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    सूरए नहल, आयतें 78-80, (कार्यक्रम 461)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 78 की तिलावत सुनें। وَاللَّهُ أَخْرَجَكُمْ مِنْ بُطُونِ أُمَّهَاتِكُمْ لَا تَعْلَمُونَ شَيْئًا وَجَعَلَ لَكُمُ السَّمْعَ وَالْأَبْصَارَ وَالْأَفْئِدَةَ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ (78)और ईश्वर ने तुम्हें तुम्हारी माताओं के पेट से ऐसी स्थिति में बाहर निकाला कि तुम कुछ भी नहीं जानते थे और उसने तुम्हारे लिए कान, आंख व हृदय बनाया कि शायद तुम (उसकी अनुकंपाओं पर) उसके प्रति कृतज्ञ रहो। (16:78)ईश्वर इस आयत में मनुष्य की सबसे महत्वपूर्ण एवं मूल्यवान विशेषता अर्थात सोचने व समझने की शक्ति की ओर संकेत करते हुए कहता है कि जब तुमने अपनी माता के पेट से जन्म लिया था तो कुछ भी नहीं जानते थे और आज जो कुछ जानते हो वह उस बुद्धि, आंखों और कानों के कारण है जो ईश्वर ने तुम्हें प्रदान किए हैं। तो फिर तुम इन बड़ी अनुकंपाओं पर ईश्वर के प्रति कृतज्ञता क्यों नहीं प्रकट करते?इस आयत से हमने सीखा कि अपनी पिछली कमियों को याद करना, मनुष्य के भीतर कृतज्ञता की भावना को जीवित व विकसित करता है, अतः मनुष्य के लिए आवश्यक है कि वह कभी-2 अपने अतीत पर भी एक दृष्टि डाल लिया करे।बुद्धि, आंख और कान की अनुकंपा पर वास्तविक कृतज्ञता, ज्ञान की प्राप्ति है क्योंकि ईश्वर कहता है कि तुम नहीं जानते थे, मैंने तुम्हें कान, आंखें और बुद्धि प्रदान की ताकि तुम कृतज्ञता प्रकट कर सको अर्थात ज्ञान प्राप्त कर सको।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 79 की तिलावत सुनें। أَلَمْ يَرَوْا إِلَى الطَّيْرِ مُسَخَّرَاتٍ فِي جَوِّ السَّمَاءِ مَا يُمْسِكُهُنَّ إِلَّا اللَّهُ إِنَّ فِي ذَلِكَ لَآَيَاتٍ لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ (79)क्या वे पक्षियों को नहीं देखते कि आकाश के वायुमण्डल में उड़ान भरते रहते हैं, ईश्वर के अतिरिक्त कोई उन्हें रोके नहीं रखता। इस बात में ईमान वालों के लिए (बड़ी) निशानियां हैं। (16:79)मनुष्य के लिए आंख और कान की अनुकंपाओं का उल्लेख करने के पश्चात इस आयत में ईश्वर पक्षियों की अनुकंपा की ओर संकेत करते हुए कहता है कि आकाश मंर पक्षियों की उड़ान, ईश्वरीय शक्ति की निशानियों में से एक है। उसने इनकी रचना इस प्रकार की है कि ये आकाश में उड़ने की क्षमता रखते हैं। कभी वे अकेले उड़ते हैं, कभी सामूहिक रूप से, कभी व्यवस्थित ढंग से तो कभी अव्यवस्थित ढंग से। हर पक्षी के पंख उसके भार, आकार तथा स्थिति के अनुकूल होते हैं ताकि वह सरलता से उड़ सके।यदि आज मनुष्य छोटे व बड़े विमान बना कर आकाशों में उड़ान भरने में सक्षम हो गया है तो यह बात उसने पक्षियों से सीखी है और हेलिकाप्टर तथा जेट विमानों सहित उड़ने वाली विभिन्न वस्तुओं में प्रयोग की जाने वाली बहुत सी तकनीकें पक्षियों के शरीर में मौजूद व्यवस्था से से ली गई हैं।इस आयत में जो यह कहा गया है कि ईश्वर ही पक्षियों को आकाश में रोके हुए है तो उसका अर्थ यह है कि ईश्वर ने प्रकृति में ऐसे नियम बनाए हैं जिनसे लाभ उठा कर पक्षी आकाश में उड़ान भरते हैं और धरती पर गिरते नहीं।इस आयत से हमने सीखा कि पक्षियों सहित प्राणियों की सृष्टि के बारे में चिंतन करना ईश्वर की इच्छा है और वह चाहता है कि लोग सृष्टि की व्यवस्था के बारे में गहन विचार करें।सभी लोग, पक्षियों की उड़ान को देखते हैं किंतु केवल ईमान वाले ही उन्हें देख कर ईश्वर की शक्ति को समझते हैं और उनके ईमान में वृद्धि होती है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 80 की तिलावत सुनें। وَاللَّهُ جَعَلَ لَكُمْ مِنْ بُيُوتِكُمْ سَكَنًا وَجَعَلَ لَكُمْ مِنْ جُلُودِ الْأَنْعَامِ بُيُوتًا تَسْتَخِفُّونَهَا يَوْمَ ظَعْنِكُمْ وَيَوْمَ إِقَامَتِكُمْ وَمِنْ أَصْوَافِهَا وَأَوْبَارِهَا وَأَشْعَارِهَا أَثَاثًا وَمَتَاعًا إِلَى حِينٍ (80)और ईश्वर ने तुम्हारे घरों को तुम्हारे लिए संतुष्टि का साधन बनाया है तथा चौपायों की खालों से भी (तंबू जैसे) घर बनाए हैं जिन्हें तुम कूच के दिन तथा ठहरने के दिन (एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए) हल्का पाते हो और उनके ऊन, रोयों तथा बालों से तुम्हारे लिए जीवन की आवश्यक सामग्री और एक विशेष समय तक के लिए लाभदायक वस्तुएं बनाई हैं। (16:80)यह आयत चौपायों की खाल, ऊन, बाल, तथा रोयें की अनुकंपा तथा मानव जीवन में इनकी भूमिका की ओर संकेत करती है। आज भी, जब संसार में कृत्रिम पदार्थ का उत्पादन बहुत अधिक है और बहुत सी वस्तुएं इन्हीं पदार्थों से बनती हैं, सबसे उत्तम वस्तुएं वही हैं जो प्राकृतिक पदार्थों तथा पशुओं की खाल व ऊन से बनाई जाती हैं।आज के विकसित संसार में भी सब से अच्छे तंबू वही हैं जो चौपायों की खाल व बालों से बनाए जाते हैं तथा सबसे अच्छे जूते व वस्त्र भी वही हैं जो पशुओं की खाल से तैयार किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त उत्तम क़ालीन वही होता है जो चौपायों के बालों तथा ऊन से बुना जाता है। पशुपालन करने वाले न केवल यह कि इन ईश्वरीय अनुंपाओं से लाभ उठाते हैं बल्कि इन्हें बेच कर अच्छी आय भी प्राप्त करते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि मानव जीवन में चौपायों का महत्व बहुत अधिक है किंतु उनके जीवन में मनुष्य की भूमिका बहुत कम है क्योंकि वे मनुष्य के बिना भी अपना जीवन जारी रख सकते हैं।प्रकृति में मानव आवश्यकताओं से अनुकंपाओं के बीच समन्वय भी मनुष्य के प्रति ईश्वर की अनुकंपाओं में से एक है जो ईश्वर की तत्वदर्शिता का एक चिन्ह है।