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    सूरए नहल, आयतें 81-84, (कार्यक्रम 462)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 81 की तिलावत सुनें।وَاللَّهُ جَعَلَ لَكُمْ مِمَّا خَلَقَ ظِلَالًا وَجَعَلَ لَكُمْ مِنَ الْجِبَالِ أَكْنَانًا وَجَعَلَ لَكُمْ سَرَابِيلَ تَقِيكُمُ الْحَرَّ وَسَرَابِيلَ تَقِيكُمْ بَأْسَكُمْ كَذَلِكَ يُتِمُّ نِعْمَتَهُ عَلَيْكُمْ لَعَلَّكُمْ تُسْلِمُونَ (81) ईश्वर ने जो कुछ बनाया है उसमें से तुम्हारे लिए छायाएं बनाई हैं और पर्वतों में तुम्हारे लिए गुफाएं व शरण स्थल बनाए हैं और तुम्हारे लिए ऐसे वस्त्र बनाए हैं जो तुम्हें गर्मी से बचाते हैं और कुछ ऐसे वस्त्र भी बनाए हैं जो तुम्हारी लड़ाई में तुम्हारी रक्षा करते हैं। इस प्रकार वह तुम पर अपनी अनुकंपा पूरी करता है कि शायद तुम (सही अर्थों में) मुसलमान बन जाओ। (16:81)पिछली आयतों में लोगों के लिए ईश्वरीय अनुकंपाओं के वर्णन के पश्चित इस आयत में कुछ अन्य ईश्वरीय अनुकंपाओं की ओर संकेत किया गया है। इनमें सबसे पहली अनुकंपा, छाया है। यदि छाया न होती उसके महत्व और मूल्य को मनुष्य अधिक बेहतर ढंग से समझ सकता था। यह विशेषता, कि कांच या उस जैसी कुछ अन्य वस्तुओं को छोड़ कर सभी भौतिक वस्तुओं से प्रकाश गुज़र नहीं सकता, इस बात का कारण बनती है कि मनुष्य आराम के समय और गर्मी से बचने के लिए छाया की अनुकंपा से लाभ उठाए। दूसरे शब्दों में मनुष्य के जीवन में छाया का महत्व प्रकाश से कम नहीं है।ईश्वर की दूसरी अनुकंपा, पर्वतों में मौजूद छोटी-बड़ी गुफाएं हैं। पिछली आयतों में नगरों में रहने वालों के लिए घरों की अनुकंपा तथा रेगिस्तानों व मरुस्थलों में रहने वालों के लिए तंबुओं की अनुकंपा की ओर संकेत किया गया था। यह आयत एक अन्य अनुकंपा अर्थात गुफाओं की ओर संकेत करती है जिसमें अतीत में बड़ी संख्या में लोग जीवन बिताते थे और आज भी विभिन्न प्रकार से उनसे लाभ उठाया जाता है।तीसरी अनुकंपा, वस्त्र की अनुकंपा है, चाहे लोगों को सर्दी व गर्मी से सुरक्षित रखने वाले वस्त्र हों अथवा शत्रु के तीरों व गोलियों से सुरक्षित रखने वाले सैनिक वस्त्र हों। ये भी ईश्वरीय अनुकंपाएं हैं क्योंकि इनका कच्चा माल भी ईश्वर की ओर से प्रदान किया गया है और इन्हें सिलने की क्षमता भी ईश्वर के उपकारों में से है।इस आयत से हमने सीखा कि प्रकाश, छाया, आवास और वस्त्र इत्यादि हर वस्तु ईश्वर की अनुकंपा है। बड़ी अनुकंपाएं, हमें छोटी अनुकंपाओं की ओर से निश्चेत न कर दें।ईश्वरीय अनुकंपाओं की याद, मनुष्य के भीतर ईश्वर के समक्ष नत्मस्तक रहने की भावना को जीवित करती है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 82 और 83 की तिलावत सुनें।فَإِنْ تَوَلَّوْا فَإِنَّمَا عَلَيْكَ الْبَلَاغُ الْمُبِينُ (82) يَعْرِفُونَ نِعْمَةَ اللَّهِ ثُمَّ يُنْكِرُونَهَا وَأَكْثَرُهُمُ الْكَافِرُونَ (83)तो (हे पैग़म्बर!) यदि ये लोग (इतना सब देखने के बाद भी आपकी बातों) की ओर से मुंह मोड़ लेते हैं तो आपका दायित्व स्पष्ट रूप से बात पहुंचाने के अतिरिक्त कुछ नहीं है। (16:82) ये लोग ईश्वर की अनुकंपाओं को पहचानते हैं किंतु (उनका) इन्कार करते हैं और इनमें से अधिकांश लोग, काफ़िर तथा कृतघ्न हैं। (16:83)पिछली आयतों में ईश्वरीय अनुकंपाओं के वर्णन के पश्चात ईश्वर इन आयतों में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहता है कि आपका दायित्व केवल स्पष्ट रूप से अपने पालनहार के संदेश को पहुंचाना है। तो यदि कुछ लोग आपकी बात को न मानें और आपकी ओर से मुंह मोड़ लें तो दुखी न हों क्योंकि वे हठधर्मी लोग हैं जो ईश्वरीय अनुकंपाओं तथा सत्य को पहचानते तो हैं किंतु हठधर्म के कारण उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते।क़ुरआने मजीद की कुछ दूसरी आयतों में भी इस बात पर बल दिया गया है कि बहुत से लोगों के कुफ़्र का कारण सत्य एवं वास्तविकता को न समझना अथवा न पहचानना नहीं है बल्कि अहं, द्वेष तथा हठधर्म की भावना के चलते वे सत्य को छिपाते हैं और उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर ने मनुष्य को सत्य की पहचान के मार्ग में उसे स्वीकार करने अथवा उसका इन्कार करने में स्वतंत्र रखा है तथा उसे चयन का अधिकार दिया है किंतु हर मार्ग का परिणाम निर्धारित है।केवल ज्ञान व पहचान पर्याप्त नहीं है, ईमान एवं कर्म भी आवश्यक है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 84 की तिलावत सुनें।وَيَوْمَ نَبْعَثُ مِنْ كُلِّ أُمَّةٍ شَهِيدًا ثُمَّ لَا يُؤْذَنُ لِلَّذِينَ كَفَرُوا وَلَا هُمْ يُسْتَعْتَبُونَ (84)और (याद करो उस दिन को) जिस दिन हम हर जाति में से एक गवाह को खड़ा करेंगे, तो जिन लोगों ने कुफ़्र अपनाया उन्हें (बात करने की) अनुमति नहीं दी जाएगी और न उनकी क्षमा याचना सुनी जाएगी। (16:84)यह आयत दो विषयों की ओर संकेत करती है और दोनों ही का संबंध प्रलय से है। पहला प्रलय में गवाही देने वाले लोगों का विषय है तथा दूसरा प्रलय में अपने पापों पर पश्चाताप तथा क्षमा मांगने का विषय है। ईश्वर पहले विषय के संबंध में कहता है कि प्रलय के दिन हर जाति व हर गुट में से कुछ ऐसे लोगों को गवाह के रूप में उठाया जाएगा जिनकी बात सभी के लिए स्वीकार्य होगी और कोई भी अपने पाप के संबंध में बहाना नहीं बना सकेगा।पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के कथनानुसार प्रलय के दिन उनके परिजन लोगों के कर्मों के गवाह होंगे क्योंकि वे पैग़म्बर की जाति के लोगों के कर्मों को भी देखते हैं और लोगों के लिए ईश्वरीय तर्क भी हैं।दूसरे विषय के बारे में यह आयत कहती है कि पापियों को बात करने की अनुमति नहीं दी जाएगी कि वे अपने पापों के बारे में बहाने बना सकें और तौबा कर सकें क्योंकि लोगों का कर्मपत्र तैयार हो चुका होगा और उसमें कोई परिवर्तन नहीं होगा। तौबा व प्रायश्चित मृत्यु से पहले तक संभव है और मरने के पश्चात मनुष्य का कर्मपत्र बंद हो जाता है।इस आयत से हमने सीखा कि यद्यपि ईश्वर स्वयं न्याय के लिए काफ़ी है किंतु फिर भी वह इस संसार के न्यायालयों की भांति प्रलय के दिन गवाहों को प्रस्तुत करेगा ताकि पापी अपने पापों का इन्कार न कर सकें।जब प्रलय के दिन क्षमा याचना तक नहीं की जा सकती, तो तौबा व प्रायश्चित की तो संभावना ही नहीं है।