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    सूरए निसा; आयतें 133-136 (कार्यक्रम 152)

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    आइए पहले सूरए निसा की आयत संख्या 133 की तिलावत सुनते हैं।إِنْ يَشَأْ يُذْهِبْكُمْ أَيُّهَا النَّاسُ وَيَأْتِ بِآَخَرِينَ وَكَانَ اللَّهُ عَلَى ذَلِكَ قَدِيرًا (133)हे लोगो! यदि ईश्वर तुम्हारा अंत करके तुम्हारे स्थान पर दूसरे को लाना चाहे तो जान लो कि वह इसमें सक्षम है। (4:133) यह आयत कहती है कि तुम लोग यह न सोचो कि ईश्वर तुम्हें जो आदेश देता है उसकी उसे कोई आवश्यकता है। ईश्वर को तो तुम्हारी भी कोई आवश्यकता नहीं है। क्या जब तुम नहीं थे तो उस समय ईश्वर की कोई समस्या थी जो तुम्हारे आने से समाप्त हो गई? अतः ईश्वर के सामने घमण्ड और अकड़ से काम मत लो क्योंकि यदि वह चाहे तो तुम उद्दंडी लोगों का अंत करके तुम्हारे स्थान पर आज्ञाकारी लोगों को ला सकता है। इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर द्वारा काफ़िरों को अवसर देना उसकी कमज़ोरी व अक्षमता की निशानी नहीं है बल्कि इसका कारण उसकी दया व तत्वदर्शिता है। हमारे पास जो कुछ भी है वह ईश्वर की ओर से ही है। हमें यह सोच कर घमण्ड नहीं करना चाहिए कि जो कुछ हमारे पास है वह हमेशा रहेगा।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 134 की तिलावत सुनते हैं।مَنْ كَانَ يُرِيدُ ثَوَابَ الدُّنْيَا فَعِنْدَ اللَّهِ ثَوَابُ الدُّنْيَا وَالْآَخِرَةِ وَكَانَ اللَّهُ سَمِيعًا بَصِيرًا (134)जो कोई संसार का बदला और पारितोषिक चाहता है वह जान ले कि लोक-परलोक का बदला और पारितोषिक ईश्वर के पास है और वह देखने वाला भी है और सुनने वाला भी। (4:134) यह आयत उन संकीर्ण दृष्टि के ईमान वालों की ओर संकेत करती है जो ईश्वर पर ईमान तो रखते हैं परन्तु केवल अपने सांसारिक एश्वर्य के चक्कर में रहते हैं। एसे लोग युद्ध में भी भाग लेते हैं परन्तु युद्ध से प्राप्त होने वाले भौतिक लाभों और परिणामों के विचार में रहते हैं। इन लोगों को संबोधित करते हुए ईश्वर कहता है कि तुम लोग जो ईश्वर पर ईमान रखते हो, केवल अपने संसार को ही ईश्वर से क्यों मांगते हो जबकि लोक और परलोक दोनों ही ईश्वर के पास है। क्या तुम यह सोचते हो कि यदि परलोक के ध्यान में रहोगे तो संसार से वंचित रह जाओगे? जबकि ईश्वर, ईमान वालों के लिए लोक-परलोक दोनों ही में कल्याण व मोक्ष चाहता है और एक के कारण दूसरे को छोड़ना घाटा है। इस आयत से हमने सीखा कि यदि भले कर्म करने से मनुष्य का लक्ष्य उसका सांसारिक परिणाम हो तो फिर उसने अपना बहुत घाटा किया है। इस्लाम एक व्यापक और वास्तविकता पर आधारित धर्म है और अपने अनुयाइयों को लोक-परलोक दोनों ही प्राप्त करने की सिफ़ारिश करता है।आइए सूरए निसा की आयत संख्या 135 की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا كُونُوا قَوَّامِينَ بِالْقِسْطِ شُهَدَاءَ لِلَّهِ وَلَوْ عَلَى أَنْفُسِكُمْ أَوِ الْوَالِدَيْنِ وَالْأَقْرَبِينَ إِنْ يَكُنْ غَنِيًّا أَوْ فَقِيرًا فَاللَّهُ أَوْلَى بِهِمَا فَلَا تَتَّبِعُوا الْهَوَى أَنْ تَعْدِلُوا وَإِنْ تَلْوُوا أَوْ تُعْرِضُوا فَإِنَّ اللَّهَ كَانَ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرًا (135)हे ईमान वालो! सदैव न्याय क़ाएम करने और ईश्वर के लिए गवाही देने वाले बनो चाहे वह स्वयं तुम्हारे, तुम्हारे माता-पिता या परिजनों के विरुद्ध ही क्यों न हो, जिसके लिए गवाही देना है चाहे वह धनवान हो या दरिद्र, ईश्वर दोनों के मुक़ाबले में तुम्हारे लिए बेहतर है तो कदापि अपनी ग़लत आंतरिक इच्छाओं का अनुसरण न करना ताकि न्याय कर सको। और यदि तुमने गवाही देने में तोड़ मरोड़ से काम लिया या सत्य से विमुख हो गए तो जान लो कि तुम जो कुछ करते हो ईश्वर उससे अवगत है। (4:135) पिछली आयतों में पत्नियों और अनाथों के मामले में न्याय से काम लेने की सिफ़ारिश करने के पश्चात ईश्वर इस आयत में एक मूल व व्यापक सिद्धांत के रूप में सभी ईमानवालों को संबोधित करते हुए कहता है कि हर स्थिति में हर व्यक्ति के बारे में पूर्णतः न्याय करना चाहिए चाहे इसमें अपना, अपने परिजनों या मित्रों का घाटा ही क्यों न हो। चूंकि प्रायः मनुष्य अपने फ़ैसलों में रिश्तों या लोगों की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखता है और यह जानने के बावजूद कि ग़लती उसके परिजनों की है, उनके हित में गवाही देता है, या पैसों के लालच में धनवानों के हित में गवाही देता है या फिर ग़रीबों की दरिद्रता पर तरस खाकर उनके हित में गवाही देता है। अतः यह आयत कहती है कि फ़ैसलों और गवाही में केवल ईश्वर को ही दृष्टि में रखो न कि अपने रिश्तों या लोगों की आर्थिक स्थिति को। यह आदेश पूर्णतः स्पष्ट करता है कि इस्लाम ने इस मानवीय विषय पर कितना अधिक ध्यान दिया है और ईमान वालों को हर स्तर पर समाजिक न्याय के पालन की सिफ़ारिश की है। इस आयत से हमने सीखा कि न्याय, पैग़म्बरों के भेजे जाने का लक्ष्य और उनके अनुयाइयों के ईमान का अभिन्न अंग है तथा इसका मानदण्ड ईश्वर और ईश्वरीय आदेश है। जीवन के सभी पहलुओं में और सभी लोगों के साथ न्याय करना चाहिए चाहे कि किसी भी धर्म से संबंध रखते हों। क़ानून के सामने सब बराबर हैं। न्याय स्थापित करने में, ग़रीब और धनवान में कोई अंतर नहीं है, चाहे न्याय उसके हित में हो या उसके विरुद्ध। न्याय लागू करने की सबसे अच्छी ज़मानत ईश्वर और हमारे कर्मों से उसके अवगत होने पर ईमान अर्थात विश्वास है।आइए अब सूरए निया की आयत संख्या 136 की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا آَمِنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَالْكِتَابِ الَّذِي نَزَّلَ عَلَى رَسُولِهِ وَالْكِتَابِ الَّذِي أَنْزَلَ مِنْ قَبْلُ وَمَنْ يَكْفُرْ بِاللَّهِ وَمَلَائِكَتِهِ وَكُتُبِهِ وَرُسُلِهِ وَالْيَوْمِ الْآَخِرِ فَقَدْ ضَلَّ ضَلَالًا بَعِيدًا (136)हे ईमान वालो! ईश्वर, उसके पैग़म्बर, उस किताब पर जो उसने अपने पैग़म्बर पर उतारी और उस किताब पर ईमान लाओ जो उनसे पूर्व उतारी गई है और जान लो कि जो, ईश्वर, उसके फ़रिश्तों, उसके पैग़म्बरों, उसकी किताबों और प्रलय के दिन का इन्कार करे, निःसन्देह, वह गहरी पथभ्रष्टता में जा गिरा है। (4:136) यह आयत ईमान वालों को अपने ईमान के विकसित करने और उसमे गहराई लाने का निमंत्रण देते हुए कहती है कि आगे बढ़कर ईमान के उच्च दर्जे प्राप्त करो, उसपर जमे रहो और उससे तनिक भी दूर मत जाओ। स्पष्ट सी बात है कि ईमान के विभिन्न स्तर और दर्जे हैं। जिस प्रकार से ज्ञात के अलग-अलग दर्जे होते हैं। एक वैज्ञानिक भौतिकशास्त्र या रसानयशास्त्र के किसी फ़ार्मूले से जो बात समझता है वह उससे कहीं अधिक व गहरी होती है जो कालेज का एक छात्र उसी फ़ार्मूले से समझता है। इसी कारण ईश्वर ईमान वालों को हर स्थिति में अपने ईमान को परिपूर्ण बनाने का निमंत्रण देता है जिसके लिए आवश्यक यह है कि ईश्वर के आदेशों का अधिक से अधिक पालन किया जाए। आगे चलकर आयत, एक महत्वपूर्ण ख़तरे की ओर संकेत करते हुए, जो ईमान वालों को लगा रहता है, कहती है कि यदि किसी ईमान वाले व्यक्ति का ईमान इतना कमज़ोर हो जाए कि वह धीरे-धीरे अपनी आस्थाओं का इन्कार कर दे तो वह बड़ी ही गहरी पथभ्रष्टता में फंस जाएगा जिससे निकलना अत्यंत ही कठिन होगा। इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय धर्म, एक स्कूल की कक्षाओं की भांति है और पैग़म्बर उसके शिक्षकों की भांति जिनका लक्ष्य एक है अतः सभी पैग़म्बरों और उनकी किताबों पर ईमान, ईश्वर पर ईमान के लिए अपरिहार्य है। ईमान की रक्षा और उसकी प्रगति का मार्ग उसमें वृद्धि और व्यापकता लाना है। ईमान वाले व्यक्ति को सदैव ईमान के उच्च दर्जों तक पहुंचने का प्रयास करना चाहिए।{