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    सूरए नहल, आयतें 97-100, (कार्यक्रम 466)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 97 की तिलावत सुनें।مَنْ عَمِلَ صَالِحًا مِنْ ذَكَرٍ أَوْ أُنْثَى وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَلَنُحْيِيَنَّهُ حَيَاةً طَيِّبَةً وَلَنَجْزِيَنَّهُمْ أَجْرَهُمْ بِأَحْسَنِ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ (97)जो कोई ईश्वर पर ईमान रखता हो, चाहे वह पुरुष हो अथवा स्त्री, और भले कर्म करे तो निश्चित रूप से हम उसे पवित्र व प्रिय जीवन के साथ जीवित रखेंगे और उन्होंने जो भले कर्म किए हैं उन्हें उससे अच्छा पारितोषिक प्रदान करेंगे। (16:97)यह संक्षिप्त सी आयत, लोक-परलोक में ईमान वालों की स्थिति के बारे में क़ुरआने मजीद की मूलभूत आयतों में से एक है। आरंभ में आयत में कहा गया है कि ईश्वर की दृष्टि में वास्तविक मूल्य, ईमान का है और इसमें स्त्री तथा पुरुष में कोई अंतर नहीं है। ईमान वाले स्त्री और पुरुष ईश्वर की दृष्टि में एक समान हैं और उनके स्त्री अथवा पुरुष होने का ईमान के उच्च दर्जों तक पहुंचने में कोई प्रभाव नहीं है।यद्यपि सारे पैग़म्बर पुरुष थे किंतु पैग़म्बरी एक दायित्व है जिसके आधार पर पैग़म्बर को आम लोगों का सामना करना होता है, यह कार्य महिलाओं के लिए बहुत कठिन है इसी लिए यह भार पुरुषों के कांधों पर डाला गया है किंतु ईमान, अध्यात्म एवं परिपूर्णता के दर्जों तक पहुंचने के संबंध में महिलाओं के लिए कोई सीमितता नहीं है। उदाहरण स्वरूप हज़रत ईसा मसीह की माता हज़रत मरयम अलैहस्सलाम ईश्वर के सामिप्य के उस दर्जे तक पहुंच चुकी थीं कि उनके लिए आकाश से खाने-पीने की वस्तुएं आती थीं, या फिर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की सुपुत्री हज़रत फ़ातेमा ज़हरा अलैहस्सलाम आध्यात्मिक परिपूर्णता के उस स्तर तक पहुंच गई थीं कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम की अर्धांगिनी बनीं।अल्बत्ता परिपूर्णता तक पहुंचने के लिए केवल ईमान ही पर्याप्त नहीं है बल्कि भले कर्म करते रहना भी आवश्यक है। भले कर्म भी कुछ विशेष कामों तक सीमित नहीं हैं बल्कि हर वह कार्य जो भले कर्म की परिधि में आता है, अपने आप में अच्छा हो और उसे करने वाले अच्छे इरादे से उसे करें, चाहे वह छोटा काम हो या बड़ा।आगे चलकर आयत कहती है कि वह व्यक्ति जो ईश्वर पर ईमान भी रखता है और भले कर्म भी करता है, उसका पारितोषिक यह है कि उसे संसार में पवित्र जीवन प्राप्त होता है। बुराइयां और पाप उससे दूर रहते हैं और ईश्वर उसे पथभ्रष्टता से बचाए रखता है। प्रलय में भी ईश्वर अपनी दया व कृपा से, उसे उसके कर्मों से अधिक पारितोषिक प्रदान करेगा क्योंकि ईश्वर की परंपरा यह है कि वह दण्ड देने में अपने न्याय से काम लेता है और बुरे कर्म के अनुसार ही दण्ड देता है किंतु पारितोषिक देने में वह अपनी कृपा से काम लेता है और कर्म से अधिक पारितोषिक प्रदान करता है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर के निकट आयु, लिंग, जाति, साक्षरता और सामाजिक स्थिति का कोई महत्व नहीं है बल्कि उसकी दृष्टि में मापदण्ड ईमान और भला कर्म है।जो व्यक्ति ईश्वर पर ईमान नहीं रखता वह इस जीवन में पवित्र जीवन से वंचित रहता है, मानो वह निर्जीव है क्योंकि वास्तविक जीवन केवल ईश्वर पर ईमान रखने वालों के लिए ही है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 98 की तिलावत सुनें।فَإِذَا قَرَأْتَ الْقُرْآَنَ فَاسْتَعِذْ بِاللَّهِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ (98)तो जब भी आप क़ुरआन पढ़ें तो दुत्कारे गए शैतान (की बुराई) से ईश्वर की शरण चाहें। (16:98)यद्यपि इस आयत में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित किया गया है किंतु स्पष्ट है कि संबोधन के पात्र सभी ईमान वाले हैं और विषय के महत्व के कारण, पैग़म्बर को मूल रूप से संबोधित किया गया है। इतिहास में है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम जब भी क़ुरआने मजीद की तिलावत करते तो اعوذ بالله من الشیطان الرّجیم अऊज़ो बिल्लाहे मिनश्शैतानिर्रजीम अवश्य कहते थे।हर भले कर्म में कुछ न कुछ कठिनाइयां और व्यावधान हो सकते हैं, इन्हीं भले कर्मों में से एक क़ुरआने मजीद की तिलावत है जो संभावित रूप से दिखावे के लिए या नकारात्मक प्रतिस्पर्धा के लिए हो सकती है या फिर इसके परिणाम स्वरूप ईश्वरीय कथन के व्यक्तिगत अर्थ निकाले जा सकते हैं। इसी कारण यह आयत कहती है कि क़ुरआने मजीद की तिलावत के समय मनुष्य को हर प्रकार की बुराई से ईश्वर की शरण मांगनी चाहिए क्योंकि, आंतरिक इच्छाएं या विभिन्न प्रकार के दुराग्रह मनुष्य को इस बात की अनुमति नहीं देते कि वह तिलावत से आवश्यक आध्यात्मिक लाभ उठाए।इस आयत से हमने सीखा कि तिलावते क़ुरआन जैसे अत्यंत पवित्र कार्यों में भी शैतान के प्रभाव की ओर से निश्चेत नहीं रहना चाहिए।शैतान के ख़तरे के संबंध में ईश्वर की शरण में जाना चाहिए और उसी से सहायता मांगनी चाहिए।आइये अब अब सूरए नहल की आयत नंबर 99 और 100 की तिलावत सुनें।إِنَّهُ لَيْسَ لَهُ سُلْطَانٌ عَلَى الَّذِينَ آَمَنُوا وَعَلَى رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَ (99) إِنَّمَا سُلْطَانُهُ عَلَى الَّذِينَ يَتَوَلَّوْنَهُ وَالَّذِينَ هُمْ بِهِ مُشْرِكُونَ (100)निश्चित रूप से शैतान को उन लोगों पर कोई नियंत्रण प्राप्त नहीं है जो ईमान लाए तथा अपने पालनहार पर भरोसा करते रहे। (16:99) उसे तो केवल उन्हीं लोगों पर नियंत्रण प्राप्त है जो उससे मित्रता का नाता जोड़ते हैं और जो किसी को ईश्वर का समकक्ष ठहराते हैं। (16:100)पिछली आयत में कहा गया था कि ईमान वालों को शैतान के हथकण्डों से बचने के लिए ईश्वर से शरण मांगनी चाहिए, ये आयतें कहती हैं कि यद्यपि शैतान ईमान वालों के मन व हृदय को अपने नियंत्रण में लेने के प्रयास में रहता है किंतु जो लोग ईश्वर पर भरोसा करें और उससे शरण चाहें वे शैतान के उकसावों व हथकण्डों से सुरक्षित रहेंगे।आगे चलकर आयतें कहती हैं कि शैतान उन लोगों पर नियंत्रण प्राप्त करता है जो किसी को ईश्वर का समकक्ष ठहराते हैं या ईश्वर के अस्तित्व का इन्कार कर देते हैं, या फिर यदि वे मुसलमान हैं तो शैतान के आदेशों का पालन करके अपने भीतर उसके प्रभाव का मार्ग प्रशस्त करते हैं। दूसरे शब्दों में इस प्रकार के लोग शैतान को अपना मित्र समझते हुए उसकी अभिभावकता को स्वीकार कर लेते हैं अन्यथा ईश्वर ने इस बात की अनुमति नहीं दी है कि शैतान, ईमान वालों पर नियंत्रण प्राप्त कर सके।इन आयतों से हमने सीखा कि आरंभ में शैतान, किसी भी मनुष्य पर नियंत्रण नहीं करता बल्कि लोग स्वयं ही अपने ऊपर उसके नियंत्रण का मार्ग प्रशस्त करते हैं।वास्तविक ईमान वाले, अपने ऊपर शैतान के नियंत्रण से सुरक्षित हैं। ईमान एक ऐसी मज़बूत ढाल है जिसके माध्यम से ईमान वाले स्वयं को शैतान के हर प्रकार के आक्रमण से सुरक्षित रख सकत