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    सूरए निसा; आयतें 100-103 (कार्यक्रम 145)

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    आइए पहले सूरए निसा की आयत संख्या 100 की तिलावत सुनते हैं।وَمَنْ يُهَاجِرْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ يَجِدْ فِي الْأَرْضِ مُرَاغَمًا كَثِيرًا وَسَعَةً وَمَنْ يَخْرُجْ مِنْ بَيْتِهِ مُهَاجِرًا إِلَى اللَّهِ وَرَسُولِهِ ثُمَّ يُدْرِكْهُ الْمَوْتُ فَقَدْ وَقَعَ أَجْرُهُ عَلَى اللَّهِ وَكَانَ اللَّهُ غَفُورًا رَحِيمًا (100)और जो कोई अपने धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर के मार्ग में अपनी भूमि और नगर से पलायन करे तो उसे धरती में रहने के बहुत से बड़े-बड़े ठिकाने मिलेंगे और जैसा कि जो अपने घर से ईश्वर और पैग़म्बर के मार्ग में पलायन करे और फिर उसे मौत आ ले तो निःसन्देह, उसका बदला ईश्वर पर है और ईश्वर क्षमाशील तथा दयावान है। (4:100) पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि ईमान वाले व्यक्ति का हृदय अपनी भूमि और नगर से बंधा नहीं होता। उसके लिए मूल सिद्धांत, ईश्वर का प्रेम होता है न कि शहर या देश का प्रेम। अतः यदि वह अपने देश में अपने धर्म की रक्षा न कर सके तो उसे वहां से पलायन कर जाना चाहिए। यह आयत कहती है कि यह मत सोचो कि धरती केवल तुम्हारे शहर या देश तक सीमित है, नहीं बल्कि ईश्वर की धरती बहुत ही बड़ी है और जो कोई भी ईश्वर के लिए अपने शहर या देश से पलायन करेगा तो निःसन्देह, ईश्वर उसके काम में बरकत देगा तथा सांसारिक दृष्टि से भी वह अधिक संपन्न हो जाएगा। इसके अतिरिक्त यदि वह इस पलायन के मार्ग में मर जाए तो उसका पारितोषिक ईश्वर के ज़िम्मे है तथा उसका कोई घाटा नहीं हुआ है। यद्यपि इस आयत में धर्म की रक्षा के लिए पलायन मुख्य विषय है परन्तु इसमें वे सभी पलायन सम्मिलित हैं जिनमें ईश्वरीय पहूल हो, जैसे शिक्षा प्राप्त करने के लिए या धर्म के प्रचार के लिए पलायन आदि। इस आयत से हमने सीखा कि हम अपने कर्तव्य के पालन के प्रति उत्तरदायी हैं न कि उसके परिणाम के प्रति। घर से निकलना महत्पूर्ण है न कि मंज़िल तक पहुंचना। घर में बैठे रहने से किसी को कुछ प्राप्त नहीं होगा, हरकत में बरकत है। कार्यों के चयन में एसे काम को चुनना चाहिए कि यदि उसके मार्ग में हमें मौत भी आ जाए तो हम ईश्वर से उसका पारितोषिक प्राप्त कर सकें।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 101 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذَا ضَرَبْتُمْ فِي الْأَرْضِ فَلَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَنْ تَقْصُرُوا مِنَ الصَّلَاةِ إِنْ خِفْتُمْ أَنْ يَفْتِنَكُمُ الَّذِينَ كَفَرُوا إِنَّ الْكَافِرِينَ كَانُوا لَكُمْ عَدُوًّا مُبِينًا (101)और जब भी तुम धरती पर यात्रा करो तो तुम्हारे लिए इस बात में कोई हर्ज नहीं है कि नमाज़ को क़स्र अर्थात आधी पढ़ा करो, यदि तुम्हें इस बात का भय हो कि काफ़िर तुम्हें क्षति और यातना पहुंचाएंगे तो निःसन्देह, काफ़िर तुम्हारे खुले शत्रु हैं। (4:101) इस आयत में जेहाद तथा यात्रा करने वालों की नमाज़ का वर्णन किया गया है। इस्लाम के आरंभिक काल के मुसलमान नमाज़ को इतना महत्व देते थे कि वे उसे क़स्र या छोटा करने को पाप समझते थे। ईश्वर ने यह आयत भेजकर उन्हें आदेश दिया है कि जेहाद तथा पलायन की स्थिति में कि जब शत्रु का ख़तरा लगा रहता है, अपनी नमाज़ों को संक्षिप्त करो ताकि तुम्हें क्षति न पहुंचाई जा सके। इसके पश्चात, इस्लामी आदेशों में यह आयत सभी प्रकार की यात्राओं पर लागू हो गई। तथा हर प्रकार के यात्री के लिए अनिवार्य हो गया कि वह यात्रा के दौरान अपनी नमाज़ों को क़स्र करे अर्थात चार रकअत नमाज़ों को दो रकअत कर दे। इस आयत से हमने सीखा कि नमाज़ की स्थिति में भी शत्रु की ओर से निश्चेत नहीं होना चाहिए। सच्चा मुसल्मि व्यक्ति एक आयामी नहीं होता के वह केवल उपासना के ही विचार में रहे। यदि इस्लामी व्यवस्था ख़तरे में हो तो आवश्यक है कि आवश्यक्ता पड़ने की स्थिति में नमाज़ को संक्षिप्त किया जाए ताकि शत्रु क्षति न पहुंचा सके। नमाज़ हर स्थिति में मनुष्य पर अनिवार्य है। यहां तक कि ख़तरे के समय भी नमाज़ पढ़ना आवश्यक और अनिवार्य है अलबत्ता संक्षिप्त रूप में।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 102 और 103 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذَا كُنْتَ فِيهِمْ فَأَقَمْتَ لَهُمُ الصَّلَاةَ فَلْتَقُمْ طَائِفَةٌ مِنْهُمْ مَعَكَ وَلْيَأْخُذُوا أَسْلِحَتَهُمْ فَإِذَا سَجَدُوا فَلْيَكُونُوا مِنْ وَرَائِكُمْ وَلْتَأْتِ طَائِفَةٌ أُخْرَى لَمْ يُصَلُّوا فَلْيُصَلُّوا مَعَكَ وَلْيَأْخُذُوا حِذْرَهُمْ وَأَسْلِحَتَهُمْ وَدَّ الَّذِينَ كَفَرُوا لَوْ تَغْفُلُونَ عَنْ أَسْلِحَتِكُمْ وَأَمْتِعَتِكُمْ فَيَمِيلُونَ عَلَيْكُمْ مَيْلَةً وَاحِدَةً وَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ إِنْ كَانَ بِكُمْ أَذًى مِنْ مَطَرٍ أَوْ كُنْتُمْ مَرْضَى أَنْ تَضَعُوا أَسْلِحَتَكُمْ وَخُذُوا حِذْرَكُمْ إِنَّ اللَّهَ أَعَدَّ لِلْكَافِرِينَ عَذَابًا مُهِينًا (102) فَإِذَا قَضَيْتُمُ الصَّلَاةَ فَاذْكُرُوا اللَّهَ قِيَامًا وَقُعُودًا وَعَلَى جُنُوبِكُمْ فَإِذَا اطْمَأْنَنْتُمْ فَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ إِنَّ الصَّلَاةَ كَانَتْ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ كِتَابًا مَوْقُوتًا (103)(हे पैग़म्बर!) जब कभी आप जेहाद के लिए मुसलमानों के साथ हों और उनके लिए नमाज़ क़ाएम करना चाहें तो आरंभ में उनका एक गुट आपके साथ नमाज़ पढ़े और अपने शस्त्र साथ लिए रहे और जब वे सजदा कर चुके हों तो आपके पीछे जाकर रक्षक बन जाएं और दूसरा गुट जिसने नमाज़ नहीं पढ़ी है, वह आकर आपके साथ नमाज़ में सम्मिलित हो जाए और वे भी अपनी रक्षा के सामान और शस्त्र अपने साथ रखें क्योंकि काफ़िरों की इच्छा है कि तुम अपने शस्त्रों और प्रतिरक्षा के साधनों की ओर से निश्चेत हो जाओ तो वे अचानक ही तुम पर आक्रमण करे दें। अलबत्ता यदि तुम वर्षा या बीमारी के कारण शस्त्र नहीं उठा सकते हो तो कोई बात नहीं है परन्तु बचाव और प्रतिरक्षा का सामान साथ रखो। निसन्देह, ईश्वर ने काफ़िरों के लिए अपमानजनक दण्ड तैयार कर रखा है। (4:102) तो जब तुम नमाज़ को समाप्त कर लो तो प्रत्येक दशा में चाहे खड़े, बैठे, और लेटे हुए ईश्वर की याद करो और जब तुम्हें संतोष हो जाए (और शत्रु का भय समाप्त हो जाए) तो नमाज़ को पूर्ण रूप से अदा करो कि निःसन्देह, निर्धारित समय पर नमाज़ पढ़ना ईमान वालों पर अनिवार्य है। (4:103) पिछली आयत में जेहाद की यात्राओं में नमाज़ को संक्षिप्त करने का आदेश देने के पश्चात ईश्वर इस आयत में रणक्षेत्र में जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ने की पद्धति का वर्णन करते हुए कहता है कि इस्लाम की सेना दो गुट में बंट जाए। एक गुट अपने हथियार लेकर इमामे जमाअत के पीछे नमाज़ के लिए खड़ा होगा तथा पहली रकत के दूसरे सज्दे के पश्चात दूसरी रकत तेज़ी से अकेले पढ़ेगा और अपनी नमाज़ जो कि दो रकत से अधिक नहीं है, समाप्त कर लेगए और दूसरे गुट के स्थान पर चला जाएगा ताकि वह इमामे जमाअत की दूसरी रकत में शामिल हो जाए और नमाज़े जमाअत के लाभ से वंचित न रहे। महत्वपूर्ण बात यह है कि नमाज़ भी पढ़ी जाए और यदि संभव हो तो जमाअत से पढ़ी जाए तथा सभी सैनिक जमाअत से नमाज़ पढ़ सकें। इस सबके बावजूद सदैव ही शत्रु का ध्यान रखना चाहिए और एक क्षण के लिए भी अपने शस्त्रों को धरती पर नहीं रखना चाहिए ताकि शत्रु अवसर से लाभ न उठा सके। इन आयतों से हमने सीखा कि नमाज़े जमाअत के महत्व के लिए इतना ही पर्याप्त है कि रणक्षेत्र में भी एक रकअत नमाज़ पढ़ी जाती है। हर स्थिति में चेतना और सतर्कता आवश्यक है, यहां तक कि नमाज़ को भी शत्रु की ओर से मुसलमानों की निश्चेतता का कारण नहीं बनना चाहिए। नमाज़ के लिए एक विशेष समय का निर्धारण, नमाज़ के सुव्यवस्थित व निरंतर होने का कारण तथा सुव्यवस्था हेतु मुसलमानों के लिए एक पाठ है।