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    सूरए निसा; आयतें 104-109 (कार्यक्रम 146)

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    आइए पहले सूरए निसा की आयत संख्या 104 की तिलावत सुनते हैं।وَلَا تَهِنُوا فِي ابْتِغَاءِ الْقَوْمِ إِنْ تَكُونُوا تَأْلَمُونَ فَإِنَّهُمْ يَأْلَمُونَ كَمَا تَأْلَمُونَ وَتَرْجُونَ مِنَ اللَّهِ مَا لَا يَرْجُونَ وَكَانَ اللَّهُ عَلِيمًا حَكِيمًا (104)(हे ईमान वालो! रणक्षेत्र में) शत्रु का पीछा करने में ढिलाई न करो कि यदि तुम्हें तकलीफ़ और पीड़ा होती है तो उन्हें भी उसी प्रकार से पीड़ा और तकलीफ़ होती है, और तुम ईश्वर से वह आशाएं रखते हो जो उन्हें प्राप्त नहीं हैं, और ईश्वर अत्यधिक जानकार भी है और तत्वदर्शी भी। (4:104) इतिहास में वर्णित है कि ओहद के युद्ध में मुसलमानों की पराजय के पश्चात मक्के के अनेकेश्वरवादियों ने मदीना नगर पर आक्रमण करके बचे हुए मुसलमानों की हत्या करने और इस्लाम को समाप्त करने का निर्णय किया। परन्तु इस आयत के आने के पश्चात पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने सभी मुसलमानों को युद्ध के लिए तैयार होने का आदेश दिया, यहां तक कि युद्ध में घायल हुए लोग भी प्रतिरक्षा के लिए तैयार हो गए। यह तैयारी देखकर मदीने के अनेकेश्वरवादी, मदीने पर आक्रमण करने के अपने निर्णय से पीछे हट गए। यह आयत जिस महत्वपूर्ण बात की ओर संकेत करती है वह यह है कि युद्ध में दोनों पक्षों के लोग घायल होते हैं, बंदी बनाए जाते हैं या मारे जाते हैं, परन्तु लक्ष्य और परिणाम बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। इस्लामी सेना को ईश्वरीय सहायता की आशा रहती है परन्तु कुफ़्र की सेना को ऐसी कोई आशा नहीं रहती। घायल होने या मरने वाले मुसलमान सैनिकों को स्वर्ग जैसा महान पारितोषिक मिलता है परन्तु प्रलय पर विश्वास न रखने वाले काफ़िर सैनिकों का काई ठिकाना नहीं होता है। इस आयत से हमने सीखा कि शत्रु के मुक़ाबले में एकाध पराजय को उससे मुक़ाबला करने में ठिलाई कारण नहीं बनना चाहिए। मुसलमानों की भावनाएं सदैव ही ईश्वर पर भरोसे और उसकी दया की आशा के कारण प्रबल रहनी चाहिए। ईश्वरीय कृपा की आशा, मुस्लिम योद्धा की सबसे बड़ी पूंजी है। इसी कारण शहादत और विजय दोनों ही उसके लिए कल्याण का साधन हैं। धार्मिक कर्तव्यों के पालन में हम जो कठिनाइयां उठाते हैं, उन्हें भुलाया नहीं जा सकता।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 105 तथा 106 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّا أَنْزَلْنَا إِلَيْكَ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ لِتَحْكُمَ بَيْنَ النَّاسِ بِمَا أَرَاكَ اللَّهُ وَلَا تَكُنْ لِلْخَائِنِينَ خَصِيمًا (105) وَاسْتَغْفِرِ اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ كَانَ غَفُورًا رَحِيمًا (106)(हे पैग़म्बर!) निःसन्देह, हमने यह किताब सत्य के साथ आप पर उतारी है ताकि आप लोगों के बीच उस आधार पर फ़ैसला करें, जो कुछ ईश्वर ने आपको दिखाया और सिखाया है, तथा कभी भी विश्वासघात करने वालों की ओर से शत्रुता न करें। (4:105) और ईश्वर से क्षमा चाहते रहें कि निःसन्देह, ईश्वर क्षमाशील और दयावान है। (4:106) इस्लामी इतिहास की पुस्तकों में वर्णित है कि एक मुसलमान ने किसी की कवच चोरी कर ली, जब उसे पकड़े जाने का भय हुआ तो उसने कवच को एक यहूदी के घर में फेंक दिया और अपने मित्रों से कहा कि तुम गवाही दो कि यहूदी चोर है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने उन लोगों की गवाही के आधार पर मुसलमान व्यक्ति को बरी और यहूदी व्यक्ति को आरोपित किया। उसी समय ईश्वर ने यह आयत भेज कर पैग़म्बर को वास्वतिकता से अवगत करवाया। न्याय करने में पंच और न्यायाधीश का कर्तव्य है कि वह दोनो पक्षों से ठोस तर्क तथा प्रमाण प्राप्त करे तथा एसा मार्ग अपनाए कि अपराधी, क़ानून से ग़लत लाभ न उठा सके। इस घटना में यह मार्ग पैग़म्बर पर ईश्वरीय संदेश अर्थात वहयि का उतरना तथा ईश्वरीय सहायता का आना था ताकि पैग़म्बरे इस्लाम की पैग़म्बरी तथा ईश्वर से उनके संपर्क का एक प्रमाण भी हो तथा किसी निर्दोष को दण्ड भी न दिया जाए चाहे वह एक यहूदी ही क्यों न हो। इन आयतों से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद सत्य के आधार पर तथा सभी वास्वतिक्ताओं और वास्तविक मानवाधिकारों के आधार के रूप में उतरा है, अतः फ़ैसले करने में उसी को आधार बनाना चाहिए। लोगों का दण्डित होना, उन पर आरोप लगाने का तर्क नहीं बन सकता बल्कि यदि किसी निर्दोष काफ़िर तक पर आरोप लगाया जाए तो उसकी ओर से प्रतिरोध करना चाहिए।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 107, 108 तथा 109 की तिलावत सुनते हैं।وَلَا تُجَادِلْ عَنِ الَّذِينَ يَخْتَانُونَ أَنْفُسَهُمْ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ مَنْ كَانَ خَوَّانًا أَثِيمًا (107) يَسْتَخْفُونَ مِنَ النَّاسِ وَلَا يَسْتَخْفُونَ مِنَ اللَّهِ وَهُوَ مَعَهُمْ إِذْ يُبَيِّتُونَ مَا لَا يَرْضَى مِنَ الْقَوْلِ وَكَانَ اللَّهُ بِمَا يَعْمَلُونَ مُحِيطًا (108) هَا أَنْتُمْ هَؤُلَاءِ جَادَلْتُمْ عَنْهُمْ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا فَمَنْ يُجَادِلُ اللَّهَ عَنْهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ أَمْ مَنْ يَكُونُ عَلَيْهِمْ وَكِيلًا (109)(हे पैग़म्बर!) उन लोगों का समर्थन न कीजिएगा जो अपने आप से विश्वासघात करते हैं। निःसन्देह, ईश्वर विश्वासघात करने वाले अपराधियों को पसंद नहीं करता। (4:107) वे लोगों से अपने विश्वासघात को छिपाते हैं किंतु वे उसे ईश्वर से नहीं छिपा सकते जबकि वह उस समय भी उनके साथ रहता है जब वे रातों को अप्रिय बातें (और षड्यंत्र) करते हैं और जो कुछ वे करते हैं, ईश्वर उससे भलि भांति अवगत है। (4:108) यदि मान भी लिया जाए कि तुम लोगों ने सांसारिक जीवन में उन विश्वासघातियों का समर्थन किया परन्तु प्रलय के दिन ईश्वर के समक्ष कौन उनका साथ देगा या कौन उनका वकील बनेगा? (4:109) इन तीन आयतों में ईश्वर तीन गुटों को सावधान करता है। क़ाज़ी अर्थात पंच या न्यायाधीश से कहता है कि वह फ़ैसला करने में विश्वासघात करने वालों का समर्थन न करे और सत्य की सीमा से आगे न बढ़े। वह यह न सोचे कि कोई उसके काम से अवगत नहीं है। ईश्वर उसके सभी कामों को देखता है। इसके कारण विश्वासघात करने वालों के समर्थकों और अपराधियों को संबोधित करते हुए कहता है कि यदि संसार में तुम्हारी चालें सफल हो भी जाएं तब भी प्रलय में वे कुछ काम न आएंगी। एक रोचक बात यह है कि १०७वीं आयत में ईश्वर कहता है कि विश्वासघाती, अन्य लोगों के साथ विश्वासघात करने से पूर्व स्वयं अपने से विश्वासघात करता है और अपने ऊपर अत्याचार करता है क्योंकि प्रथम तो वह ईश्वर द्वारा प्रदान की गई पवित्र भावना से वंचित हो जाता है और दूसरे यह कि अपने व्यवहार द्वारा स्वयं अपने ऊपर दूसरों के अत्याचार और विश्वासघात की भूमि समतल कर देता है। इन आयतों से हमने सीखा कि क़ुरआनी संस्कृति में समाज के सभी सदस्य, एक शरीर के अंगों की भांति हैं। दूसरों के साथ विश्वासघात स्वयं के साथ विश्वासघात के समान है। ईश्वर से भय का सबसे महत्वपूर्ण तत्व, उसके ज्ञान और हमारे सभी कर्मों से उसके अवगत होने पर ईमान अर्थात विश्वास रखना है। यदि न्यायाधीश, विदित प्रमाणों के आधार पर, विश्वासघाती को बरी कर दे तो ईश्वर वास्तविकताओं के आधार पर प्रलय में उसे दण्ड देगा। अत्याचारग्रस्त को भी यह विश्वास रखना चाहिए कि यदि संसार में वह अपना अधिकार सिद्ध न कर सका और उसे प्राप्त न कर सका तो प्रलय में ईश्वर अवश्य ही उसके साथ न्याय करेगा। {