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    सूरए आले इमरान; आयतें १२१-१२५ (कार्यक्रम 102)

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    आइए पहले सूरए आले इमरान की १२१वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَإِذْ غَدَوْتَ مِنْ أَهْلِكَ تُبَوِّئُ الْمُؤْمِنِينَ مَقَاعِدَ لِلْقِتَالِ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ (121)(हे पैग़म्बर! याद करो) जब तुम ईमान वालों को युद्ध के लिए तैयार करने हेतु सुबह तड़के अपने घर से बाहर आए। और ईश्वर (तुम्हारी हर बात और कर्म को) सुनने और जानने वाला है। (3:121) यह आयत उन आयतों का आरंभ है जिनमें ओहद नामक युद्ध और उसकी कठिनाइयों का वर्णन किया गया है। दूसरी हिजरी शताब्दी में मक्के के समीप होने वाले बद्र नामक युद्ध के पश्चात, जिसमें कई अनेकेश्वरवादी मारे या बंदी बना लिए गए थे, मक्के के अनेकेश्वरवादियों के मुखिया अबू सुफ़यान ने कहा कि जब तक मैं मुसलमानों से अपना प्रतिशोध न ले लूं चैन से नहीं बैठूंगा। अतः अगले ही वर्ष मक्के के काफ़िरों ने एक बहुत बड़े लश्कर तथा बहुत अधिक अस्त्रों और शस्त्रों के साथ मदीने पर चढ़ाई कर दी। शत्रु के आगे बढ़ने की सूचना जब पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को मिली तो उन्होंने एक बैठक बुलाई और मुसलमानों से शत्रु का मुक़ाबला करने की पद्धति के बारे में परामर्श किया। मदीने के वृद्ध लोगों ने कहा कि हम लोग नगर में ही रहें और अपने घरों को ही मोर्चा बनाएं परन्तु उत्साही युवाओं ने कहा कि मदीने से बाहर निकल कर साहसपूर्ण ढंग से शत्रु का मुक़ाबला किया जाए। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने मतदान करवाया जिसमें युवाओं की राय को बहुमत मिल गया। यद्यपि पैग़म्बर स्वयं भी नगर में रुक कर ही शत्रु का मुक़ाबला करना चाहते थे किंतु युवाओं की पवित्र भावनाओं के सम्मान में उन्होंने अपनी व्यक्तिगत राय की अनदेखी कर दी। इसके पश्चात आपने नमाज़े जुमा के ख़ुत्बे में लोगों को शत्रु के आक्रमण से अवगत करवाया। नमाज़ के पश्चात एक हज़ार लोगों को अपने साथ लेकर वे आगे बढ़े। मार्ग से ही कुछ लोग, जो मदीना नगर से बाहर निकलने के पक्ष में नहीं थे, वापस लौट गए जिससे मुसलमानों की संख्या घटकर ७०० रह गई। इस बीच शत्रु मदीना नगर के समीप पहुंच चुका था। दोनों सेनाएं ओहद नामक पर्वत के आंचल में एक-दूसरे के सामने आईं। इस प्रकार युद्ध आरंभ हुआ। मुसलमानों के ताबड़-तोड़ आक्रमण के कारण क़ुरैश की सेना में खलबली मच गई और उन्होंने भागना आरंभ कर दिया। कुछ मुसलमानों ने यह सोचकर कि शत्रु को पराजय हो गई है अपने महत्वपूर्ण मोर्चों को छोड़ दिया और वे शत्रु द्वारा छोड़ी हुई वस्तुओं को एकत्रित करने में लग गए। इस अवसर का लाभ उठाकर शत्रु ने अचानक ही पीछे से आक्रमण कर दिया। मुसलमानों की इस निश्चेतना और अवज्ञा का परिणाम उनमें से कई के शहीद, घायल और फ़रार होने के रूप में सामने आया। इस बीच पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के शहीद होने की अफ़वाह ने मुसलमानों के बीच अधिक खलबली मचा दी और वे भागने लगे। इस प्रकार ओहद के युद्ध में, जिसमें मुसलमानों को विजय निश्चित दिखाई पड़ रही थी, उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा। यह पराजय सदा के लिए उनके लिए शिक्षा सामग्री बन गई। इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर केवल ईश्वरीय आदेशों को पहुंचाने का दायित्व नहीं है बल्कि उन्हें लागू करना तथा धर्म के शत्रुओं से मुक़ाबला करना भी उनके कर्तव्यों में शामिल है। मुसलमानों पर भी केवल अपने व्यक्तिगत कर्तव्यों के पालन का दायित्व नहीं है बल्कि धर्म और इस्लामी समाज की सुरक्षा भी हर मुसलमान का कर्तव्य है। यद्यपि घर चलाना और बच्चों की देखभाल एक महत्वपूर्ण कार्य है परन्तु धर्म की रक्षा इससे भी महत्वपूर्ण है।आइए अब सूरए आल इमरान की १२२वीं और १२३वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।إِذْ هَمَّتْ طَائِفَتَانِ مِنْكُمْ أَنْ تَفْشَلَا وَاللَّهُ وَلِيُّهُمَا وَعَلَى اللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُونَ (122) وَلَقَدْ نَصَرَكُمُ اللَّهُ بِبَدْرٍ وَأَنْتُمْ أَذِلَّةٌ فَاتَّقُوا اللَّهَ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ (123)(याद करो उस समय को) जब तुम में से दो गुटों ने सुस्ती की (और युद्ध से भागना चाहा) परन्तु ईश्वर ने उनकी सहायता की और उन्हें इस विचार से रोके रखा। और ईमान वालों को केवल ईश्वर पर ही भरोसा करना चाहिए। (3:122) और निःसन्देह, बद्र (के युद्ध) में ईश्वर ने तुम्हारी सहायता की जबकि तुम हर दृष्टि से अक्षम और दुर्बल थे। तो ईश्वर से डरते रहो कि शायद तुम (उसकी विभूतियों के प्रति) कृतज्ञ हो सको। (3:123) औस तथा ख़ज़रज नामक दो क़बीलों के लोगों ने, जो पैग़म्बर के साथ आए थे, जब शत्रु की विशाल सेना को देखा तो वे भयभीत हो गए और इस बहाने के साथ कि परामर्श के समय उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया रणक्षेत्र से भागना चाहा किंतु ईश्वर की कृपा और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के समझाने से उन्होंने अपना यह निर्णय त्याग दिया और वे शैतान के इस जाल में नहीं फ़ंसे। यह आयत उन्हें तथा अन्य मुसलमानों को संबोधित करते हुए कहती है कि तुम लोग जो बद्र के युद्ध में ईश्वरीय सहायता को देख चुके हो कि किस प्रकार से सैनिक एवं अन्य संभावनाएं कम होने के बाद भी ईश्वर ने तुम्हें मज़बूत शत्रु के मुक़ाबले में विजय प्रदान की, तो फिर इस युद्ध में तुम लोग क्यों सुस्ती कर रहे हो? तुम लोग अपने धर्म की रक्षा में क्यों सुदृढ़ नहीं हो? तुम लोग शत्रु से नहीं बल्कि ईश्वर की अवज्ञा से डरो। केवल ईश्वर पर ही भरोसा करो। इस दशा में तुम वास्तव में ईश्वर और उसकी कृपा तथा विभूतियों के कृतज्ञ रहोगे। इन आयतों से हमने सीखा कि ईमान वालों को ईश्वर, उनके हाल पर नहीं छोड़ देता बल्कि अपनी शक्ति द्वारा वह शत्रुओं से उनकी सुरक्षा करता है। युद्ध से डरना, युद्ध से सुस्ती और भागने का कारण बनता है। इस समस्या का उपचार केवल ईश्वर पर ईमान और भरोसा है। ईश्वर न केवल हमारे कर्मों बल्कि हमारी आंतरिक इच्छा और भावनाओं से भी अवगत है। इन आयतों में वह अपने पैग़म्बर को, कुछ मुसलमानों के युद्ध से भागने के निर्णय की सूचना देता है। ईश्वरीय सहायताओं के प्रति कृतज्ञता, उससे भयभीत रहकर प्रकट करनी चाहिए अन्यथा यह घमण्ड और युद्ध में पराजय का कारण बनती है।आइए अब सूरए आले इमरान की १२४वीं और १२५वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।إِذْ تَقُولُ لِلْمُؤْمِنِينَ أَلَنْ يَكْفِيَكُمْ أَنْ يُمِدَّكُمْ رَبُّكُمْ بِثَلَاثَةِ آَلَافٍ مِنَ الْمَلَائِكَةِ مُنْزَلِينَ (124) بَلَى إِنْ تَصْبِرُوا وَتَتَّقُوا وَيَأْتُوكُمْ مِنْ فَوْرِهِمْ هَذَا يُمْدِدْكُمْ رَبُّكُمْ بِخَمْسَةِ آَلَافٍ مِنَ الْمَلَائِكَةِ مُسَوِّمِينَ (125)(हे पैग़म्बर! याद करो उस समय को) जब तुमने ईमान वालों से कहा था कि क्या तुम्हारे लिए यह पर्याप्त नहीं है कि ईश्वर तीन हज़ार फ़रिश्तों को उतार कर तुम्हारी सहायता करे? (3:124) क्यों नहीं, यदि तुम संयम रखो और ईश्वर से डरते रहो। और जब भी शत्रु तीव्रता के साथ क्रोध में तुमपर आक्रमण करेगा तो तुम्हारा पालनहार अपने पांच हज़ार विशेष फ़रिश्तों द्वारा तुम्हारी सहायता करेगा। (3:125) ईश्वरीय सहायता का उल्लेख करने वाली यह आयतें काफ़िरों से जेहाद में ईश्वर के विशेष फ़रिश्तों की उपस्थिति की ओर संकेत करती है। वास्तविकता यह है कि हम भौतिक मनुष्य, फ़रिश्तों को पहचानने की क्षमता नहीं रखते परन्तु क़ुरआन पर हमारा विश्वास इस बात का कारण बनता है कि हम उनके अस्तित्व को स्वीकार करलें। ओहद के युद्ध में फ़रिश्तों की उपस्थिति जो, मुस्लिम योद्धाओं की भावनाओं को मज़बूत बनाने के लिए थी, इस्लाम के लश्कर में वृद्धि और शत्रु के मध्य भय उत्पन्न होने का कारण बन गई। इन आयतों से हमने यह सीखा कि मोमिन को केवल ईश्वर पर ही भरोसा करना चाहिए क्योंकि फ़रिश्तों सहित पूरी सृष्टि, उसकी समर्थक है और इसी प्रकार से शत्रुओं को भी इस्लाम से नहीं टकराना चाहिए क्योंकि इस स्थिति में उनका मुक़ाबला इस्लाम से नहीं बल्कि ईश्वर से होता है। ईश्वरीय विचारधारा में मनुष्यों का जीवन फ़रिश्तों के संपर्क में है। संघर्षकर्ताओं द्वारा संयम और प्रतिरोध की दशा में ही ईश्वर की ओर से गुप्त सहायता मिलती है। ईश्वरीय आदेशों का पालन, रणक्षेत्र में भी आवश्यक है। मुस्लिम योद्धा को हर दशा में ईश्वर से भयभीत रहना चाहिए और उसके आदेशों का पालन करते रहना चाहिए।