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    सूरए नहल, आयतें 93-96, (कार्यक्रम 465)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 93 की तिलावत सुनें।وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ لَجَعَلَكُمْ أُمَّةً وَاحِدَةً وَلَكِنْ يُضِلُّ مَنْ يَشَاءُ وَيَهْدِي مَنْ يَشَاءُ وَلَتُسْأَلُنَّ عَمَّا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ (93)यदि ईश्वर चाहता तो तुम सभी को एक समुदाय बना देता किंतु वह जिसे चाहता है पथभ्रष्ट कर देता है और जिसका चाहता है मार्गदर्शन कर देता है और निश्चित रूप से जो कुछ तुम करते हो उसके बारे में तुम से अवश्य ही पूछा जाएगा। (16:93)यह आयत ईश्वर के साथ मनुष्य के संबंध के बारे में एक मूल सिद्धांत की ओर संकेत करते हुए कहती है कि ईश्वर यह नहीं चाहता कि लोग विवश हो कर ईमान लाएं बल्कि उसकी इच्छा यह रही है कि लोग अपने अधिकार व इच्छा से किसी आस्था व धर्म का चयन करें किंतु चूंकि सभी लोग एक धर्म और एक आस्था का चयन नहीं करते अतः वे सब एक धर्म पर नहीं हैं।अल्बत्ता ईश्वर ने सभी लोगों के मार्गदर्शन के साधन उपलब्ध कराए हैं। भीतर से बौद्धिक एवं स्वाभाविक मार्गदर्शन तथा बाहर से ईश्वरीय पैग़म्बरों एवं आसमानी किताबों के मार्गदर्शन ने सभी को यह अवसर प्रदान कर दिया है कि वे सत्य और असत्य को भली भांति समझ सकें किंतु यदि कोई स्वयं ही पथभ्रष्ट होना चाहे तो ईश्वर उसके आड़े नहीं आता और वह सत्य के मार्ग से विचलित हो सकता है। इसी प्रकार यदि कोई सत्य के मार्ग का चयन करता है तो ईश्वर उसकी सहायता करता है और उसे मार्गदर्शन की राह पर आगे बढ़ाता है।यहां यह भी स्पष्ट है कि ईश्वर द्वारा लोगों को दिए गए चयन के अधिकार से उनके दायित्व प्रभावित नहीं होते और हर किसी को अपने चयन के परिणामों को स्वीकार करते हुए अपने कर्मों का उत्तर देना होगा। इस आधार पर मनुष्य विवश नहीं है और हर कोई स्वयं अपने मार्गदर्शन या पथभ्रष्टता के मार्ग का चयन करता है किंतु इसी के साथ उसके कर्मों के बारे में ईश्वर की ओर से प्रश्न और उन पर पारितोषिक अथवा दण्ड अपने स्थान पर सुरक्षित है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर की परंपराओं में से एक यह है कि उसने लोगों को चयन का अधिकार दिया है और वे अपने जीवन के मार्ग के चयन में स्वतंत्र हैं।मनुष्य के छोटे से छोटे कर्म और व्यवहार के बारे में प्रलय में प्रश्न किया जाएगा।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 94 और 95 की तिलावत सुनें।وَلَا تَتَّخِذُوا أَيْمَانَكُمْ دَخَلًا بَيْنَكُمْ فَتَزِلَّ قَدَمٌ بَعْدَ ثُبُوتِهَا وَتَذُوقُوا السُّوءَ بِمَا صَدَدْتُمْ عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ وَلَكُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ (94) وَلَا تَشْتَرُوا بِعَهْدِ اللَّهِ ثَمَنًا قَلِيلًا إِنَّمَا عِنْدَ اللَّهِ هُوَ خَيْرٌ لَكُمْ إِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ (95)और अपनी सौगंधों को अपने बीच धोखे व विश्वासघात का साधन न बनाओ कि जिसके परिणाम स्वरूप पैर जमने के बाद उखड़ जाएं और लोगों को ईश्वर के मार्ग से रोकने के कारण तुम्हें (दण्ड का) बुरा स्वाद चखना पड़े और तुम्हारे लिए अत्यंत कड़ा दण्ड होगा। (16:94) और ईश्वरीय प्रतिज्ञा का सस्ते दामों पर मामला न करो कि जो कुछ ईश्वर के पास है वही तुम्हारे लिए उत्तम है, यदि तुम समझते हो तो। (16:95)पिछली आयतों में वर्णित ईश्वरीय आदेशों के क्रम को जारी रखते हुए क़ुरआने मजीद इन आयतों में एक बार फिर वचन एवं सौगंध के महत्व की ओर संकेत करता है और कहता है कि सांसारिक हितों की प्राप्ति के लिए वचन और सौगंध से अनुचित लाभ उठाने से धार्मिक मामलों के संबंध में लोगों की आस्थाएं कमज़ोर हो जाती हैं और वे सीधे मार्ग से भटक जाते हैं।तुम्हें भी लोगों को ईश्वर के मार्ग से रोकने के कारण, संसार में भी अत्यंत कठिन व पीड़ादायक जीवन बिताना पड़ेगा और प्रलय में भी ईश्वर के कड़े दण्ड का सामना करना पड़ेगा। इस आधार पर ईश्वर के नाम का, जिसकी तुमने सौगंध खाई है, भौतिक व सांसारिक लाभ प्राप्त करने के लिए सौदा मत करो।इन आयतों से हमने सीखा कि कुछ पाप, दूसरे अनेक पापों का मार्ग प्रशस्त करते हैं अतः उन्हें पहचान कर पापों के विस्तार का मार्ग बंद कर देना चाहिए।ऐसे हर काम को कड़ाई से रोक देना चाहिए जिससे लोगों का धर्म तथा उनकी आस्थाएं कमज़ोर होती हों, चाहे वह काम छोटा ही क्यों न प्रतीत होता हो।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 96 की तिलावत सुनें।مَا عِنْدَكُمْ يَنْفَدُ وَمَا عِنْدَ اللَّهِ بَاقٍ وَلَنَجْزِيَنَّ الَّذِينَ صَبَرُوا أَجْرَهُمْ بِأَحْسَنِ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ (96)जो कुछ तुम्हारे पास है वह समाप्त हो जाएगा और जो ईश्वर के पास है वह बाक़ी रहने वाला है और निश्चित रूप से जिन लोगों ने धैर्य व संयम से काम लिया हम उन्हें उनके अच्छे कर्मों के बदले में पारितोषिक देंगे। (16:96)यह आयत ऐसे कमज़ोर ईमान वाले लोगों की ओर संकेत करते हुए, जो सांसारिक आराम के लिए धार्मिक मान्यताओं से खिलवाड़ करते हैं और प्रलय के अनंत जीवन को इस नश्वर संसार के बदले में बेच देते हैं, कहती है कि यदि यह स्वीकार भी कर लिया जाए कि इस प्रकार के कार्य करके उनकी सांसारिक इच्छाएं पूरी हो जाती हैं तो क्या उन्हें यह ज्ञात नहीं है कि संसार का जीवन अत्यंत अल्पकालीन है और जो कुछ उन्होंने प्राप्त किया है वह शीघ्र ही समाप्त हो जाने वाला है? जबकि यदि वे ईश्वर के साथ सौदा करें तो उनके भले कर्म उसके निकट सुरक्षित रहेंगे जिनका पारितोषिक उन्हें लोक-परलोक में प्राप्त होगा।अल्बत्ता स्वाभाविक है कि इस संसार की वर्जित वस्तुओं से मुंह मोड़ने और केवल वैध वस्तुओं पर संतोष करने के लिए धैर्य व संयम की आवश्यकता है और हर किसी में इसकी क्षमता नहीं होती। अतः आगे चलकर आयत कहती है कि जो लोग हराम अर्थात वर्जित वस्तुओं के संबंध में प्रतिरोध करते हैं और संयम से काम लेते हैं उन्हें साधारण पारितोषिक प्राप्त नहीं होगा बल्कि ईश्वर उन्हें उत्तम पारितोषिक प्रदान करेगा।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय प्रतिज्ञाओं पर कटिबद्ध रहना तथा वर्जित वस्तुओं से मुंह मोड़ना, कठिन है और इसके लिए आंतरिक इच्छाओं से लड़ने की आवश्यकता होती है। अल्बत्ता संसार की वर्जित वस्तुओं से स्वयं को वंचित रखना, प्रलय में कल्याण व मोक्ष का कारण बनता है।मनुष्य का सबसे अच्छा ग्राहक ईश्वर है। वह कम से कम वस्तु को भी अधिकतम मूल्य पर ख़रीदता है और मनुष्य को सफल बना देता है।