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    सूरए नहल, आयतें 73-77, (कार्यक्रम 460)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 73 और 74 की तिलावत सुनें। وَيَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَمْلِكُ لَهُمْ رِزْقًا مِنَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ شَيْئًا وَلَا يَسْتَطِيعُونَ (73) فَلَا تَضْرِبُوا لِلَّهِ الْأَمْثَالَ إِنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ وَأَنْتُمْ لَا تَعْلَمُونَ (74)और (अनेकेश्वरवादी) ईश्वर के स्थान पर ऐसी (प्रतिमाओं) को पूजते हैं जो आकाशों और धरती से उनकी आजीविका की स्वामी नहीं हैं और उनमें इसकी क्षमता नहीं है। (16:73) तो इन (प्रतिमाओं) को ईश्वर के समान न समझो। निश्चित रूप से ईश्वर जानता है और तुम नहीं जानते। (16:74)इससे पहले मनुष्यों के लिए ईश्वर की कुछ अनुकंपाओं का वर्णन किया गया और यह बताया गया कि कुछ लोग इन अनुकंपाओं पर ईश्वर के प्रति कृतज्ञ नहीं रहते। ये आयतें उसी विषय को जारी रखते हुए कहती हैं कि अनेकेश्वरवादी यह सोच कर मूर्तियों की पूजा करते थे कि वे उनके भविष्य के संबंध में प्रभावी हैं जबकि मानव जीवन की सबसे महत्वपूर्ण समस्याओं में से एक आजीविका का मामला है।मनुष्य को प्राप्त होने वाली आजीविका, चाहे वह आकाश से आती हो या धरती से निकलती हो, किसी भी रूप में इन मूर्तियों के अधिकार में नहीं है। ये मूर्तियां निर्जीव वस्तुएं हैं जिनकी स्वयं की कोई इच्छा नहीं होती किंतु अनेकेश्वरवादी अपनी अज्ञानता एवं अंधविश्वास के कारण उन्हें अपने भविष्य के संबंध में प्रभावी समझते हैं।वस्तुतः मनुष्यों की ओर से सत्य को न समझ पाने का एक चिन्ह यह है कि वे, कुछ लोगों तथा निर्जीव वस्तुओं को, जिनकी उनके जीवन में कोई भूमिका नहीं है, ईश्वर के समकक्ष समझने लगते हैं और उन्हें भी वही महत्व व स्थान देते हैं जो ईश्वर का है। वे कभी कभी तो ईश्वर को शासक तथा मूर्तियों को उनके मंत्री व दूत बताते हैं, इस प्रकार की समस्त उपमाएं, अनेकेश्वरवादियों की अज्ञानता का चिन्ह हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर के अतिरिक्त किसी भी व्यक्ति अथवा वस्तु की, लोगों की आजीविका के संबंध में कोई भूमिका नहीं है और न ही वे इस प्रकार की भूमिका निभा सकते हैं, तो फिर हम ईश्वर को छोड़ कर उनकी शरण में क्यों जाएं?सत्य के साथ द्वेष व हठधर्म, कुछ लोगों द्वारा ईश्वर के इन्कार का कारण है। इसके अतिरिक्त अज्ञानता भी कुछ अन्य लोगों के कुफ़्र व अनेकेश्वरवाद का कारण बनती है।ईश्वर की विशेषताओं और उसकी रचनाओं की विशेषताओं की आपस में तुलना नहीं करनी चाहिए और किसी भी वस्तु को ईश्वर के समान नहीं समझना चाहिए क्योंकि ईश्वर अनंत व अतुलनीय है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 75 और 76 की तिलावत सुनें। ضَرَبَ اللَّهُ مَثَلًا عَبْدًا مَمْلُوكًا لَا يَقْدِرُ عَلَى شَيْءٍ وَمَنْ رَزَقْنَاهُ مِنَّا رِزْقًا حَسَنًا فَهُوَ يُنْفِقُ مِنْهُ سِرًّا وَجَهْرًا هَلْ يَسْتَوُونَ الْحَمْدُ لِلَّهِ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ (75) وَضَرَبَ اللَّهُ مَثَلًا رَجُلَيْنِ أَحَدُهُمَا أَبْكَمُ لَا يَقْدِرُ عَلَى شَيْءٍ لَا يَقْدِرُ عَلَى شَيْءٍ وَهُوَ كَلٌّ عَلَى مَوْلَاهُ أَيْنَمَا يُوَجِّهْهُ لَا يَأْتِ بِخَيْرٍ هَلْ يَسْتَوِي هُوَ وَمَنْ يَأْمُرُ بِالْعَدْلِ وَهُوَ عَلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ (76)ईश्वर एक दास की उपमा देता है कि जिसे किसी वस्तु पर अधिकार प्राप्त नहीं है और एक वह (व्यक्ति) है जिसे हमने अपनी ओर से अच्छी आजीविका प्रदान की है जिसमें से वह गुप्त रूप से और खुल कर दान दक्षिणा करता है, क्या ये (दोनों) एक समान हैं? समस्त प्रशंसा ईश्वर के लिए है किंतु अधिकांश लोग नहीं जानते। (16:75) और ईश्वर ने एक अन्य उपमा दी है, दो व्यक्ति हैं उनमें से एक गूंगा है और किसी भी काम का सामर्थ्य नहीं रखता और वह अपने स्वामी के लिए एक बोझ है, (इस प्रकार से कि) वह जहां भी उसे भेजता है, उसके लिए कुछ भला (करके) नहीं लाता, क्या यह उसके समान है जो न्याय का आदेश देता है और स्वयं सीधे मार्ग पर है? (16:76)पिछली आयतों में हमने कहा था कि अनेकेश्वरवादी ईश्वर के संबंध में उपमा देते थे और मूर्तियों के साथ उसके संबंध को मंत्रियों के साथ शासक के संबंध के समान बताते थे। ये आयतें कहती हैं कि ईश्वर एक अन्य प्रकार की उपमा देता है और वह एक स्वतंत्र व्यक्ति तथा दास की तुलना है। स्वतंत्र व्यक्ति के पास अपना धन और संपत्ति है और वह उससे जैसे चाहे लाभ उठा सकता है या दूसरों को दे सकता है किंतु किसी का दास जो स्वयं अपने ऊपर भी अधिकार नहीं रखता, किस प्रकार दूसरों को लाभ पहुंचा सकता है? यह उपमा सृष्टि की व्यवस्था में ईश्वर के स्थान का वर्णन करती है। ईश्वर सभी रचनाओं का स्वामी तथा उन्हें आजीविका प्रदान करने वाला है और सभी रचनाएं उसकी शक्ति के अधीन हैं।ईश्वर द्वारा दी गई एक अन्य उपमा में मूर्तियों को गूंगे व बहरे मनुष्यों के समान बताया गया है जो न तो दूसरों की आवश्यकताओं को समझ सकते हैं और न ही उन आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते हैं। वस्तुतः उनका अपना कोई लाभ नहीं होता किंतु उनके मुक़ाबले ईश्वर है जो सुनता भी है और सभी की आवश्यकताओं की पूर्ति करने की भी क्षमता भी रखता है और साथ ही वह न्याय के आधार पर आदेश देता है क्योंकि उसका मार्ग संतुलित व सीधा मार्ग है और हर प्रकार के टेढ़ेपन व पथभ्रष्टता से दूर है। सीधा मार्ग, प्रकाशमयी मार्ग है जो अपने पथिक को बिना भटकाए गंतव्य की ओर ले जाता है।इन आयतों से हमने सीखा कि धार्मिक व आध्यात्मिक मामलों के वर्णन के लिए उचित उपमाओं का प्रयोग करना चाहिए ताकि लोगों में बात ग़लत ढंग से प्रचलित होने का मार्ग प्रशस्त न हो।ईश्वर का मार्ग, संतुलन एवं बीच का मार्ग है जिसमें किसी भी प्रकार का वैचारिक या व्यवहारिक भटकाव नहीं होता, और यही सीधा मार्ग है।आइये अब अब सूरए नहल की आयत नंबर 77 की तिलावत सुनें। وَلِلَّهِ غَيْبُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا أَمْرُ السَّاعَةِ إِلَّا كَلَمْحِ الْبَصَرِ أَوْ هُوَ أَقْرَبُ إِنَّ اللَّهَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (77)और आकाशों व धरती का गुप्त ज्ञान ईश्वर के लिए (विशेष) है और उसके लिए प्रलय लाने का कार्य, पलक झपकने जैसा या उससे भी अधिक निकट है। निश्चित रूप से ईश्वर हर बात में सक्षम है। (16:77)इस आयत में क़ुरआने मजीद कहता है कि यदि तुम्हें आकाशों व धरती के बारे में थोड़ा-बहुत ज्ञान प्राप्त हो गया है तो जान लो कि आकाश और धरती में ऐसी बहुत सी बातें होती हैं जो तुम्हारी बुद्धि और दृष्टि से छिपी हुई हैं और ईश्वर के अतिरिक्त कोई भी उनके बारे में ज्ञान नहीं रखता।मृत्यु के पश्चात तुम सभी को ईश्वर के पास जाना है और उसकी शक्ति ऐसी है कि वह पलक झपकते में सभी मनुष्यों को पुनः जीवित करेगा और फिर अपने न्यायालय में उनके कर्मों का हिसाब-किताब करेगा।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर, न केवल यह कि सृष्टि के गुप्त ज्ञान को जानता है बल्कि वह उस ज्ञान का स्वामी भी है और कोई भी वस्तु उसके स्वामित्व की परिधि से बाहर नहीं है।धरती व आकाश के प्रकट व गुप्त दो रूप हैं और ईश्वर इनके दोनों रूपों का ज्ञान रखता है। प्रलय के दिन संसार का गुप्त रूप भी मनुष्य के सामने आ जाएगा।