है तो क्या वे (फिर भी) ग़लत बात पर ही ईमान रखते हैं और ईश्वरीय अनुकंपा का इन्कार करते हैं? (16:72)मनुष्य की सृष्टि, उसके जीवन के विभिन्न चरणों तथा ईश्वर की ओर से लोगों की आजीविका के आवंटन के बारे में पिछली आयतों में चर्चा करने के पश्चात यह आयत परिवार के गठन के विषय की ओर संकेत करते हुए कहती है कि यह ईश्वर है जिसने तुम्हारा जोड़ा बनाया है जो तुम्हारा जीवनसाथी भी है तथा बच्चों और उनके बच्चों के माध्यम से मानवजाति के बाक़ी रहने का कारण भी है।यद्यपि परिवार, समाज की सबसे छोटी इकाई है किंतु वह समाज का आधार समझी जाती है क्योंकि सभी संगठनों व इकाइयों का आधार काल्पनिक व कृत्रिम है और प्राकृतिक व्यवस्था ने मनुष्य के लिए जो एकमात्र इकाई बनाई है, वह परिवार की इकाई है जिसमें मनुष्य का जन्म होता है और वह स्वयं कुछ समय के बाद एक परिवार का गठन करता है।इस आधार पर हर वह कारण जो पारिवारिक व्यवस्था के डगमगाने और ढहने का कारण बने, वह मनुष्य की सामाजिक व्यवस्था को भी कमज़ोर बनाएगा। यही कारण है कि इस्लाम ने विवाह, परिवार के गठन, बच्चों के जन्म तथा उनके अच्छे प्रशिक्षण पर अत्यधिक बल दिया है। यहां तक कि विवाहित लोगों की नमाज़ तथा उपासना को कुंवारे लोगों की नमाज़ व उपासना से अधिक मूल्यवान बताया है। इस्लाम ने एक प्रकार से उपासना तथा विवाह के बीच संबंध स्थापित किया है।खेद के साथ कहना पड़ता है कि आज कल कुछ मानव समाजों में परिवार से इतर अवैध संबंधों का व्यापक प्रचलन इस बात का कारण बना है कि प्रथम तो यह कि बहुत से लोग विवाह और परिवार का गठन नहीं करते और दूसरे यह कि बहुत से विवाह पति-पत्नी के एक दूसरे के साथ विश्वासघात के कारण, टिक नहीं पाते और शीघ्र ही समाप्त हो जाते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर ने परिवार के गठन का आदेश देकर मनुष्य की शारीरिक व भौतिक आवश्यकताओं की भी पूर्ति कर दी है और उसकी आत्मिक व नैतिक आवश्यकताओं को भी पूरा कर दिया है।विवाह न करना और संतान को संसार में न आने देना, एक प्रकार से ईश्वरीय अनुकंपाओं के प्रति कृतघ्नता है।