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    सूरए निसा; आयतें 11-14 (कार्यक्रम 121)

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    आइये पहले सूरए निसा की 11वीं और 12वीं आयतों की तिलावत सुनें।يُوصِيكُمُ اللَّهُ فِي أَوْلَادِكُمْ لِلذَّكَرِ مِثْلُ حَظِّ الْأُنْثَيَيْنِ فَإِنْ كُنَّ نِسَاءً فَوْقَ اثْنَتَيْنِ فَلَهُنَّ ثُلُثَا مَا تَرَكَ وَإِنْ كَانَتْ وَاحِدَةً فَلَهَا النِّصْفُ وَلِأَبَوَيْهِ لِكُلِّ وَاحِدٍ مِنْهُمَا السُّدُسُ مِمَّا تَرَكَ إِنْ كَانَ لَهُ وَلَدٌ فَإِنْ لَمْ يَكُنْ لَهُ وَلَدٌ وَوَرِثَهُ أَبَوَاهُ فَلِأُمِّهِ الثُّلُثُ فَإِنْ كَانَ لَهُ إِخْوَةٌ فَلِأُمِّهِ السُّدُسُ مِنْ بَعْدِ وَصِيَّةٍ يُوصِي بِهَا أَوْ دَيْنٍ آَبَاؤُكُمْ وَأَبْنَاؤُكُمْ لَا تَدْرُونَ أَيُّهُمْ أَقْرَبُ لَكُمْ نَفْعًا فَرِيضَةً مِنَ اللَّهِ إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَلِيمًا حَكِيمًا (11) وَلَكُمْ نِصْفُ مَا تَرَكَ أَزْوَاجُكُمْ إِنْ لَمْ يَكُنْ لَهُنَّ وَلَدٌ فَإِنْ كَانَ لَهُنَّ وَلَدٌ فَلَكُمُ الرُّبُعُ مِمَّا تَرَكْنَ مِنْ بَعْدِ وَصِيَّةٍ يُوصِينَ بِهَا أَوْ دَيْنٍ وَلَهُنَّ الرُّبُعُ مِمَّا تَرَكْتُمْ إِنْ لَمْ يَكُنْ لَكُمْ وَلَدٌ فَإِنْ كَانَ لَكُمْ وَلَدٌ فَلَهُنَّ الثُّمُنُ مِمَّا تَرَكْتُمْ مِنْ بَعْدِ وَصِيَّةٍ تُوصُونَ بِهَا أَوْ دَيْنٍ وَإِنْ كَانَ رَجُلٌ يُورَثُ كَلَالَةً أَوِ امْرَأَةٌ وَلَهُ أَخٌ أَوْ أُخْتٌ فَلِكُلِّ وَاحِدٍ مِنْهُمَا السُّدُسُ فَإِنْ كَانُوا أَكْثَرَ مِنْ ذَلِكَ فَهُمْ شُرَكَاءُ فِي الثُّلُثِ مِنْ بَعْدِ وَصِيَّةٍ يُوصَى بِهَا أَوْ دَيْنٍ غَيْرَ مُضَارٍّ وَصِيَّةً مِنَ اللَّهِ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَلِيمٌ (12)तुम्हारी संतान की मीरास के बारे में ईश्वर तुमसे यह सिफ़ारिश करता है कि बेटे का भाग, दो बेटियों के भाग के बराबर है और यदि संतान दो या अधिक बेटियां हों तो दो तिहाई मीरास उनकी है और यदि केवल एक बेटी है तो आधा भाग उसका है और यदि मृतक की संतान हो तो उसके माता-पिता दोनों को मीरास का छठा भाग मिलेगा और यदि मृतक के कोई संतान न हो तो माता को एक तिहाई भाग तथा बाक़ी पिता को मिलेगा और यदि मृतक के भाई हों तो माता को छठा भाग मिलेगा। अलबत्ता मीरास का यह बंटवारा मृतक की वसीयत को पूरा करने या उसके ऋण को चुकाने के पश्चात होगा, तुम नहीं जानते कि तुम्हारे लिए माता-पिता या संतान में से कौन अधिक लाभदायक है। ये आदेश ईश्वर की ओर से निर्धारित किये गये हैं और नि:संदेह वह जानकार तथा तत्वदर्शी है। (4:11) और तुम्हारी पत्नियों ने जो कुछ छोड़ा हो उसमें तुम्हारा भाग आधा है। अलबत्ता यदि उनकी संतान न हो तो मीरास में तुम्हारा भाग एक चौथाई है अलबत्ता जो वसीयत कर जायें, उसे पूरा करने या जत ऋण उन पर हो, उसे चुकाने के पश्चात, और यदि पति मर जाये तो जो कुछ वह छोड़ गया है उसमें पत्नियों का भाग एक चौथाई है यदि पति की कोई संतान न हो तो, और यदि संतान हो तो चाहे दूसरी पत्नी से ही क्यों न हो तो पत्नी को मीरास का आठवां भाग मिलेगा। अलबत्ता उस वसीयत को पूरा करने के पश्चात जो तुम कर गये हो या उस ऋण को चुकाने के बाद जो तुमने लिया हो और यदि कोई स्त्री या पुरुष अपने मातृक भाई-बहनों का वारिस हो और एक भाई या एक बहन है तो उनमें से प्रत्येक को मीरास का छठा भाग मिलेगा और यदि वारिस एक से अधिक हों तो वे सब मीरास के तीसरे भाग में सहभागी होंगे। अलबत्ता मृतक की वसीयत को पूरा करने या उसके ऋण को चुकाने के पश्चात। शर्त यह है कि वसीयत या ऋण का आधार वारिस को हानि पहुंचाने पर न हो। यह ईश्वर की ओर से सिफ़ारिश है और ईश्वर जानने वाला तथा सहनशील है। (4:12)चूंकि धार्मिक शिक्षाएं एवं आदेश ऐसे ईश्वर की ओर से हैं जो मनुष्य का रचयिता भी है अत: उसके क़ानून, मनुष्य की प्राकृतिक आवश्यकताओं से पूर्ण रूप से समन्वित हैं। मृत्यु, जो हमें दूसरे संसार में पहुंचाने का मार्ग है, इस संसार के सभी रिश्तों तथा समस्त भौतिक वस्तुओं पर से स्वामित्व के समाप्त होने का कारण बनती है परंतु ऐसे समय में यह प्रश्न उठता है कि मनुष्य ने अपने जीवन में जो कुछ कमाया है उसका क्या होगा और उसे किसे दिया जाना चाहिये?कुछ जातियों के बीच मृतक का माल केवल बाप, भाई, बेटों जैसे समीपी परिजनों के बीच ही बांटा जाता था और पत्नी तथा बेटी के बच्चों को पुरुष की मीरास में से कुछ नहीं मिलता था। आज भी कई देशों में मृतक का सारा माल जनसम्पत्ति मान लिया जाता है और उस पर मरने वालों के परिजनों या बच्चों का कोई अधिकार नहीं होता परंतु इस्लाम, मीरास के क़ानून के अंतर्गत, जो पूर्णत: एक स्वाभाविक बात है तथा माता-पिता की आत्मिक व शारीरिक विशेषताओं को बच्चों में स्थानांतरित करती है, लोगों के धन और उनकी सम्पत्ति को इस क़ानून का पालन करते हुए उनके बीच बांटता है और मरने वाले के माल को उसके बच्चों, पत्नी तथा परिजनों का अधिकार समझता है। इसी के साथ इस्लाम ने स्वयं मृतक के लिए भी उसकी मृत्य के पश्चात उसके माल में एक भाग रखा है और उसे अनुमति दी है कि वह अपने माल के एक तिहाई भाग के बारे में जैसी चाहे वसीयत कर सकता है। इसी कारण बहुत से लोग, जिनके पास जीवन बिताने के लिए काफ़ी धन-सम्पत्ति भी होती है, जीवन के अंतिम समय तक काम करते रहते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि मरने के बाद उनका माल उन्हीं के बच्चों को मिलेगा जो उनके अस्तित्व को जारी और उनके नाम को बाक़ी रखेंगे। इसी आधार पर इस्लाम पहले चरण में मीरास, संतान के बीच बांटता है फिर अन्य परिजनों को मीरास का कुछ भाग देता है। इस बंटवारे में बेटों को बेटियों से दुगना भाग मिलता है क्योंकि जीवन का ख़र्चा चलाना पुरुषों का दायित्व है और इसके लिए उन्हें अधिक धन की आवश्यकता होती है।यद्यपि विदित रूप से यह क़ानून महिलाओं के लिए हानिकारक लगता है परंतु अन्य धार्मिक क़ानूनों और आदेशों पर ध्यान देने से पता चलता है कि यह क़ानून वास्तव में महिलाओं के हित में है क्योंकि इस्लाम की पारिवारिक व्यवस्था में महिलाओं के ज़िम्मे कोई ख़र्चा नहीं रखा गया है और उनकी खाने-पीने तथा घर संबंधी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व पुरुष पर रखा गया है। अत: महिलाएं मीरास का अपना पूरा भाग बचा सकती हैं या कम से कम केवल स्वयं पर ही ख़र्च कर सकती हैं जबकि पुरुष को अपने भाग का कम से कम आधा हिस्सा परिवार पर ख़र्च करना पड़ता है।वास्तव में महिलाएं मीरास के अपने भाग की भी स्वामी होती हैं और पुरुष के आधे भाग में भी सहभागी होती हैं जिसमें से वे एक को बचा और दूसरे को ख़र्च कर सकती हैं जबकि महिलाओं के भाग पर पुरुष का कोई अधिकार नहीं होता तथा उसे पत्नी की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करनी होती है। सूरए निसा की ११वीं और १२वीं आयतों में, जिनमें मृतक की संतान, माता-पिता और पत्नी के बीच मीरास के बंटवारे के आदेशों का वर्णन है, केवल मीरास के कुछ आदेशों का उल्लेख हुआ है अत: इस बारे में सम्पूर्ण जानकारी के लिए पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही, उनके परिजनों तथा विश्वस्त मित्रों के कथनों को पढ़ना चाहिये और इसी प्रकार यह भी जानना चाहिये कि मीरास का बंटवारा मृतक द्वारा किये लिए गये ऋण को लौटाने और उसके द्वारा एक तिहाई भाग में की गई वसीयत की पूर्ति के पश्चात किया जाना चाहिये क्योंकि उसका तथा लोगों का अधिकार वारिसों के अधिकार पर वरीयता रखता है।इन आयतों से हमने सीखा कि जिस प्रकार पुत्र का अस्तित्व पिता के अस्तित्व को जारी रखता है उसी प्रकार पिता के माल के वारिस भी पहले चरण में बच्चे ही हैं तो न तो अन्य लोग बच्चों को उनके माता-पिता की मीरास से वंचित कर सकते हैं और न ही माता-पिता उनके भाग को समाप्त कर सकते हैं।यद्यपि मीरास में महिलाओं का भाग पुरुषों का आधा है परंतु यह अंतर सामाजिक जीवन के वास्तविक अंतरों तथा ईश्वर के आदेश के आधार पर है और ईमान की शर्त, ईश्वर के आदेशों के समक्ष नतमस्तक रहना है।लोगों के अधिकारों का पालन और उनके अधिकारों पर ध्यान दिया जाना इतना महत्वपूर्ण है कि इन दोनों आयतों में चार बार इसका उल्लेख हुआ है ताकि वारिस अन्य लोगों के अधिकारों को भूल न जायें।आइये अब सूरए निसा की 13वीं और 14वीं आयतों की तिलावत सुनें।تِلْكَ حُدُودُ اللَّهِ وَمَنْ يُطِعِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ يُدْخِلْهُ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا وَذَلِكَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ (13) وَمَنْ يَعْصِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَيَتَعَدَّ حُدُودَهُ يُدْخِلْهُ نَارًا خَالِدًا فِيهَا وَلَهُ عَذَابٌ مُهِينٌ (14)यह जो कुछ कहा गया, ईश्वरीय नियम हैं तो इनका पालन करो और जान लो कि जो कोई ईश्वर और उसके पैग़म्बर का अनुसरण करे तो ईश्वर उसको स्वर्ग के ऐसे बाग़ों में प्रवृष्ट कर देगा जिनके पड़ों के नीचे नहरें बह रही हैं जिसमें वे अनंतकाल तक रहेंगे और यही बड़ी सफलता है। (4:13) जो कोई ईश्वर व उसके पैग़म्बरों की अवज्ञा करे तथा ईश्वरीय सीमाओं का हनन करे तो ईश्वर उसे ऐसी आग में डाल देगा जिसमें वह सदैव रहेगा और उसके लिए अपमानजनक दंड है। (4:14)मीरास से संबंधित आयतों के पश्चात इन आयतों में क़ुरआन मजीद ईमान वालों को आर्थिक विशेषकर मीरास के मामलों में ईश्वरीय आदेशों के अनुसरण की सिफ़ारिश करता है और हर प्रकार की अवज्ञा से रोकता है क्योंकि ईश्वरीय सीमाओं और नियमों के हनन का बहुत बड़ा पाप है और इसका दंड अत्यंत कठोर है।ये आयतें स्पष्ट रूप से कहती हैं कि ईश्वर का आज्ञापालन केवल उसकी उपासना नहीं है बल्कि सामाजिक व आर्थिक मामलों में लोगों के अधिकारों की रक्षा, ईमान और ईश्वर की उपासना की शर्त है तथा वही व्यक्ति समाज कल्याण प्राप्त कर सकता है जो व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में इन आयतों का पालन करे। लोगों के अधिकारों का हनन करने वाले काफ़िरों की भांति ही कड़े और अपमानजनक दंड में फंसेंगे। यद्यपि मरने वाला व्यक्ति उपस्थित नहीं होता कि उसके ऋणों को चुकाने या बच्चों के बीच उसके माल के बंटवारे में ध्यान पूर्वक काम कर सके परंतु उसका ईश्वर उपस्थित है और उसने लोगों व वारिसों के अधिकारों का हनन करने वालों के लिए अत्यंत कड़ा दंड रखा है।