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    सूरए निसा; आयतें 125-128 (कार्यक्रम 150)

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    आइए पहले सूरए निसा की आयत संख्या 125 और 126 की तिलावत सुनते हैं।وَمَنْ أَحْسَنُ دِينًا مِمَّنْ أَسْلَمَ وَجْهَهُ لِلَّهِ وَهُوَ مُحْسِنٌ وَاتَّبَعَ مِلَّةَ إِبْرَاهِيمَ حَنِيفًا وَاتَّخَذَ اللَّهُ إِبْرَاهِيمَ خَلِيلًا (125) وَلِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ وَكَانَ اللَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ مُحِيطًا (126)और किसका धर्म उससे बेहतर है जिसने स्वयं को ईश्वर के समक्ष नतमस्तक कर रखा हो और जो अच्छे कर्म करने वाला हो तथा सत्यवादी इब्राहीम के धर्म का अनुयायी हो? और ईश्वर ने इब्राहीम को अपनी मित्रता के लिए चुन लिया। (4:125) और जो कुछ आकाशों और धरती में है, सब ईश्वर का है और हर वस्तु पर ईश्वर का नियंत्रण है। (4:126) पिछली आयतों में हमने जाना था कि ईश्वरीय पारितोषिक से लाभान्वित होने की शर्त ईमान व भले कर्म हैं। यह आयतें भले व ईमान वाले व्यक्ति की आंतरिक प्रेरणाओं की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि वही ईमान संपूर्ण व मूल्यवान है जो ईश्वर के प्रति निष्ठा व समर्पण पर आधारित हो। एसे ईमान का कोई लाभ नहीं है जिसमें केवल ज़बान से ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार किया जाए परन्तु मनुष्य का हृदय, ईश्वर के समक्ष नतमस्तक न रहे। इस आधार पर भले कर्म उसी स्थिति में ईश्वर के दरबार में स्वीकार होंगे कि जब उन्हें पवित्र व शुद्ध भावनाओं के अन्तर्गत तथा भलाई की नियत से किया गया हो न कि छलकपट या भौतिक हितों की प्राप्ति के लिए। इस संबंध में क़ुरआने मजीद ने एसे मनुष्य का सच्चा व संपूर्ण उदाहरण, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को बताया है और उनके अनुसरण को, जो क़ुरआन के शब्दों में ईश्वर की मित्रता के चरण तक पहुंच चुके हैं, संपूर्ण कल्याण व मोक्ष की शर्त घोषित किया है। ईश्वर के निकट हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का वह स्थान है कि पैग़म्बरे इस्लाम को भी उनके सत्यवादी धर्म के अनुसरण के लिए कहा गया है। अतः इस्लाम, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के धर्म का अनुयायी है जिसे इन आयतों में सबसे बेहतर धर्म कहा गया है। इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय धर्मों का मूल सिद्धांत ईश्वर के प्रति समर्पित रहना और लोगों के साथ भलाई करना है। ईमान तथा कर्म एक-दूसरे के लिए अपरिहार्य हैं। एक के बिना दूसरा अधूरा तथा प्रभावहीन है। ईश्वर ने यद्यपि लोगों को ईमान व कर्म का निमंत्रण दिया है परन्तु उसे इसकी कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह तो धरती और आकाशों का स्वामी है और सभी वस्तुएं उसके नियंत्रण में हैं। आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 127 की तिलावत सुनते हैं।وَيَسْتَفْتُونَكَ فِي النِّسَاءِ قُلِ اللَّهُ يُفْتِيكُمْ فِيهِنَّ وَمَا يُتْلَى عَلَيْكُمْ فِي الْكِتَابِ فِي يَتَامَى النِّسَاءِ اللَّاتِي لَا تُؤْتُونَهُنَّ مَا كُتِبَ لَهُنَّ وَتَرْغَبُونَ أَنْ تَنْكِحُوهُنَّ وَالْمُسْتَضْعَفِينَ مِنَ الْوِلْدَانِ وَأَنْ تَقُومُوا لِلْيَتَامَى بِالْقِسْطِ وَمَا تَفْعَلُوا مِنْ خَيْرٍ فَإِنَّ اللَّهَ كَانَ بِهِ عَلِيمًا (127)(हे पैग़म्बर!) यह लोग आपसे महिलाओं (के अधिकारों) के बारे में प्रश्न करते हैं, इनसे कह दीजिए कि ईश्वर इस बारे में तुम्हारा उत्तर देगा जैसा कि (विधवा स्त्रियों और) अनाथ लड़कियों, जिनका अधिकार तुम उन्हें नहीं देते और उनसे निकाह (करके उनका माल रोक लेना) चाहते हो, तथा कमज़ोर बच्चों के बारे में ईश्वर की सिफ़ारिशें इनके लिए तिलावत की जा चुकी हैं (और ईश्वर सदैव सिफ़ारिश करता है कि) अनाथों के साथ न्याय करो और जान लो कि तुम जो भी भला कर्म करते हो, ईश्वर उससे अवगत है। (4:127) सूरए निसा की आरंभिक आयतों में महिलाओं के विवाह और उनके मीरास के आदेशों का वर्णन करने के पश्चात ईश्वर इस आयत में कहता है कि हे पैग़म्बर, आप पुरुषों से कह दीजिए कि महिलाओं के अधिकारों के बारे में जिन आदेशों का वर्णन हुआ है, सब ईश्वर की ओर से हैं और उनमें, पैग़म्बर होने के बावजूद मेरी कोई भूमिका नहीं है। न केवल विधवा महिलाओं बल्कि अनाथ अभिभावक न रखने वाली लड़कियों और लड़कों के बारे में जो भी आदेश हैं वे ईश्वर की ओर से आए हैं और क़ुरआन की विभिन्न आयतों में वर्णित हैं। यह आयत इस महत्वपूर्ण बात का उल्लेख करती है कि हर प्रकार के व्यवहार विशेषकर अनाथों और वंचितों के साथ बर्ताव में मूल मानदण्ड न्याय है जिसके के लिए महिलाओं और बच्चों के आर्थिक व पारिवारिक अधिकारों का सम्मान आवश्यक है और न केवल उनके अनिवार्य अधिकारों की पूर्ति बल्कि उनके साथ भलाई करने पर भी क़ुरआने मजीद ने बल दिया है। इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम एसे समय में महिलाओं, बच्चों और अनाथों के अधिकारों का रक्षक था जब उन्हें परिवार और समाज में कोई अधिकार प्राप्त नहीं था। इस्लाम के क़ानून ईश्वर ने बनाए हैं और पैग़म्बर पर केवल उन्हें बयान करने का दायित्व सौंपा गया था।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 128 की तिलावत सुतने हैं।وَإِنِ امْرَأَةٌ خَافَتْ مِنْ بَعْلِهَا نُشُوزًا أَوْ إِعْرَاضًا فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا أَنْ يُصْلِحَا بَيْنَهُمَا صُلْحًا وَالصُّلْحُ خَيْرٌ وَأُحْضِرَتِ الْأَنْفُسُ الشُّحَّ وَإِنْ تُحْسِنُوا وَتَتَّقُوا فَإِنَّ اللَّهَ كَانَ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرًا (128)और यदि किसी महिला को अपने पति की ओर से बुरे व्यवहार या बेरुख़ी का भय हो तो उन दोनों के लिए वैध है कि वे किसी प्रकार एक-दूसरे से समझौता कर लें। निःसन्देह समझौता बेहतर है परन्तु कंजूसी और संकीर्ण दृष्टि, लोगों में घर कर गई है। जान लो कि यदि तुम भलाई करोगे और ईश्वर से डरोगे तो जो कुछ तुम करते हो ईश्वर उससे अवगत है। (4:128) पिछली आयत में लोगों को महिला अधिकारों का सम्मान करने की सिफ़ारिश करने के पश्चात ईश्वर इस आयत में महिलाओं को संबोधित करते हुए कहता है कि यद्यपि पारिवारिक अधिकारों और उनसे संबंधित आदेशों का पालन करना चाहिए परन्तु परिवार की सुरक्षा उससे महत्वपूर्ण है और जब भी इन मामलों पर ध्यान देने से पारिवारिक व्यवस्था के बिगड़ने का ख़तरा हो तो बेहतर यह है कि दोनों पक्ष लचक दिखाएं ताकि परिवार टूटने न पाए। यह आयत सिफ़ारिश करती है कि इससे पूर्व कि पारिवारिक समस्याएं तलाक़ का कारण बनें, उनको रोकना चाहिए और समझौते व लचक द्वारा अधिकार संबंधी अपने मतभेदों का समाधान करना चाहिए। इस प्रकार से आंतिरक इच्छाओं, कंजूसी व संकीर्ण दृष्टि को पति व पत्नी के बीच जुदाई डालने की अनुमति नहीं देनी चाहिए बल्कि एक दूसरे के साथ भलाई करके अपने पुराने रिश्तों को सुदृढ़ बनाना चाहिए। इस आयत से हमने सीखा कि परिवार के आधार की रक्षा के लिए पति और पत्नी दोनों के भीतर क्षमा की भावना को सुदृढ़ किया जाना चाहिए। इस्लाम इस बात पर बल देता है कि पारिवारिक समस्याओं को यथासंभव दूसरों के हस्तक्षेप के बिना और केवल पति पत्नी के प्रयासों से समाप्त किया जाए। इस्लाम की आधिकारिक व्यवस्था उसकी शिष्टाचारिक व्यवस्था के साथ है। परिवार के अधिकारों के साथ ही सुधार और भलाई की ओर संकेत किया गया है। {