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    सूरए निसा; आयतें 115-119 (कार्यक्रम 148)

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    आइए पहले सूरए निसा की आयत संख्या 115 की तिलावत सुनते हैं।وَمَنْ يُشَاقِقِ الرَّسُولَ مِنْ بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُ الْهُدَى وَيَتَّبِعْ غَيْرَ سَبِيلِ الْمُؤْمِنِينَ نُوَلِّهِ مَا تَوَلَّى وَنُصْلِهِ جَهَنَّمَ وَسَاءَتْ مَصِيرًا (115)और जो कोई स्वयं के लिए मार्गदर्शन का रास्ता स्पष्ट होने के पश्चात, पैग़म्बर का विरोध करे और ईमान वालों के मार्ग के अतिरिक्त किसी और मार्ग पर चले तो हम उसे उसी ओर मोड़ देंगे जिसका उसने रुख़ किया है और उसे नरक में डाल देंगे कि जो बहुत बुरा ठिकाना है। (4:115) जो ख़तरे ईमान वालों को सदैव लगे रहते हैं, उनमें से एक अपने धर्म को छोड़ना तथा ईश्वरीय नेताओं व उनके सच्चे मार्गदर्शनों और आदेशों का जानबूझकर विरोध करना है। यद्यपि हमारे काल में पैग़म्बर मौजूद नहीं है कि कोई उनका विरोध कर सके किंतु मुसलमानों के समूह का विरोध जो उनके बीच मतभेद और विरोध का कारण बने, इस आयत के संबोधन में से एक है कि जो पैग़म्बर से शत्रुता के समान है और जिसका परिणाम संसार में ग़लत शासनों की स्वीकृति और प्रलय मे नरक का कड़ा दण्ड है। इस आयत से हमने सीखा कि इस्लामी समाज का विरोध तथा उसके सच्चे नेताओं के अनुसरण से बाहर निकलना, पैग़म्बर के विरोध के समान है। ईश्वर किसी को भी तर्क और मार्गदर्शन के बिना नरक में नहीं डालेगए, बल्कि उसने आरंभ से ही सबसे मार्गदर्शन की भूमिक समतल कर दी है। आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 116 और 117 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ اللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَنْ يُشْرَكَ بِهِ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَلِكَ لِمَنْ يَشَاءُ وَمَنْ يُشْرِكْ بِاللَّهِ فَقَدْ ضَلَّ ضَلَالًا بَعِيدًا (116) إِنْ يَدْعُونَ مِنْ دُونِهِ إِلَّا إِنَاثًا وَإِنْ يَدْعُونَ إِلَّا شَيْطَانًا مَرِيدًا (117)निसन्देह, ईश्वर किसी को उसका समकक्ष ठहराने (के पाप) को क्षमा नहीं करता और इसके अतिरिक्त जो पाप हो उसे वह जिसके लिए चाहे क्षमा कर देता है, और जिसने भी (किसी को) ईश्वर का समकक्ष ठहराया तो निःसन्देह, वह पथभ्रष्टता से दूर तक चला गया है। (4:116) यह लोग ईश्वर को छोड़कर महिलाओं को पुकारते हैं और यह उद्दंड शैतान के अतिरिक्त किसी और को नहीं पुकारते। (4:117) इस्लाम के उदय के समय में मक्का नगर के अनेकेश्वरवादी एसी मूर्तियों की पूजा करते थे जिनके नाम उन्होंने महिलाओं के नाम पर रखे थे। जैसे लात, मनात और उज़्ज़ा आदि। इसी के साथ उनका यह भी विश्वास था कि फ़रिश्ते ईश्वर की बेटियां हैं और संसार के सारे मामले उन्हीं के हाथ में हैं, अतः वे एक प्रकार से फ़रिश्तों की पूजा करते थे। यह आयत इस प्रकार के अंधविश्वासों को रद्द करते हुए कहती है कि वे वास्तव में अपने ग़लत व शैतानी विचारों का अनुसरण करते हैं और इस प्रकार के अनेकेश्वरवादी विश्वासों का पथभ्रष्टता के अतिरिक्त और कोई परिणाम नहीं है। यह बात भी स्पष्ट है कि जब तक कोई अनेकेश्वरवादी अपने इस विश्वास को छोड़कर एकेश्वरवादी नहीं बन जाएगा तब तक उसके पाप की क्षमा की कोई संभावना नहीं है। परन्तु ईमान वाला व्यक्ति, जिसके विचार और विश्वास बिल्कुल ठीक हैं, कभी कोई ग़लती या पाप कर बैठे तो चूंकि उसने अपने भीतर ईश्वरीय दया व कृपा की भूमि समतल कर रखी है, अतः ईश्वर उसे क्षमा कर देगा। अलबत्ता यह ईश्वरीय क्षमा, लोगों की योग्यता और ईश्वरीय तत्वदर्शिता के आधार पर होती है। इन आयतों से हमने सीखा कि सबसे बड़ा पाप, किसी को ईश्वर का समकक्ष ठहराना है, जो ईश्वरीय दया की संभावना को समाप्त कर देता है। सभी ग़लत मार्ग एक ही रास्ते पर जाकर मिलते हैं कि जो शैतान का मार्ग है और सत्य से भागने वालों के पास शैतान के अतिरिक्त कोई ठिकाना नहीं है। ईश्वर के अतिरिक्त किसी की भी उपासना वास्तव में शैतान की पूजा है।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 118 तथा 119 की तिलावत सुनते हैं।لَعَنَهُ اللَّهُ وَقَالَ لَأَتَّخِذَنَّ مِنْ عِبَادِكَ نَصِيبًا مَفْرُوضًا (118) وَلَأُضِلَّنَّهُمْ وَلَأُمَنِّيَنَّهُمْ وَلَآَمُرَنَّهُمْ فَلَيُبَتِّكُنَّ آَذَانَ الْأَنْعَامِ وَلَآَمُرَنَّهُمْ فَلَيُغَيِّرُنَّ خَلْقَ اللَّهِ وَمَنْ يَتَّخِذِ الشَّيْطَانَ وَلِيًّا مِنْ دُونِ اللَّهِ فَقَدْ خَسِرَ خُسْرَانًا مُبِينًا (119)ईश्वर ने शैतान पर लानत अर्थात धिक्कार की जिसने कहा कि मैं अवश्य ही तेरे बंदों में से एक निश्चित भाग लेकर रहूंगा (अर्थात एक गुट को बहका कर रहूंगा) (4:118) और उन्हें पथभ्रष्ट करूंगा उन्हें कामनाओं (के मायाजाल) में फंसाऊंगा और उन्हें आदेश दूंगा तो वे चौपायों के कान चीरेंगे (और उन्हें अपने देवताओं के लिए निशानी बनाएंगे) और मैं उन्हें आदेश दूंगा तो वे ईश्वर की रचना में परिवर्तन करेंगे। (तो हे लोगो! जान लो कि) जिसने ईश्वर के स्थान पर शैतान को अपना संरक्षक व मित्र बनाया निःसन्देह वह स्पष्ट घाटे में पड़ गया।) (4:119) अनेकेश्वरवादी न केवल मूर्तियों की पूजा करते थे और उन्हें अपने ईश्वर तथा धरती पर उसके दूतों के बीच माध्यम भी समझते थे बल्कि अपनी फ़सलों और जानवरों के एक भाग को भी मूर्तियों के लिए विशेष करते थे तथा चौपायों के कान काट कर उन पर निशानी लगाते थे ताकि वे उन पर सवार न हो सकें और न ही उनका मांस खाया जाए। इन आयतों में ईश्वर इस प्रकार के अंधविश्वासी विचारों को शैतान के कार्यक्रम बताते हुए कहता है कि शैतान ने सौगंध खाई है कि वह ईश्वर के बंदों को पथभ्रष्ट करेगा और उनकी पथभ्रष्टता का मार्ग प्रशस्त करेगा अतः वह और उसके अनुयायी ईश्वरीय दया से वंचित हो गए हैं। लोगों को पथभ्रष्ट करने के दो शैतानी कार्यक्रम, जिसकी ओर इस आयत में संकेत किया गया है, बेकार की कल्पनाएं तथा ईश्वरीय सृष्टि में परिवर्तन है। स्पष्ट है कि अंधविश्वास तथा ईश्वर के अतिरिक्त किसी से भी मोक्ष की आशा, ऐसी कामनाओं को जन्म देती है जिनका कोई आधार नहीं होता। इसी प्रकार से ईश्वरीय सृष्टि या क़ानूनों में किसी प्रकार का परिवर्तन, लोगों को उनकी पवित्र प्रवृत्ति से विचलित करने और शैतानी कार्यक्रमों को स्वीकार कराने के प्रतिदिन के शैतानी मार्गों में से है। इस आयतों से हमने सीखा कि, शैतान मनुष्य का पुराना शत्रु है अतः हमें इससे सचेत रहना चाहिए कि उसके जाल में फंसकर ईश्वरीय दया से कहीं दूर न हो जाएं। ईश्वर द्वारा हलाल की गई वस्तुओं को हराम करना तथा हराम वस्तुओं को हलाल करना शैतानी कार्यक्रम में से है। {