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    सूरए नहल, आयतें 85-89, (कार्यक्रम 463)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 85 और 86 की तिलावत सुनें।وَإِذَا رَأَى الَّذِينَ ظَلَمُوا الْعَذَابَ فَلَا يُخَفَّفُ عَنْهُمْ وَلَا هُمْ يُنْظَرُونَ (85) وَإِذَا رَأَى الَّذِينَ أَشْرَكُوا شُرَكَاءَهُمْ قَالُوا رَبَّنَا هَؤُلَاءِ شُرَكَاؤُنَا الَّذِينَ كُنَّا نَدْعُوا مِنْ دُونِكَ فَأَلْقَوْا إِلَيْهِمُ الْقَوْلَ إِنَّكُمْ لَكَاذِبُونَ (86)और जब अत्याचार करने वाले (ईश्वरीय) दण्ड को देखेंगे तो (समझ जाएंगे कि उससे बचने का कोई मार्ग नहीं है) न तो उनको दिए जाने वाले दण्ड में कोई कमी की जाएगी और न ही उन्हें मोहलत दी जाएगी। (16:85) और जब अनेकेश्वरवादी अपने (द्वारा ठहराए गए ईश्वर के) समकक्षों को देखेंगे तो कह उठेंगे हे हमारे पालनहार! यही वे (हमारे ठहराए हुए) समकक्ष हैं जिन्हें हम तुझे छोड़ कर पुकारा करते थे किंतु (उनके वे) समकक्ष उनकी बातें उन्हीं की ओर लौटा देंगे (और कहेंगे कि) निश्चित रूप से तुम लोग झूठे हो। (16:86)ये आयतें, जो प्रलय के दिन अत्याचारियों तथा अनेकेश्वरवादियों की स्थिति का वर्णन करती हैं, ईश्वरीय दण्ड में किसी भी प्रकार की कमी व विलम्ब को नकारते हुए कहती हैं कि कुफ़्र तथा अनेकेश्वरवाद के संबंधमें किसी भी प्रकार का औचित्य एवं बहाना भी स्वीकार नहीं किया जाएगा। यहां तक कि वे प्रतिमाएं भी, जिन्हें अनेकेश्वरवादी, अपने कुफ़्र एवं अनेकेश्वरवाद का कारण बताते हैं, प्रलय के दिन उन्हें ज़बान मिल जाएगी और वे स्वयं को अनेकेश्वरवादियों के इन आरोपों से विरक्त बताते हुए कहेंगी कि तुम झूठ बोल रहे हो कि हमारे कारण तुम अनेकेश्वरवादी हुए बल्कि तुम अपने हठधर्म और द्वेष तथा आंतरिक इच्छाओं के पालन के कारण पैग़म्बरों की बातें स्वीकार करने के बजाए हमारे शरण में आए। वस्तुतः तुमने हमारी नहीं बल्कि अपनी इच्छाओं की उपासना की है।पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा उनके परिजनों के कथनानुसार प्रलय में मनुष्य की विभिन्न परिस्थितियां होंगी। कभी उसके होंठों पर मुहर लगा दी जाएगी और उसके शरीर के अंग, उसके कर्मों की गवाही देंगे। कभी उसको बोलने की अनुमति दी जाएगी, भले ही उसके दावों और बहानों को स्वीकार न किया जाए, जैसा कि कुछ लोग अपने पापों को शैतान की गर्दन पर डालने का प्रयास करेंगे किंतु वह उत्तर में कहेगा कि मैंने तुम्हें विवश नहीं किया था बल्कि केवल बहकाया था।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय दण्ड का कारण स्वयं मनुष्य द्वारा किया जाने वाला पाप, अत्याचार तथा कुफ़्र है और ईश्वर किसी को भी अकारण दण्डित नहीं करता।प्रलय में प्रतिमाओं तथा गढ़े हुए देवताओं को ज़बान मिलेगी और वे अनेकेश्वरवादियों से विरक्तता प्रकट करेंगे तथा अनेकेश्वरवादियों को कहीं शरण नहीं मिलेगी।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 87 और 88 की तिलावत सुनें।وَأَلْقَوْا إِلَى اللَّهِ يَوْمَئِذٍ السَّلَمَ وَضَلَّ عَنْهُمْ مَا كَانُوا يَفْتَرُونَ (87) الَّذِينَ كَفَرُوا وَصَدُّوا عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ زِدْنَاهُمْ عَذَابًا فَوْقَ الْعَذَابِ بِمَا كَانُوا يُفْسِدُونَ (88)और उस दिन अनेकेश्वरवादी ईश्वर के समक्ष सिर झुका देंगे और (ईश्वर के संबंध में) जो कुछ वे गढ़ा करते थे, उनके हाथों से निकल कर समाप्त हो जाएगा। (16:87) जिन लोगों ने कुफ़्र अपनाया तथा लोगों को ईश्वर के मार्ग से रोकते रहे उन्हें निरंतर बिगाड़ पैदा करने के कारण हम दण्ड पर दण्ड देंगे। (16:88)पिछली आयतों में वर्णित बातों के क्रम को जारी रखते हुए ये आयतें प्रलय में अनेकेश्वरवादियों की स्थिति का वर्णन करते हुए कहती हैं कि प्रतिमाओं तथा गढ़े हुए देवताओं द्वारा अनेकेश्वरवादियों से विरक्तता की घोषणा के बाद उनके पास इस बात के अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं होगा कि वे अपने अनुचित कर्मों को स्वीकार करें तथा ईश्वर के समक्ष सिर झुका दें। उनके पास कोई शरण और सहारा नहीं होगा जो उन्हें ईश्वरीय दण्ड से बचा सके। यह साधारण अनेकेश्वरवादियों की स्थिति होगी।जो अनेकेश्वरवादी अन्य लोगों की पथभ्रष्टता का कारण बने होंगे तथा जिन्होंने लोगों को अनेकेश्वरवाद, कुफ़्र तथा पाप का निमंत्रण दिया होगा, उन्हें एक साधारण अनेकेश्वरवादी से अधिक दण्ड सहन करना होगा क्योंकि वे स्वयं तो अनेकेश्वरवादी थे ही, उन्होंने दूसरों को भी अनेकेश्वरवादी बनाया होगा अतः वे उनके पाप में भी सहभागी होंगे।इन आयतों से हमने सीखा कि जो लोग आज ईश्वर तथा उसके आदेशों के समक्ष सिर नहीं झुकाते हैं वे प्रलय के दिन उसके सामने सिर झुकांएगे किंतु तब इसका कोई लाभ नहीं होगा।कुफ़्र तथा अनेकेश्वरवाद, समाज में बुराई का मार्ग प्रशस्त करते हैं तथा समाज में बुराई फैलाने वाले लोग केवल वे नहीं हैं जो समाज की सुरक्षा को ख़तरे में डालते हैं बल्कि वे लोग भी जो समाज की वैचारिक व आस्था संबंधी सुरक्षा के लिए ख़तरा उत्पन्न करते हैं तथा लोगों की पथभ्रष्टता का मार्ग प्रशस्त करते हैं, क़ुरआन की दृष्टि में बुराई फैलान वाले हैं।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 89 की तिलावत सुनें।وَيَوْمَ نَبْعَثُ فِي كُلِّ أُمَّةٍ شَهِيدًا عَلَيْهِمْ مِنْ أَنْفُسِهِمْ وَجِئْنَا بِكَ شَهِيدًا عَلَى هَؤُلَاءِ وَنَزَّلْنَا عَلَيْكَ الْكِتَابَ تِبْيَانًا لِكُلِّ شَيْءٍ وَهُدًى وَرَحْمَةً وَبُشْرَى لِلْمُسْلِمِينَ (89)और जिस दिन हम हर समुदाय में स्वयं उन्हीं में से एक व्यक्ति को उनके विरुद्ध गवाह बना कर उठाएंगे और (हे पैग़म्बर!) हम आपको उन लोगों पर गवाह बना कर लाए तथा आप पर (ऐसी) किताब उतारी जो हर वस्तु को स्पष्ट करके बयान करने वाली तथा मुसलमानों के लिए पथप्रदर्शक, दया व शुभसूचना है। (16:89)यह आयत दो महत्वपूर्ण विषयों की ओर संकेत करती है, प्रथम प्रलय में गवाहों की उपस्थिति तथा सभी गवाहों के गवाह के रूप में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की उपस्थिति, जो सभी पैग़म्बरों तथा ईश्वर के प्रिय बंदों के बीच उनके महत्वपूर्ण स्थान को स्पष्ट करती है और यह कि इन महान हस्तियों को ईश्वर की आज्ञा से लोगों की कथनी व करनी तथा भीतर व बाहर के बारे में सब कुछ ज्ञात है।दूसरा विषय क़ुरआने मजीद का वैभव तथा लोगों के मार्गदर्शन में उसकी महान भूमिका के बारे में है। ईश्वर ने, क़ुरआने मजीद को हर वस्तु को स्पष्ट करने वाला बनाया है कि जो सत्य तथा असत्य की पहचान के लिए आवश्यक है। यह सभी मनुष्यों के प्रति ईश्वर की दया व कृपा को दर्शाता है। अल्बत्ता सभी लोगों के बीच केवल मुसलमान ही, जो क़ुरआने मजीद पर ईमान रखते हैं, उसके वास्तविक मार्गदर्शन, दया व शुभ सूचना से लाभान्वित होते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि संसार में लोगों के कर्मों पर ईश्वर के प्रिय बंदों की निगरानी, प्रलय में उनकी गवाही की भूमिका है।क़ुरआने मजीद, एक संपूर्ण एवं व्यापक किताब है जिसने हर उस बात को बयान कर दिया है जो मनुष्य के मार्गदर्शन के लिए आवश्यक है।