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    सूरए निसा; आयतें 110-114 (कार्यक्रम 147)

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    आइए पहले सूरए निसा की आयत संख्या 110 की तिलावत सुनते हैं।وَمَنْ يَعْمَلْ سُوءًا أَوْ يَظْلِمْ نَفْسَهُ ثُمَّ يَسْتَغْفِرِ اللَّهَ يَجِدِ اللَّهَ غَفُورًا رَحِيمًا (110)और जो कोई बुरा कर्म करे या अपने आप पर अत्याचार करे और फिर ईश्वर से क्षमा चाहे तो वह ईश्वर को अत्यन्त क्षमाशील और दयावान पाएगा। (4:110) पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि ईश्वर ने सभी ईमान वालों को हर प्रकार के विश्वासघात, षड्यंत्र और विश्वासघातों के समर्थन करने से रोका है तथा उन्हें, प्रलय के कड़े दण्ड से अवगत कराया है। यह आयत उन पर तौबा अर्थात प्रायश्चित का द्वार खोलते हुए कहती है। जो कोई दूसरों के साथ बुराई करे, या पाप करके स्वयं को क्षति पहुंचाए तो यदि वह ईश्वर के दरबार में आए तो ईश्वर उसे क्षमा करके उसे अपनी दया की छाया में ले आता है। और इसमें पाप के बड़े या छोटे होने में कोई अंतर नहीं है क्योंकि ईश्वर की दृष्टि में, पाप पर लज्जित होने की स्थिति ही महत्पवूर्ण है जो ईश्वरीय दया व कृपा का कारण बनती है। अलबत्ता स्पष्ट है कि यदि कोई पाप दूसरों की जानी या माली क्षति का कारण बना हो तो उसकी क्षतिपूर्ति तौबा स्वीकार होने की शर्त है और उसके बिना कोई तौबा स्वीकार्य नहीं है। इस आयत से इमने सीखा कि पाप वास्वत में स्वयं पर अत्याचार है और मनुष्य को अपने आप पर भी अत्याचार करने का अधिकार नहीं है। ईश्वर न केवल यह कि बुराइयों को क्षमा कर देता है बल्कि तौबा करने वालों को पसंद करता है और उसके प्रति दयावान है।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 111 तथा 112 की तिलावत सुनते हैं।وَمَنْ يَكْسِبْ إِثْمًا فَإِنَّمَا يَكْسِبُهُ عَلَى نَفْسِهِ وَكَانَ اللَّهُ عَلِيمًا حَكِيمًا (111) وَمَنْ يَكْسِبْ خَطِيئَةً أَوْ إِثْمًا ثُمَّ يَرْمِ بِهِ بَرِيئًا فَقَدِ احْتَمَلَ بُهْتَانًا وَإِثْمًا مُبِينًا (112)और जो कोई पाप करे तो वास्तव में उसने अपने ही विरुद्ध काम किया है और ईश्वर जानने वाला तथा तत्वदर्शी है। (4:111) और जो कोई, कोई ग़लती या पाप करे और फिर उसे किसी निर्दोष के सिर डाल दे तो निसन्देह, वह बहुत बड़े आरोप और खुले हुए पाप का भार उठा लेता है। (4:112) यह आयत पाप के बुरे परिणामों की ओर संकेत करते कहती है कि पापी व्यक्ति दूसरों और समाज को क्षति पहुंचाने से अधिक स्वयं को घाटा पहुंचाता है क्योंकि वह अपनी पवित्र प्रवृत्ति को अपवित्र कर देता है तथा अपने हृदय व आत्मा की उज्जवलता को खो देता है और यह स्वयं बहुत बुरा घाटा है। इसके अतिरिक्त ईश्वर की सामाजिक परंपाराओं के अंतर्गत, लोगों पर हर प्रकार के अत्याचार का परिणाम जल्दी या देर में स्वयं अत्याचारी तक पहुंचता है और वह इसी संसार में अपने अत्याचार के कुपरिणामों में ग्रस्त हो जाता है। इन आयतों से हमने सीखा कि पाप, समाप्त होने वाली वस्तु नहीं है बल्कि उसके परिणाम मनुष्य की आत्मा और मानस में बाक़ी रहते हैं। दूसरों पर आरोप लगाने वाला, पाप का बहुत वज़नी भार अपने कांधों पर ढोता है, क्योंकि उसने लोगों के सम्मान को निशाना बनाया है।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 113 की तिलावत सुनते हैं।وَلَوْلَا فَضْلُ اللَّهِ عَلَيْكَ وَرَحْمَتُهُ لَهَمَّتْ طَائِفَةٌ مِنْهُمْ أَنْ يُضِلُّوكَ وَمَا يُضِلُّونَ إِلَّا أَنْفُسَهُمْ وَمَا يَضُرُّونَكَ مِنْ شَيْءٍ وَأَنْزَلَ اللَّهُ عَلَيْكَ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَعَلَّمَكَ مَا لَمْ تَكُنْ تَعْلَمُ وَكَانَ فَضْلُ اللَّهِ عَلَيْكَ عَظِيمًا (113)(हे पैग़म्बर!) यदि आप पर ईश्वर की दया व कृपा न होती तो उनके एक गुट ने आपको बहकाने का इरादा कर लिया था और यह अपने आप के अतिरिक्त किसी और को पथभ्रष्ट नहीं कर सकते और न आप को कोई क्षति पहुंचा सकते हैं। और ईश्वर ने आप पर किताब तथा तत्वदर्शिता उतारी है और आपको उन सभी बातों का ज्ञान दे दिया है जो आप नहीं जानते थे और आप पर ईश्वर की बड़ी कृपा है। (4:113) इस्लामी इतिहास की पुस्तकों में वर्णित है कि अनेकेश्वरवादियों का एक गुट पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास आया और कहने लगा कि हम दो शर्तों के साथ आपका धर्म स्वीकार कर लेंगे और आपके प्रति वचनबद्ध हो जाएंगे। प्रथम यह कि हम अपने हाथों से अपनी मूर्तियों को नहीं तोड़ेंगे और दूसरे यह कि अगले एक वर्ष तक “उज़्ज़ा” नामक मूर्ति की पूजा करते रहेंगे। इसी समय ईश्वर की ओर से यह आयत आई और इसने पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करते हुए कहा कि यह लोग स्वयं को मार्गदर्शित करने के स्थान पर तुमको पथभ्रष्ट करना और बहकाना चाहते हैं परन्तु ईश्वर ने तुम्हें क़ुरआन का समस्त ज्ञान दिया है और तत्वदर्शिता दी है और उसने अपनी कृपा से तुम्हें हर प्रकार की पथभ्रष्टता से सुरक्षित रखा है। इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर ने पैग़म्बरों को हर प्रकार की ग़लती और पथभ्रष्टता से सुरक्षित रखा है। ईश्वर स्वयं, पैग़म्बर का शिक्षक है और स्वाभाविक है कि इस शिक्षा में कोई ग़लती नहीं होगी।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 114 की तिलावत सुनते हैं।لَا خَيْرَ فِي كَثِيرٍ مِنْ نَجْوَاهُمْ إِلَّا مَنْ أَمَرَ بِصَدَقَةٍ أَوْ مَعْرُوفٍ أَوْ إِصْلَاحٍ بَيْنَ النَّاسِ وَمَنْ يَفْعَلْ ذَلِكَ ابْتِغَاءَ مَرْضَاةِ اللَّهِ فَسَوْفَ نُؤْتِيهِ أَجْرًا عَظِيمًا (114)उनकी अधिकांश गोष्ठियां और गुप्त बातों में कोई भलाई नहीं है, सिवाए उन लोगों की बातों के जो दान-दक्षिणा, भले कर्म या लोगों के बीच सुधार का आदेश देते हैं और जो कोई भी ईश्वर की मर्ज़ी और प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए ऐसा करे तो हम शीघ्र ही उसे महान बदला देंगे। (4:114) यह आयत एक अशिष्ट बात अर्थात चोरी-छिपे बात करने की ओर संकेत करते हुए कहती है कि सिवाए कुछ अवसरों के कि जहां पर गुप्त रूप से बात करना आवश्यक है, मुंह घुमा कर बातें करना बुरा काम है। वह स्थान या अवसर जहां पर गुप्त रूप से बात करने को यह आयत उचित बताती है वह यह है कि वंचित लोगों की आर्थिक सहायता की अन्य आयतों में भी गुप्त आर्थिक सहायता की सिफ़ारिश की गई है। भलाई का आदेश देना, एसे अवसरों पर जहां उसके गुप्त होने के कारण उसका अधिक प्रभाव होता है। और सबसे महत्वपूर्ण लोगों और परिवारों के बीच सुधार, कि जिसका लोगों के सम्मान की रक्षा के लिए, गोपनीय होना आवश्यक है। इन आयतों से हमने सीखा कि समाजिक मामलों में, मूल बात लोगों के सम्मान की रक्षा करना है। निष्ठा ही कर्मों का वास्वतिक मूल्य है तथा भले कर्मों में गोपनीयता निष्ठा से अधिक समीप है।