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    सूरए निसा; आयतें 137-141 (कार्यक्रम 153)

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    आइए पहले सूरए निसा की आयत संख्या 137 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ الَّذِينَ آَمَنُوا ثُمَّ كَفَرُوا ثُمَّ آَمَنُوا ثُمَّ كَفَرُوا ثُمَّ ازْدَادُوا كُفْرًا لَمْ يَكُنِ اللَّهُ لِيَغْفِرَ لَهُمْ وَلَا لِيَهْدِيَهُمْ سَبِيلًا (137)निसंदेह जो लोग ईमान लाए फिर काफ़िर हो गए, फिर दोबारा ईमान लाए (परन्तु) पुनः काफ़िर हो गए और अपने कुफ़्र में वृद्धि करते रहे तो ईश्वर उन्हें कदापि क्षमा नहीं करेगा और न ही सीधे रास्ते की ओर उनका मार्गदर्शन करेगा। (4:137) पिछली आयत में ईमान वालों और काफ़िरों के अंत के बारे में उल्लेख करने के पश्चात ईश्वर इस आयत में एसे लोगों के अंत के बारे में संकेत करता है जो हर दिन एक नए रंग में और हर क्षण एक नए रूप में दिखाई देते हैं। यह लोग कभी ईमान वालों के साथ होते हैं तो कभी काफ़िरों के साथ। उनकी आस्था में यह परिवर्तन वास्तविकता को समझने और हक़ तक पहुंचने के लिए नहीं होता है बल्कि यह उनके दोमुखेपन और मिथ्या के कारण होता है। ऐसे लोग वास्तव में अपने भौतिक तथा सांसारिक हितों की पूर्ति के फेर में रहते हैं, इसी कारण उन्हें जहां कहीं और जिस ओर भी अपने लक्ष्यों की पूर्ति होती दिखाई देती है वे उसी ओर चले जाते हैं। स्वाभाविक है कि एसे लोग यदि इसी स्थिति में संसार से चले जाएं तो ईश्वरीय दया व क्षमा के पात्र नहीं बनेंगे और इसी प्रकार वे अपने इस दोमुखे व्यवहार के चलते ईश्वरीय मार्गदर्शन का द्वार भी अपने ऊपर बंद कर लेते हैं। इस आयत से हमने सीखा कि धर्मभ्रष्ट होने और धर्म से पलटने का ख़तरा हर ईमान वाले को लगा रहता है अतः अपने आज के ईमान पर घमण्ड न करते हुए सदा सतर्क रहना चाहिए। ईमान और आस्था में अस्थिरता, मनुष्य को पथभ्रष्टता और ईश्वरीय दया व मार्गदर्शन से दूर ले जाती है।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 138 और 139 की तिलावत सुनते हैं।بَشِّرِ الْمُنَافِقِينَ بِأَنَّ لَهُمْ عَذَابًا أَلِيمًا (138) الَّذِينَ يَتَّخِذُونَ الْكَافِرِينَ أَوْلِيَاءَ مِنْ دُونِ الْمُؤْمِنِينَ أَيَبْتَغُونَ عِنْدَهُمُ الْعِزَّةَ فَإِنَّ الْعِزَّةَ لِلَّهِ جَمِيعًا (139)(हे पैग़म्बर!) आप मिथ्याचारियों को कड़े दण्ड की (शुभ) सूचना दे दीजिए। (4:138) वे लोग जो ईमान वालों के बजाए काफ़िरों को अपना मित्र व अभिभावक बनाते हैं, क्या वे उनके पास सम्मान को खोजते हैं? (जबकि) निःसन्देह, सारा सम्मान और प्रतिष्ठा ईश्वर के लिए है। (4:139) मिथ्याचारियों की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वे काफ़िरों को महान बताते हैं और सम्मान प्राप्त करने के लिए उनके पीछे-पीछे चलते हैं। वे यह सोचते हैं कि ईमान वालों के पीछे चलने और उनका अनुसरण करने से वे तुच्छ व अपमानित हो जाएंगे। इसी कारण स्वयं को ईमान वालों के गुट में बताने में उन्हें शर्म आती है। मूलतः वही सम्मान और प्रतिष्ठा स्थाई है जिसका स्रोत ईश्वरीय ज्ञान व शक्ति हो न कि धन व अत्याचार। चूंकि केवल ईश्वर ही के पास असीमित ज्ञान व शक्ति है अतः वास्तविक सम्मान भी ईश्वर से जुड़े रहने में ही है। इन आयतों से हमने सीखा कि ऐसे लोग जो काफ़िरों से जुड़े रहने में ही अपना सम्मान समझते हैं वे मिथ्याचारी हैं क्योंकि कोई भी ईमान वाला काफ़िरों के वर्चस्व के अपमान को सहन करना नहीं चाहता।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 140 की तिलावत सुनते हैं।وَقَدْ نَزَّلَ عَلَيْكُمْ فِي الْكِتَابِ أَنْ إِذَا سَمِعْتُمْ آَيَاتِ اللَّهِ يُكْفَرُ بِهَا وَيُسْتَهْزَأُ بِهَا فَلَا تَقْعُدُوا مَعَهُمْ حَتَّى يَخُوضُوا فِي حَدِيثٍ غَيْرِهِ إِنَّكُمْ إِذًا مِثْلُهُمْ إِنَّ اللَّهَ جَامِعُ الْمُنَافِقِينَ وَالْكَافِرِينَ فِي جَهَنَّمَ جَمِيعًا (140)ईश्वर ने (अपनी) किताब (क़ुरआन) में तुम्हें यह आदेश दिया है कि जब ईश्वर की आयतों के बारे में यह सुनो कि उनका इन्कार किया जा रहा है या मज़ाक़ उड़ाया जा रहा है तो कदापि उनके साथ न बैठो, यहां तक कि वे दूसरी बातों में व्यस्त हो जाएं अन्यथा तुम भी उन्हीं की भांति हो जाओगे। निःसन्देह, ईश्वर मिथ्याचारियों और काफ़िरों, सबको नरक में एकत्रित करने वाला है। (4:140) यह आयत मिथ्याचारियों की एक अन्य निशानी की ओर संकेत करते हुए कहती है कि प्रथम तो यह कि वे काफ़िरों और धर्म का विरोध करने वालों की बैठकों में भाग लेते हैं और दूसरे यह कि वे धर्म के विरुद्ध होने वाली बातों पर चुप रहते हैं जबकि एक ईमान वाले व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह इन बातों को रोके या कम से कम पाप की बैठक से उठ जाए। इस आयत से हमने सीखा कि पाप की बैठकों में भाग लेना, पाप करने में भाग लेने के समान है चाहे बैठक में भाग लेने वाला चुप ही क्यों न रहे। काफ़िरों के साथ उठना-बैठना, उसी स्थिति में वैध है कि जब वे धर्म का अनादर न करें।अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहाने और लोगों से संबंध बढ़ाने तथा उनसे मेल-जोल के नाम पर धर्म के अनादर की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 141 की तिलावत सुनते हैं।الَّذِينَ يَتَرَبَّصُونَ بِكُمْ فَإِنْ كَانَ لَكُمْ فَتْحٌ مِنَ اللَّهِ قَالُوا أَلَمْ نَكُنْ مَعَكُمْ وَإِنْ كَانَ لِلْكَافِرِينَ نَصِيبٌ قَالُوا أَلَمْ نَسْتَحْوِذْ عَلَيْكُمْ وَنَمْنَعْكُمْ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ فَاللَّهُ يَحْكُمُ بَيْنَكُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَلَنْ يَجْعَلَ اللَّهُ لِلْكَافِرِينَ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ سَبِيلًا (141)मिथ्याचारी वही लोग हैं जो सदैव इस बात की प्रतीक्षा में रहते हैं कि ईश्वर की ओर से तुम्हें कोई विजय या लाभ प्राप्त हो और वे कहें कि क्या हम तुम्हारे साथ नहीं थे? और यदि (लाभ में) कोई भाग काफ़िरों को प्राप्त हो जाए तो उनसे कहें कि क्या हमने तुम्हें (मुसलमानों से युद्ध के लिए) प्रोत्साहित नहीं किया और उनकी ओर से तुम्हें क्षति पहुंचाने से नहीं रोका? तो ईश्वर प्रलय के दिन तुम लोगों के बीच फ़ैसला करेगा और निःसन्देह, ईश्वर ने कदापि मुसलमानों पर काफ़िरों के वर्चस्व का कोई मार्ग नहीं रखा है। (4:141) अवसरवाद, मिथ्याचारियों की एक और निशानी है। वे हर अवसर को अपने हित में प्रयोग करना चाहते हैं। यदि ईमान वाले विजयी होते हैं तो वे कहते हैं कि हम भी तुम्हारे साथ थे और हमने तुम्हारी सहायता की है अतः युद्ध से होने वाले लाभों में हम भी भागीदार हैं और यदि शत्रु विजयी रहता है तो वे उससे कहते हैं कि हमने ही इस विजय की भूमि प्रशस्त की है। हमने ही तुम्हे मुसलमानों के विरूद्ध प्रोत्साहित किया और हम मुसलमानों के वारों को मोड़ते रहे। एसे लोग दोनों पक्षों के लिए जासूसी करने वालों की भांति, मिथ्या से काम लेते हैं, कभी कारवां के मित्र होते हैं तो कभी लुटेरों के साथी। आयत का अन्तिम भाग ईमान वालों को आशा दिलाता है कि पूरे इतिहास में सत्य और असत्य के बीच होने वाले युद्धों में सारे उतार-चढ़ावों के बावजूद, भला अंत ईमान वालों का ही है और ईश्वर कदापि इस बात की अनुमति नहीं देगा कि काफ़िर, ईमानवालों पर वर्चस्व जमा सकें। आज यदि यह देखा जाता है कि संसार के अधिकांश भाग पर कुफ़्र का शासन है तो यह इस कारण है कि अनेकानेक मोमिनों का ईमान, वास्तविक नहीं है और वह अपने धार्मिक दायित्वों पर कार्यबद्ध नहीं हैं न वे अपने व्यक्तिगत व्यहार में ईश्वर को दृष्टि में रखते हैं और न ही सामाजिक मामलों में उनके बीच एकता और समरस्ता है। ईश्वर का वादा सच्चा है परन्तु इस शर्त के साथ कि ईमान वाले भी अपने ईमान पर जमे रहें। एसी स्थिति में इस बात की कोई संभावना नहीं है कि काफ़िर उन पर वर्चस्व जाम सकें। इस आयत में हमने सीखा कि मिथ्या की एक निशानी अवसरवाद है। हमें सत्यवादी होना चाहिए अवसरवादी नहीं। इस्लामी देशों को काफ़िरों का वर्चस्व स्वीकार करने का अधिकार नहीं है। अन्य देशों के साथ राजनैतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक संबंध उसी स्थिति में वैध हैं जब काफ़िरों के वर्चस्व और मोमिनों के अपमान का कारण न बनें और ईमान वालों की स्वाधीनता को क्षति न पहुंचाए। ऐसा काम करना चाहिए कि काफ़िर, ईमान वालों पर वर्चस्व जमाने की ओर से सदा के लिए निराश हो जाएं और हर दिन कोई नया षड्यंत्र न रचें।