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    सूरए निसा; आयतें 129-132 (कार्यक्रम 151)

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    आइए पहले सूरए निसा की आयत संख्या 129 की तिलावत सुनते हैं।وَلَنْ تَسْتَطِيعُوا أَنْ تَعْدِلُوا بَيْنَ النِّسَاءِ وَلَوْ حَرَصْتُمْ فَلَا تَمِيلُوا كُلَّ الْمَيْلِ فَتَذَرُوهَا كَالْمُعَلَّقَةِ وَإِنْ تُصْلِحُوا وَتَتَّقُوا فَإِنَّ اللَّهَ كَانَ غَفُورًا رَحِيمًا (129)और तुम कितना ही चाहो, अपनी पत्नियों के बीच पूर्ण न्याय नहीं कर सकते तो केवल एक ही की ओर न झुक जाओ और दूसरी को अधर में छोड़ दो और (जान लो कि) यदि तुम समझौता कर लो और ईश्वर से डरते रहो तो निःसन्देह, ईश्वर अत्यंत क्षमाशील और दयावान है। (4:129) यह आयत उन पुरुषों को संबोधित करती है जिनकी कई पत्नियां हैं। पिछली आयत में सभी पुरूषों को अपने पारिवारिक जीवन में भलाई और सुधार की सिफ़ारिश करने के पश्चात इस आयत में ईश्वर कई पत्नियों वाले पुरूषों को न्याय की सिफ़ारिश करता है। इस आयत पर चर्चा से पूर्व हम आपका ध्यान कुछ महत्वपूर्ण बातों की ओर आकृष्ट करना चाहते हैं। प्रथम यह है कि इस्लाम ने कई पत्नियां रखने की कोई सिफ़ारिश नहीं की है बल्कि कुछ शर्तों के साथ इसको वैध माना है। दूसरे यह कि कुछ परिस्थितियां जैसे प्राकृतिक आपदाएं, युद्ध या सामाजिक स्थितियां, कई पत्नियां रखने की भूमि प्रशस्त करती हैं। ऐसी स्थिति में यदि वैध रूप से उनके लिए मार्ग न खोला जाए तो अवैध रूप से यह संबंध फैलने लगते हैं। इस प्रकार की बुराई आज पश्चिमी समाजों में देखने को मिलती है जहां पर कई पत्नियां रखने का मामला नहीं है किंतु वहां पर पुरुष बड़ी ही सरलता से कई महिलाओं से खुल्लम-खुल्ला या गुप्त संबंध रख सकते हैं और रखते हैं किंतु इसे नियंत्रित करने की कोई व्यवस्था नहीं है। इसी कारण इस्लाम ने कई पत्नियां रखने को वर्जित या प्रोत्साहित किये बिना ही कुछ विशेष शर्त निर्धारित करके इसे सीमित कर दिया है। इस्लाम ने न्याय को कई पत्नियां रखने के मामले में मूल शर्त बताया है। इसी सूरे की तीसरी आयत में हम पढ़ते हैं कि यदि तुम्हें इस बात का भय हो कि तुम न्याय नहीं कर सकते तो केवल एक ही पत्नी रखो। तीसरे यह कि क़ानून से अनुचित लाभ उठाने की संभावना हर स्थान पर है और हो सकता है कि कुछ पुरुष इस ईश्वरीय क़ानून से ग़लत लाभ उठाकर, बिना शर्त और योग्यता के ही कई विवाह कर लें, परन्तु स्पष्ट है कि कुछ लोगों द्वारा अनुचित लाभ उठाए जाने के कारण क़ानून को समाप्त नहीं किया जा सकता। अब इस आयत की संक्षिप्त व्यवस्था करते हैं। यह आयत पुरुषों से कहती है कि महिलाओं के साथ व्यवहार और उनके अधिकारों की पूर्ति में न्याय से काम लो ताकि तुम्हारा दोमुखी व्यवहार दूसरी पत्नी के असंतोष और अधर में रहने का कारण न बने, विशेषकर पत्नियों के बीच प्रेम और हार्दिक लगाव के संबंध में पूर्णतः न्याय करो। इस आयत से हमने सीखा कि पुरुष को किसी भी स्थिति में यह अधिकार नहीं है कि वह अपनी पत्नी को अधर में छोड़ दे। या तो पारिवारिक जीवन में उसके सभी अधिकारों की पूर्ति करे या फिर उसे तलाक़ दे दे ताकि वह अपने बारे में स्वयं कोई फ़ैसला कर सके। पति और पत्नी के बीच प्रेम व मित्रता तथा ईश्वरीय भय रखना, किसी भी परिवार की सुदृढ़ता का आधार है जिससे ईश्वरीय दया व कृपा प्राप्त होती है।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 130 की तिलावत करते हैं।وَإِنْ يَتَفَرَّقَا يُغْنِ اللَّهُ كُلًّا مِنْ سَعَتِهِ وَكَانَ اللَّهُ وَاسِعًا حَكِيمًا (130)और यदि पति पत्नी एक दूसरे से अलग हो जाएं तो वे (ईश्वरीय कृपा से निराश न हों क्योंकि) ईश्वर दोनों को अपनी व्यापक कृपा से आवश्यकतामुक्त कर देगा और निःसन्देह, ईश्वर अतयंत समाई वाला और तत्वदर्शी है। (4:130) इस्लाम की महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक यह है कि वह परिवार तथा समाज की आवश्यकताओं तथा वास्तविकताओं के आधार पर व्यवहारिक और तर्कसंगत समाधान प्रस्तुत करता है। इस्लाम अपने अनुयाइयों को एक शुष्क व बिना लचक वाली विचारधारा की भांति बंद गली में नहीं छोड़ता और न ही उन्हें असंभ काम करने का आदेश देता है। समाज में बहुत अधिक सामने आने वाला एक विषय, तलाक़ है। इस्लाम युवाओं को विवाह के लिए जितना ही प्रोत्साहित करता है उन्हें तलाक़ के लिए उतना ही रोकता है। परन्तु कभी परिस्थितियां ऐसी हो जाती हैं कि पति और पत्नी का एक साथ रहना असंभव हो जाता है। ऐसे समय में दोनों को कुढ़-कुढ़ कर साथ रहने पर विवश नहीं किया जा सकता कि वे सदैव ही मानसिक दबाव का शिकार रहें। इस्लाम ने पति और पत्नी के लिए कुछ शर्तें रखकर उनसे अलग होने का मार्ग खुला छोड़ा है। इस्लाम उनसे कहता है कि एक विवाह के विफल हो जाने के कारण तुम सदा के लिए निराश न हो बल्कि ईश्वर की कृपा की आशा रखो और दूसरा जीवन गठित करने और दूसरे परिवार में ईश्वरीय दया प्राप्त करने का प्रयास करो क्योंकि ईश्वर के हाथ बंधे हुए नहीं हैं और उसकी कृपा केवल पिछले जीवन तक ही सीमित नहीं है। इस आयत से हमने सीखा कि एक मुसल्मान व्यक्ति के जीवन के मार्ग में कोई बंद गली नहीं है। यदि क्षमा, समझौता और ईश्वरीय भय, परिवार को सुरक्षित न रख सके तो फिर तलाक़ का मार्ग मौजूद है। अलबत्ता पहला क़दम सुधार है और अन्तिम कार्य तलाक़। तलाक़ हर स्थान पर बुरा नहीं है। ऐसी अनेक पारिवारिक समस्याएं हो सकती हैं जो आत्महत्या या अवैध संबंधों का कारण बनें।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 131 और 132 की तिलावत सुनते हैं।وَلِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ وَلَقَدْ وَصَّيْنَا الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ مِنْ قَبْلِكُمْ وَإِيَّاكُمْ أَنِ اتَّقُوا اللَّهَ وَإِنْ تَكْفُرُوا فَإِنَّ لِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ وَكَانَ اللَّهُ غَنِيًّا حَمِيدًا (131) وَلِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ وَكَفَى بِاللَّهِ وَكِيلًا (132)और जो कुछ आकाशों और धरती में है सब ईश्वर का है और हमने तुमसे पूर्व आसमानी किताब रखने वालों और तुमको भी ईश्वरीय भय रखने की सिफ़ारिश की है और यदि तुमने इन्कार किया तो जान लो कि जो कुछ आकाशों और धरती में है सब ईश्वर ही का है और निसन्देह, ईश्वर सदैव ही आवश्यकतामुक्त और प्रशंसा का अधिकारी है। (4:131) और ईश्वर ही का है जो कुछ आकाशों और धरती में है और भरोसे के लिए ईश्वर काफ़ी है। (4:132) पिछली आयतों में पुरुषों और महिलाओं को अपने जीवन विशेषकर पारिवारिक मामलों में पवित्रता और ईश्वरीय भय अपनाने की सिफ़ारिश करने के पश्चात आयतें कहती हैं कि यह सिफ़ारिश केवल तुमसे विशेष नहीं है बल्कि तुमसे पूर्व के सभी धर्मों के अनुयाइयों से भी यह सिफ़ारिश की गई है। और यह न सोचो कि यह सिफ़ारिश ईश्वर के लाभ में है क्योंकि उसे तुम्हारी कोई आवश्यक्ता नहीं है वह सभी आकाशों और धरती का मालिक है। उसको तुम्हारे अस्तित्व ही की कोई आवश्यकता नहीं है, तुम्हारा भय तो बड़ी बात है अतः यदि तुम और संसार के सभी लोग काफ़िर भी हो जाएं तब भी ईश्वर को कोई क्षति नहीं पहुंचेगी। रोचक बात यह है कि इन आयतों में ईश्वर के संपूर्ण स्वामित्व की बात तीन बार दोहराई गई है ताकि लोगों द्वारा उसके आदेशों के पालन के संबंध में उसकी आवश्यकता के बारे में कोई भ्रांति न रह जाए। इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय धर्मों में विरोधाभास नहीं है बल्कि सभी ईश्वरीय धर्मों का स्रोत एक है और इन सब में ईश्वरीय आदेशों के पालन की बात कही गई है। केवल उसी से डरना चाहिए जो सभी मनुष्यों और ब्रह्माण्ड का स्वामी हो। उसके अतिरिक्त किसी से भी नहीं डरना चाहिए। उसी पर भरोसा करना चाहिए जो सभी आकाशों और धरती का स्वामी तथा सबसे अधिक शक्तिशाली और आवश्यकतामुक्त है।