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    सूरए निसा; आयतें 1-3 (कार्यक्रम 118)

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    सूरए आले इमरान की व्याख्या पिछले कार्यक्रम में समाप्त हो गई और अब हम क़ुरआन मजीद के चौथे सूरे अर्थात सूरए निसा की आयतों की व्याख्या आरंभ कर रहे हैं। सूरए निसा में 176 आयतें हैं और यह सूरा मदीना नगर में उतरा है। चूंकि इस सूरे की अधिकांश आयतें परिवार की समस्याओं और परिवार में महिलाओं के अधिकारों से संबंधित हैं इसलिए इसे सूरए निसा कहा गया है जिसका अर्थ होता है महिलाएं।तो आइये इस सूरे की पहली आयत की तिलावत सुनें।بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ يَا أَيُّهَا النَّاسُ اتَّقُوا رَبَّكُمُ الَّذِي خَلَقَكُمْ مِنْ نَفْسٍ وَاحِدَةٍ وَخَلَقَ مِنْهَا زَوْجَهَا وَبَثَّ مِنْهُمَا رِجَالًا كَثِيرًا وَنِسَاءً وَاتَّقُوا اللَّهَ الَّذِي تَسَاءَلُونَ بِهِ وَالْأَرْحَامَ إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَلَيْكُمْ رَقِيبًا (1)अल्लाह के नाम से जो अत्यन्त कृपाशील और दयावान है। हे लोगो! अपने पालनहार से डरो जिसने तुम्हें एक जीव से पैदा किया है और उसी जीव से उसके जोड़े को भी पैदा किया और उन दोनों से अनेक पुरुषों व महिलाओं को धरती में फैला दिया तथा उस ईश्वर से डरो जिसके द्वारा तुम एक दूसरे से सहायता चाहते हो और रिश्तों नातों को तोड़ने से बचो (कि) नि:संदेह ईश्वर सदैव तुम्हारी निगरानी करता है। (4:1) यह सूरा, जो पारीवारिक समस्याओं के बारे में है, ईश्वर से भय रखने के साथ आरंभ होता है और पहली ही आयत में यह सिफारिश दो बार दोहराई गई है क्योंकि हर व्यक्ति का जन्म व प्रशिक्षण परिवार में होता है और यदि इन कामों का आधार ईश्वरीय आदेशों पर न हो तो व्यक्ति और समाज के आत्मिक व मानसिक स्वास्थ्य की कोई ज़मानत नहीं होगी। ईश्वर मनुष्यों के बीच हर प्रकार के वर्चस्ववाद की रोकथाम के लिए कहता है कि तुम सब एक ही मनुष्य से बनाये गये हो और तुम्हारा रचयिता भी एक है अत: ईश्वर से डरते रहो और यह मत सोचो कि वर्ण, जाति अथवा भाषा वर्चस्व का कारण बन सकती है, यहां तक कि शारीरिक व आत्मिक दृष्टि से अंतर रखने वाले पुरुष व स्त्री को भी एक दूसरे पर वरीयता प्राप्त नहीं है क्योंकि दोनों की सामग्री एक ही है और सबकी जड़ एक ही माता पिता हैं। क़ुरआने मजीद की अन्य आयतों में ईश्वर ने माता-पिता के साथ भलाई का उल्लेख अपने आदेश के पालन के साथ किया है और इस प्रकार उसने मापा-पिता के उच्च स्थान को स्पष्ट किया है परंतु इस आयत में न केवल माता-पिता बल्कि अपने नाम के साथ उसने सभी नातेदारों के अधिकारों के सममान को आवश्यक बताया है तथा लोगों को उन पर हर प्रकार के अत्याचार से रोका है। इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम एक सामाजिक धर्म है। अत: वह परिवार तथा समाज में मनुष्यों के आपसी संबंधों पर ध्यान देता है और ईश्वर ने भय तथा अपनी उपासना का आवश्यक भाग, अन्य लोगों के अधिकारों के सम्मान को बताया है। मानव समाज में एकता व एकजुटता होनी चाहिये क्योंकि लोगों के बीच वर्ण, जाति, भाषा व क्षेत्र संबंधी हर प्रकार का भेद-भाव वर्जित है। ईश्वर ने सभी को एक माता पिता से पैदा किया है। सभी मनुष्य एक दूसरे के नातेदार हैं क्योंकि सभी एक माता-पिता से हैं। अत: सभी मनुष्यों से प्रेम करना चाहिये और अपने निकट संबंधियों की भांति उनका सम्मान करना चाहिये। ईश्वर हमारी नीयतों व कर्मों से पूर्ण रूप से अवगत है। अत: न हमें अपने मन में स्वयं के लिए विशिष्टता की भावना रखनी चाहिये और न व्यवहार में दूसरों के साथ ऐसा रवैया रखना चाहिये। आइये अब सूरे निसा की दूसरी आयत की तिलावत सुनें।وَآَتُوا الْيَتَامَى أَمْوَالَهُمْ وَلَا تَتَبَدَّلُوا الْخَبِيثَ بِالطَّيِّبِ وَلَا تَأْكُلُوا أَمْوَالَهُمْ إِلَى أَمْوَالِكُمْ إِنَّهُ كَانَ حُوبًا كَبِيرًا (2)अनाथों का माल उन्हें दे दो और अपना ख़राब माल उनके अच्छे माल से मत बदलो और उनके माल को अपने माल की ओर मत खींचो कि नि: संदेह यह बहुत बड़ा पाप है। (4:2) यह आयत सभी मानव समाजों में पाई जाने वाली एक समस्या अर्थात असहाय अनाथों की ओर संकेत करती है जो विरासत में मिलने वाली सम्पत्ति की रक्षा की क्षमता नहीं रखते। अत: वह सम्पत्ति उनके अभिभावक के नियंत्रण में आ जाती है और वह उसका ग़लत प्रयोग कर सकता है। इस आयत का सबसे स्पष्ट उदाहरण वे छोटे-छोटे बच्चे हैं जिनके माता-पिता का निधन हो जाता है तो अभिभावक बच्चों के अधिकारों को दृष्टिगत रखे बिना उत्तराधिकार में मिले धन को आपस में बांट लेते हैं और विरासत में से उन्हें कुछ भी नहीं देते या देते भी हैं तो अपनी इच्छा के अनुसार, न उस मात्रा में जो ईश्वर ने विरासत के संबंध में निर्धारित की है। यह आयत अनाथों के माल में हर प्रकार की गड़-बड़ या उसे प्रयोग करने से रोकते हुए इसे एक बड़ा पाप बताती है क्योंकि अनाथ के अभिभावक का कर्तव्य, अनाथ के माल की देखभाल तथा बड़े होने पर उसे उसके हवाले करना है न यह कि वह स्वयं को ही उसके माल का मालिक समझे बैठे और जैसा चाहे उस सम्पत्ति का प्रयोग करे।इस आयत से हमने सीखा कि अनाथों का माल उन्हें देना चाहिये, चाहे वे न जानते हों या भूल गये हों।बच्चे भी सम्पत्ति के मालिक होते हैं परंतु जब तक वे वयस्क न हो जायें, उसे प्रयोग नहीं कर सकते।इस्लाम समाज के वंचित और बेसहारा लोगों पर ध्यान देता है और उनका समर्थन करता है।आइये अब सूरए निसा की तीसरी आयत की तिलावत सुनें।وَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا تُقْسِطُوا فِي الْيَتَامَى فَانْكِحُوا مَا طَابَ لَكُمْ مِنَ النِّسَاءِ مَثْنَى وَثُلَاثَ وَرُبَاعَ فَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا تَعْدِلُوا فَوَاحِدَةً أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ ذَلِكَ أَدْنَى أَلَّا تَعُولُوا (3)और यदि तुम्हें भय हो कि तुम अनाथ लड़कियों के संबंध में न्याय नहीं कर सकोगे तो उनसे विवाह मत करो और अपनी पसंद की महिलाओं में दो, तीन या चार से विवाह करो, फिर यदि तुम्हें भय हो कि अपनी पत्नियों के बीच न्यायपूर्ण व्यवहार नहीं कर पाओगे तो केवल एक से विवाह करो या उन दासियों को, जिनके तुम स्वामी हो, अपनी पत्नी बना लो। यह उत्तम मार्ग है ताकि तुम अत्याचार न करो। (4:3)यह आयत अनाथ लड़कियों के संबंध में है जिन पर सदैव अधिक अत्याचार होते हैं। इसी कारण ईश्वर ने उनके बारे में अलग से बात की है और उन पर हर प्रकार के अत्याचार से रोका है। अवसर की खोज में रहने वाले लोग अनाथ लड़कियों के माल पर क़ब्ज़ा करने के लिए उनसे विवाह का प्रस्ताव रख सकते हैं और इस मार्ग में हर प्रकार का ग़लत कार्य कर सकते हैं पंरतु क़ुरआन कहता है कि यदि अनाथ लड़कियों से विवाह में तुम्में इस बात की तनिक भी संभावना हो कि तुम अत्याचार कर बैठोगे तो यह विवाह मत करो।इस्लामी इतिहास की पुस्तकों में वर्णित है कि इस्लाम के आरंभिक काल में कुछ दुष्ट लोग अनाथ लड़कियों की अभिभावकता स्वीकार करते हुए उन्हें अपने घर ले आते थे परन्तु कुछ समय बीतने के पश्चात उनसे विवाह कर लेते थे तथा न केवय यह कि उनकी सम्पत्ति पर क़ब्ज़ा कर लेते थे बल्कि उनका मेहर भी सामान्य से कम देते थे। ईश्वर ने इसी सूरे की १२७वीं आयत भेज कर अनाथ लड़कियों के संबंध में हर प्रकार के अन्याय से रोका है। चूंकि अनेक पुरुष अनाथ लड़कियों से दूसरी, तीसरी या चौथी पत्नी के रूप में विवाह करते थे अत: क़ुरआन उन लड़कियों के सम्मान की रक्षा के लिए कहता है कि यदि तुम दूसरी शादी करना चाहते हो तो इन अनाथ लड़कियों से क्यों करते हो? अन्य महिलाओं से विवाह करो या कम से कम अपनी दासियों से ही विवाह कर लो।यद्यपि यह आयत पुरुषों को चार विवाह की अनुमति देती है परंतु इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि यह इस्लाम की पहल नहीं है बल्कि यह एक सामाजिक व्यवस्था थी और है तथा परिवार के सम्मान की रक्षा के लिए इस्लाम ने इस संबंध में कड़े क़ानून रखे हैं। दूसरे शब्दों में बहुविवाह का विषय इस्लाम ने प्रस्तुत नहीं किया है बल्कि यह उस समय के समाज की वास्तविकता थी जिसे इस्लाम ने विशेष क़ानून बनाकर नियंत्रित किया है।वास्तविकता यह है कि महिलाओं के मुक़ाबले में पुरुषों को जान का ख़तरा अधिक होता है। युद्धों और झड़पों में पुरुष ही मारे जाते हैं और महिलाएं विधवा हो जाती हैं। इसी प्रकार प्रतिदिन के अन्य कामों में भी पुरुषों को महिलाओं से अधिक ख़तरा रहता है तथा हर समाज में पुरुषों की मृत्यु दर महिलाओं की मृत्यु दर से कहीं अधिक होती है, तो क्या ऐसे पुरुषों की पत्नियों से यह कहा जा सकता है कि चूंकि तुम्हारे पति मर चुके हैं अत: तुम अपने जीवन के अंत तक अभिभावक के बिना रहो? और दूसरी ओर क्या युवाओं को यह आदेश दिया जा सकता है कि विधवा व बच्चों वाली महिलाओं से विवाह करें यहां तक कि पश्चिमी समाजों में, जो इस्लाम के इस क़ानून को महिला अधिकारों का विरोधी समझते हैं, अनेक महिलाओं व पुरुषों के बीच अवैध संबंध होते हैं और इस संबंध में उनके यहां कोई नियम नहीं है। इस्लाम मनुष्य की प्राकृतिक इच्छाओं के आधार पर इस पारस्परिक आवश्यकता को नकारना नहीं चाहता और इस संबंध में उसने विशेष क़ानून बनाये हैं तथा उनकी संख्या को सीमित किया है और इसकी सबसे महत्वपूर्ण शर्त पत्नियों के बीच न्याय है।क्या इसे महिला अधिकारों के विरुद्ध कहा जा सकता है? और जिन समाजों में महिलाओं तथा पुरुषों के बीच संबंधों के लिए कोई नियम और क़ानून नहीं है तथा स्वतंत्रता के झूठे नारों के साथ हर प्रकार के संबंधों यहां तक कि विवाहित महिला के साथ भी अवैध संबंधों की अनुमति होती है तो क्या यह महिला के अधिकारों के हित में है? पवित्र क़ुरआन इस संबंध में स्पष्ट रूप से कहता है कि यदि तुम अपनी पत्नियों के बीच न्याय नहीं कर सकते तो एक से अधिक विवाह मत करो।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम ने अनाथ लड़कियों के सम्मान की रक्षा और उनकी सम्पत्ति के ग़लत प्रयोग को रोकने के लिए उनके साथ व्यवहार, यहां तक कि उनके साथ विवाह के लिए जो मानदंड बनाया है, वह न्याय का पालन है।विवाह हेतु जोड़े के चयन की एक शर्त हार्दिक लगाव व रुचि है। किसी को किसी के साथ विवाह के लिए विवश नहीं किया जा सकता। यदि कोई बहुविवाह के विषय से ग़लत लाभ उठाता है तो यह इस विषय के ग़लत होने की निशानी नहीं है बल्कि इसके विपरीत इस विषय के प्रति समाज की आवश्यकता और इसके लिए विशेष के निर्धारण की आवश्यकता को दर्शाता है।