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    सूरए निसा; आयतें 120-124 (कार्यक्रम 149)

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    आइए पहले सूरए निसा की आयत संख्या 120 और 121 की तिलावत सुनते हैं।يَعِدُهُمْ وَيُمَنِّيهِمْ وَمَا يَعِدُهُمُ الشَّيْطَانُ إِلَّا غُرُورًا (120) أُولَئِكَ مَأْوَاهُمْ جَهَنَّمُ وَلَا يَجِدُونَ عَنْهَا مَحِيصًا (121)शैतान सदैव उनसे वादे करता है और उन्हें कामनाओं में उलझाता है (परन्तु जान लो कि) शैतान धोखे के अतिरिक्त उनसे कोई वादा नहीं करता। (4:120) यह वे लोग हैं जिनका ठिकाना, नरक है और उससे बचने का उन्हें कोई मार्ग नहीं मिलेगा। (4:121) पिछली आयतों में लोगों को पथभ्रष्ट करने में शैतान के कार्यक्रमों का वर्णन करने के पश्चात सूरे निसा की १२०वीं आयत में ईश्वर कहता है कि लोगों को पथभ्रष्ट करने हेतु शैतान का एक अन्य मार्ग उनसे झूठे वादे करना और उन्हें बड़ी-बड़ी कामनाओं में फंसाना है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम व उनके पवित्र परिजनों के कथनों में आया है कि जब ईश्वर की ओर से लोगों को क्षमा करने संबंधी आयतें आईं तो इब्लीस अर्थात शैतान ने अपने साथियों को एकत्रित किया और उनसे कहने लगा कि यदि मनुष्य ने तौबा कर ली तो हमारा सारा परिश्रम ही बेकार हो जाएगा। उसके एक साथी ने कहा जब कभी कोई तौबा करना चाहेगा तो हम उसे कामनाओं में फंसा देंगे ताकि वह तौबा को टालता रहे और फिर तौबा कर ही न सके। इन आयतों से हमने सीखा कि लंबी-लंबी कामनाओं से दिल बांधे रहना, शैतान के जाल में फंसने का कारण है। दूसरों, यहां तक कि बच्चों से भी झूठे वादे करना शैतानी काम है। आइए अब सूरए निसा की 122वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَالَّذِينَ آَمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ سَنُدْخِلُهُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا أَبَدًا وَعْدَ اللَّهِ حَقًّا وَمَنْ أَصْدَقُ مِنَ اللَّهِ قِيلًا (122)और जो लोग ईमान लाए और अच्छे कर्म करते हैं उन्हें हम शीघ्र ही (स्वर्ग के ऐसे) बाग़ों में प्रविष्ट कर देंगे जिनके नीचे से नहरें बहती होंगी, जहां वे सदैव रहेंगे। यह ईश्वर की सच्चा वादा है और कथन में ईश्वर से बढ़कर कौन सच्चा हो सकता है? (4:122) पिछली आयतों में हमने कहा था कि शैतान मनुष्य को झूठी कामनाओं में मग्न कर देता है और सदैव उससे ऐसे वादे करता रहता है जिनमें से कोई सच्चा नहीं होता, बल्कि उसके सारे वादे झूठ और धोखे पर आधारित होते हैं। इस आयत में ईश्वर कहता है कि शैतान के विपरीत उसके वादे सदैव ही सच होते हैं। उसने तुमसे स्वर्ग का वादा किया है और वह अपने वादों पर प्रतिबद्ध है। वह कामनाओं के स्थान पर तुमसे कर्म और प्रयास चाहता है और वह भी ऐसे भले कर्म जो दूसरों की भी भलाई का कारण बनें। ऐसे भले कर्म जो पवित्र व भली भावना से किये गए हों ताकि व्यक्ति की प्रगति का कारण बनें। इस आयत से हमने सीखा कि ईमान और भले कर्म एक दूसरे के लिए अपरिहार्य हैं और कभी एक-दूसरे से अलग नहीं होते। बिना कर्म का मोमिन नहीं हो सकता। ईश्वर के वादों पर भरोसा करना चाहिए क्योंकि हम किसी को उससे अधिक सच्चा नहीं जानते और वह भी ऐसे स्वर्ग का वादा जिसके खोने की कोई चिंता नहीं है।आइए अब सूरए निसा की 123वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।لَيْسَ بِأَمَانِيِّكُمْ وَلَا أَمَانِيِّ أَهْلِ الْكِتَابِ مَنْ يَعْمَلْ سُوءًا يُجْزَ بِهِ وَلَا يَجِدْ لَهُ مِنْ دُونِ اللَّهِ وَلِيًّا وَلَا نَصِيرًا (123)तुम्हारी या आसमानी किताब वालों की कामनाओं का बदला नहीं है बल्कि कोई बुराई करे, उसे उसका बदला दिया जाएगा और वह अपने लिए ईश्वर के अतिरिक्त कोई अभिभावक व सहायक नहीं पाएगा। (4:123) शैतान, पापी लोगों के भीतर जो कामनाएं उत्पन्न करता है उनमें से एक यह है कि चूंकि तुम मुसलमान या ईसाई हो अतः ईश्वर तुम्हें दण्डित नहीं करेगा बल्कि दण्ड तो दूसरे धर्म के अनुयाइयों के लिए है। इस ग़लत विचार द्वारा वह पाप की भूमि भी प्रशस्त करता है और पापियों के लिए तौबा अर्थात प्रायश्चित का द्वार भी बंद कर देता है। इसी कारण इस आयत में कहा गया है कि इस प्रकार की ग़लत आशाओं से स्वयं को धोखा मत दो और यह न सोचो कि ईश्वर ने तुम्हें छूट दे रखी है और तुम्हें दण्ड से मुक्त कर रखा है, नहीं ऐसा नहीं है बल्कि जो कोई भी पाप करेगा चाहे, वह जिस जाति व मूल का हो और जिस किसी भी धर्म का अनुयायी हो उसे दण्ड अवश्य ही दिया जाएगा। इतिहास में वर्णित है कि कुछ मुसलमानों को आशा थी कि उनके और अन्य धर्मों के बीच मतभेद में पैग़म्बर उनका समर्थन करेंगे जबकि मूल आधार न्याय है न कि समर्थन, क़ानून है न कि संबंध। इस आयत से हमने सीखा कि विशिष्टता वे श्रेष्ठता प्राप्त की इच्छा तथा अनुचित आशाएं, लोगों को बहकाने के लिए शैतान के हथकण्डे हैं। इस्लाम और उसके आदेश वास्तविकताओं पर आधारित हैं न कि कल्पनाओं और लोगों की रुचियों पर। ईश्वरीय क़ानून के सामने सब बराबर हैं। धर्म के नाम से ग़लत लाभ उठाना वर्जित है।आइए अब सूरए निसा की 124वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَمَنْ يَعْمَلْ مِنَ الصَّالِحَاتِ مِنْ ذَكَرٍ أَوْ أُنْثَى وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَأُولَئِكَ يَدْخُلُونَ الْجَنَّةَ وَلَا يُظْلَمُونَ نَقِيرًا (124)और जो कोई भी भले कर्म करे, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, यदि वह ईमान वाला है तो केवल ऐसे ही लोग स्वर्ग में जाएंगे और उन पर बाल बराबर भी अत्याचार नहीं होगा। (4:124) पिछली आयत में ईश्वरीय दण्ड के मूल आधार का वर्णन करने के पश्चात यह आयत प्रलय में मिलने वाले पारितोषिक के मूल आधार का इस प्रकार उल्लेख करती है कि जो कोई ईश्वर व प्रलय पर ईमान रखता हो, चाहे स्त्री हो या पुरुष, यदि भले कर्म करेगा तो उसे प्रलय में ईश्वर का स्वर्ग प्राप्त होगा और उसके पारितोषिक में कोई कमी नहीं होगी। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस आयत व अन्य आयतों से भले कर्मों की स्वीकृति की शर्त, ईश्वर पर ईमान है तथा अन्य लोगों के भले कर्म स्वीकार्य नहीं हैं और यह स्पष्ट सी बात है क्योंकि जिसे प्रलय और प्रलय में मिलने वाले इनाम पर विश्वास नहीं होगा तो ईश्वर से प्रलय में पारितोषिक की आशा ही नहीं रखेगा। हां, यह संभव है कि ईश्वर अपनी दया व कृपा से उसे स्वर्ग में ले जाए परन्तु यह इनाम की आशा और उसके अधिकार से अलग की बात है। इस आयत से हमने सीखा कि स्वर्ग में जाने का कारण, ईमान व भले कर्म हैं न कि आशाएं और दावे। ईश्वरीय दया से लाभान्वित होने में सभी लोग समान हैं। आध्यात्मिक परिपूर्णताओं तक पहुंचने में स्त्री एवं पुरुष समान हैं। परिपूर्णता के मार्ग पर अग्रसर होने में उनके लिए कोई सीमा नहीं है। कर्मों की स्वीकृति की शर्त ईमान है। ईश्वर पर ईमान न रखने वाले लोगों की सेवाओं का बदला इसी संसार में दे दिया जाएगा।