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    सूरए नहल, आयतें 90-92, (कार्यक्रम 464)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 90 की तिलावत सुनें।إِنَّ اللَّهَ يَأْمُرُ بِالْعَدْلِ وَالْإِحْسَانِ وَإِيتَاءِ ذِي الْقُرْبَى وَيَنْهَى عَنِ الْفَحْشَاءِ وَالْمُنْكَرِ وَالْبَغْيِ يَعِظُكُمْ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ (90)निश्चित रूप से ईश्वर न्याय, भलाई और अपने निकटवर्ती लोगों के साथ उपकार का आदेश देता है तथा बुरे व अप्रिय कर्मों एवं दूसरों पर अतिक्रमण से रोकता है। वह तुम्हें उपदेश देता है कि शायद तुम्हें समझ आ जाए। (16:90)यह आयत, जो क़ुरआने मजीद की सबसे अधिक व्यापक आयतों में से एक है, इस संसार में ईमान वालों के मानवीय एवं सामाजिक संबंधों को, न्याय व भलाई तथा हर प्रकार के अत्याचार व अतिक्रमण से दूरी पर आधारित बताती है और इसे एक ईश्वरीय उपदेश का नाम देती है जिसका पालन प्रत्यके व्यक्ति को हर स्थिति में करना चाहिए।न्याय तथा न्याय प्रेम समस्त इस्लामी शिक्षाओं का आधार है। ईश्वर न किसी पर अत्याचार करता है और न इस बात की अनुमति देता है कि कोई किसी पर अत्याचार करे या उसके अधिकार का हनन करे। न्याय के लिए कथनी व करनी में हर प्रकार की कमी व अतिशयोक्ति से बचना आवश्यक है जिससे व्यक्तिगत व सामाजिक व्यवहार में संतुलन आता है।अल्बत्ता इस्लामी शिष्टाचार में मनुष्य को सामाजिक समस्याओं के संबंध में कभी कभी न्याय से भी आगे बढ़ कर काम करना पड़ता है और अन्य लोगों की ग़लतियों को क्षमा करना पड़ता है, यहां तक कि मनुष्य, अन्य लोगों को उनके अधिकार से भी अधिक प्रदान कर सकता है कि जो भलाई और उपकार का चिन्ह है। ईश्वर, जिसने मनुष्यों के प्रति सबसे अधिक भलाई और उपकार किया है, उन्हें अन्य लोगों के संबंध में यही व्यवहार अपनाने का निमंत्रण देता है।दूसरी ओर ईश्वर ने मनुष्य की आत्मा के स्वास्थ्य तथा समाज की शांति व सुरक्षा को सुनिश्चित बनाने के लिए कुछ बातों को वर्जित किया है जिन्हें बुरे व अप्रिय कर्म कहा जाता है। हर बुद्धिमान व्यक्ति, इन बातों की बुराई को भली भांति समझता है।इस आयत से हमने सीखा कि सामाजिक संबंधों में न्याय के साथ ही भलाई व उपकार भी आवश्यक है ताकि समाज के सदस्यों के बीच प्रेम व घनिष्टता बाक़ी रहे।धर्म के आदेश मानवीय बुद्धि एवं प्रवृत्ति से समन्वित हैं। न्याय व भलाई की ओर झुकाव तथा बुराई व अप्रिय बातों से दूरी, सभी मनुष्यों की इच्छा है और धर्म भी इन्हीं बातों का आदेश देता है।लोगों को भलाई का आदेश देने तथा बुराई से रोकने में हमें इस बात की आशा नहीं रखनी चाहिए कि वे हमारी सभी बातों को स्वीकार कर लेंगे। ईश्वर भी जब उपदेश देता है तो कहता है कि शायद तुम्हें समझ आ जाए और तुम स्वीकार कर लो।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 91 और 92 कि तिलावत सुनें।وَأَوْفُوا بِعَهْدِ اللَّهِ إِذَا عَاهَدْتُمْ وَلَا تَنْقُضُوا الْأَيْمَانَ بَعْدَ تَوْكِيدِهَا وَقَدْ جَعَلْتُمُ اللَّهَ عَلَيْكُمْ كَفِيلًا إِنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ مَا تَفْعَلُونَ (91) وَلَا تَكُونُوا كَالَّتِي نَقَضَتْ غَزْلَهَا مِنْ بَعْدِ قُوَّةٍ أَنْكَاثًا تَتَّخِذُونَ أَيْمَانَكُمْ دَخَلًا بَيْنَكُمْ أَنْ تَكُونَ أُمَّةٌ هِيَ أَرْبَى مِنْ أُمَّةٍ إِنَّمَا يَبْلُوكُمُ اللَّهُ بِهِ وَلَيُبَيِّنَنَّ لَكُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ مَا كُنْتُمْ فِيهِ تَخْتَلِفُونَ (92)और जब भी को प्रतिज्ञा करो तो ईश्वर की प्रतिज्ञा का पालन करो और अपनी सौगंधों को उन्हें सुदृढ़ बनाने के बाद मत तोड़ो क्योंकि तुम ईश्वर को अपने लिए गवाह और निरीक्षक बना चुके हो निसंदेह तुम जो कुछ करते हो ईश्वर उससे भली भांति अवगत है। (16:91) और (देखो) उस स्त्री की भांति मत हो जाना जो अपने धागे को मज़बूत कातने के बाद उसे टुकड़े-टुकड़े कर देती है। तुम अपनी सौगंधों को यह सोच कर अपने बीच (धोखे व विश्वासघात) का साधन बनाते हो कि एक गुट दूसरे गुट से अधिक लाभ प्राप्त करे। निश्चित रूप से ईश्वर इन्हीं बातों से तुम्हारी परीक्षा ले रहा है और वह प्रलय के दिन निश्चय ही उस बात को तुम्हारे लिए स्पष्ट कर देगा जिसके बारे में तुम मतभेद कर रहे थे। (16:92)पिछली आयत में सामाजिक व्यवहारों के संबंध में इस्लामी शिष्टाचार के मूलभूत सिद्धांतों का उल्लेख किया गया था और न्याय व भलाई के पालन तथा अत्याचार व अतिक्रमण से दूरी को सामाजिक संबंधों का आधार बताया गया था। ये आयतें सामाजिक संबंधों के एक अत्यंत महत्वपूर्ण मामले की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि प्रतिज्ञा और सौगंध को पूरा करना, चाहे वह ईश्वर के लिए हो अथवा लोगों के लिए, ईश्वर पर ईमान रखने वाले हर व्यक्ति का दायित्व है। यदि ईश्वर से कोई मन्नत मानी है तो काम पूरा हो जाने के बाद उसे पूरा करना चाहिए। यदि आर्थिक या सामाजिक मामलों में कोई कटिबद्धता स्वीकार की है तो उस पर प्रतिबद्ध रहना चाहिए। इसी प्रकार अकारण सौगंध नहीं खानी चाहिए, और यदि कोई सौगंध खाई और उसके संबंध में ईश्वर को साक्षी बनाया तो फिर उसे तोड़ना नहीं चाहिए और ईश्वर तथा अन्य धार्मिक मान्यताओं के सम्मान को बाक़ी रखना चाहिए।यदि हम सत्ता में पहुंचे तो अपने से नीचे वाले तथा कमज़ोर लोगों अथवा सामाजिक गुटों पर न तो अत्याचार करना चाहिए और न ही उनके अधिकारों का हनन करना चाहिए क्योंकि यह सब ईश्वर द्वारा निर्धारित सीमा से आगे बढ़ जाने की परिधि में आता है। अल्बत्ता ईश्वर के साथ प्रतिज्ञा के सामाजिक उदाहरण भी है जिनमें सबसे महत्वपूर्ण ईश्वरीय नेताओं का अनुसरण है जिन्हें ईश्वर ने धरती में अपना उत्तराधिकारी बनाया है।इन आयतों से हमने सीखा कि वचन तोड़ना न केवल यह कि एक अशिष्ट कर्म है बल्कि प्रलय के दिन इसके कारण ईश्वरीय दण्ड का भी सामना करना पड़ेगा।धार्मिक मान्यताओं से खिलवाड़ नहीं करना चाहिए और उन्हें अपनी अवैध इच्छाओं की पूर्ति का साधन नहीं बनाना चाहिए।सत्ता की प्राप्ति, पथभ्रष्टता एवं वचन तोड़ने के मार्गों में से एक है, हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हम ईश्वर के प्रति उत्तरदायी हैं अतः सत्ता की प्राप्ति को ईश्वरीय परीक्षा समझना चाहिए।