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    सूरए निसा; आयतें 142-146 (कार्यक्रम 154)

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    आइए पहले सूरए निसा की आयत संख्या 142 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ الْمُنَافِقِينَ يُخَادِعُونَ اللَّهَ وَهُوَ خَادِعُهُمْ وَإِذَا قَامُوا إِلَى الصَّلَاةِ قَامُوا كُسَالَى يُرَاءُونَ النَّاسَ وَلَا يَذْكُرُونَ اللَّهَ إِلَّا قَلِيلًا (142)निसन्देह, मिथ्याचारी, ईश्वर को धोखा देना चाहते हैं और ईश्वर उन्हें धोखे में रखने वाला है, वे जब नमाज़ के लिए उठते भी हैं तो सुस्ती के साथ, और वह भी लोगों को दिखाने के लिए और ईश्वर को बहुत कम याद करते हैं। (4:142) पिछली आयतों में मिथ्याचारियों के विशेषताओं का वर्णन करने के पश्चात इस आयत में ईश्वर उनकी एक अन्य निशानी की ओर संकेत करते हुए कहता है कि जिनके हृदय में ईमान मज़बूत नहीं है अर्थात मिथ्याचारी जब भी नमाज़ के लिए खड़े होते हैं तो सुस्ती के साथ औन अनमने ढंग से खड़े होते हैं। वे नमाज़ को उसके सही समय पर नहीं पढ़ते बल्कि टालते रहते हैं और अन्तिम समय में बड़ी ही तीव्रता से पढ़ कर छुट्टी पा लेते हैं और सबसे बुरी बात तो यह है कि नमाज़ में ईश्वर को याद करने के स्थान पर वे लोगों को अपनी नमाज़ दिखाने के लिए उत्सुक रहते हैं। क़ुरआन कहता है कि मानो यह लोग यह सोचते हैं कि वे ईश्वर के साथ भी छल कर सकते हैं और स्वयं को अन्य ईमान वालों की भांति ईश्वर के समक्ष पेश कर सकते हैं। जबकि ईश्वर उनकी नीयत से भी अवगत है और उनके मिथ्यापूर्ण कर्म को भी देख रहा है। ईश्वर उनके साथ उन्हीं जैसा व्यवहार करता है, तो उन्हें मुसलमान कह कर आदेश देता है कि उनके साथ मुसलमानों जैसा व्यवहार किया जाए परन्तु प्रलय के दिन वह उन्हें काफ़िरों के साथ नरक में डालेगा क्योंकि मिथ्या, अनेकेश्वरवाद की निशानी है। इस आयत से हमने सीखा कि नमाज़ में सुस्ती, ईश्वर की याद से निश्चेतना, दिखावा तथा धोखा, मिथ्या की निशानियां हैं, हमें इनसे सचेत रहना चाहिए। ईश्वर का बदला हमारे कर्मों के अनुसार होगा, शायद संसार के लोगों को धोखा दिया जा सके परन्तु प्रलय में ईश्वरीय दण्ड से भागने का कोई मार्ग नहीं है।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 143 की तिलावत सुनते हैं।مُذَبْذَبِينَ بَيْنَ ذَلِكَ لَا إِلَى هَؤُلَاءِ وَلَا إِلَى هَؤُلَاءِ وَمَنْ يُضْلِلِ اللَّهُ فَلَنْ تَجِدَ لَهُ سَبِيلًا (143)(हे पैग़म्बर!) मिथ्याचारी कुफ़्र व ईमान के बीच डांवाडोल हैं, वे न इनके साथ हैं न उनके साथ, और जिसे ईश्वर पथभ्रष्ट कर दे उसके लिए आपको (मुक्ति का) कोई मार्ग नहीं मिलेगा। (4:143) मिथ्याचारियों की एक अन्य विशेषता जिसका इस आयत में उल्लेख किया गया है यह है कि उनका कोई स्थिर विचार, लक्ष्य, आस्था या ईमान नहीं होता, न वे ईमान वालों की पक्ति में आए हैं कि सदैव उनके साथ रहें और न उनमें इतना साहस होता है कि अपने अंदर के कुफ़्र को प्रकट करके काफ़िरों के साथ हो जाएं। वे प्रतिदिन किसी भी दिशा में चले जाते हैं और हवा में मौजूद वस्तुओं की भांति उसी ओर चल पड़ते हैं जहां उन्हें हवा ले जाती है। स्वाभाविक है कि जिसने स्वयं को एसी स्थिति में डाल रखा हो, उसका परिणाम पथभ्रष्टता के अतिरिक्त और कुछ नहीं होगा और यह संसार में ईश्वर की ओर से उनको दिया जाने वाला दण्ड है। इस आयत से हमने सीखा कि, मिथ्या, की भावना, मनुष्य से वैचारिक स्वतंत्रता को छीन कर उसे दूसरों पर निर्भर बना देती है। आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 144 की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا الْكَافِرِينَ أَوْلِيَاءَ مِنْ دُونِ الْمُؤْمِنِينَ أَتُرِيدُونَ أَنْ تَجْعَلُوا لِلَّهِ عَلَيْكُمْ سُلْطَانًا مُبِينًا (144)हे ईमान वालो! कदापि ईमान वालो के स्थान पर काफ़िरों को अपना मित्र व अभिभावक न बनाओ, क्या तुम चाहते हो कि ईश्वर के लिए अपने विरुद्ध स्पष्ट तर्क बना लो? (4:144) पिछली आयतों में मिथ्याचारियों की विशेषताओं का वर्णन करने के पश्चात ईश्वर इस आयत में ईमान वालों को सचेत करते हुए कहता है कि तुम मिथ्याचारियों की भांति कदापि काफ़िरों के साथ मित्रता और उनपर निर्भरता के प्रयास में न रहना। केवल ईमान वाले ही तुम्हारे मित्र और अभिभावक बनने के योग्य हैं। ईमान वालों को छोड़कर काफ़िरों से संबंध स्थापित करना, ईमान के अनुकूल नहीं है और यदि तुमने एसा किया तो ईश्वर के समक्ष तुम्हारे पास कोई उत्तर नहीं होगा और ईश्वर इस संबंध में तुमसे प्रश्न करने का अधिकार रखता है। इस आयत से हमने सीखा कि हर वह काम निंदनीय है जो इस्लामी समाज पर काफ़िरों के वर्चस्व का कारण बने। एसे हर समझौते से दूर रहना चाहिए जो ईमान वालों को काफ़िरों का वर्चस्व स्वीकार करने पर बाध्य करे। ईमान वालों के साथ मित्रता तथा काफ़िरों से दूरी, ईमान का अटूट अंग है।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 145 और 146 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ الْمُنَافِقِينَ فِي الدَّرْكِ الْأَسْفَلِ مِنَ النَّارِ وَلَنْ تَجِدَ لَهُمْ نَصِيرًا (145) إِلَّا الَّذِينَ تَابُوا وَأَصْلَحُوا وَاعْتَصَمُوا بِاللَّهِ وَأَخْلَصُوا دِينَهُمْ لِلَّهِ فَأُولَئِكَ مَعَ الْمُؤْمِنِينَ وَسَوْفَ يُؤْتِ اللَّهُ الْمُؤْمِنِينَ أَجْرًا عَظِيمًا (146)(हे पैग़म्बर!) निसन्देह, मिथ्याचारी, आग के सबसे नीचे कक्ष में होंगे और आप उनके लिए कदापि कोई सहायक नहीं पाएंगे। (4:145) सिवाय उन लोगों के जिन्होंने तौबा अर्थात प्रायश्चित कर लिया और अपने को सुधार लिया और ईश्वर (की रस्सी) को मज़बूती से पकड़े रहे और ईश्वर के लिए अपने धर्म को शुद्ध किया, कि यही लोग ईमान वालों के साथ हैं और ईश्वर भी शीघ्र ही ईमान वालों को महान बदला देगा। (4:146) इन आयतों से स्पष्ट होता है कि इस्लाम की दृष्टि में मिथ्या, कुफ़्र का सबसे बुरा उदाहरण है और मिथ्याचारी, ईश्वर के सबसे दूर रहने वाले बंदे हैं। अतः नरक में उनका ठिकाना भी आग का सबसे गहरा और निचला स्थान है और ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि ऐसे लोग ईमान प्रकट करके शत्रु के भेदियों की भांति सदैव पीठ में छुरा घोंपते हैं। वास्तव में वे ऐसे ख़तरनाक शत्रु हैं जो मित्र के भेस में सामने आते हैं। परन्तु ईश्वर की दया के द्वार किसी पर भी यहां तक कि इस प्रकार के लोगों पर भी बंद नहीं हैं और यदि यह अपने पिछले कर्मों को छोड़ दें और सुधार योग्य कर्मों में सुधार ले आएं तथा अपने ईमान व कर्मों को दिखावे, तथा मिथ्या से पवित्र कर लें तो ईश्वर उन्हें ईमान वालों की पक्ति में स्वीकार करके उन्हीं की भांति पारितोषिक देगा। इन आयतों से हमने यह सीखा कि प्रलय में मुक्ति का कोई मार्ग नहीं है। यदि हम अपनी मुक्ति चाहते हैं तो उसे संसार में प्रायश्चित व भले कर्मों द्वारा प्राप्त करना चाहिए। तौबा या प्रायश्चित का मार्ग सदैव और सबके लिए खुला हुआ है। ईश्वर के दरबार में निराशा का कोई अर्थ नहीं है। लज्जित होने की केवल शाब्दिक अभिव्यक्ति का नाम तौबा नहीं है बल्कि एक व्यापक पुनर्विचार और पुनर्निर्माण का नाम तौबा या प्रायश्चित है। ईमान वाले लोग प्रायश्चित करने वालों का दिल से स्वागत करते हैं और उनके अतीत को भुला देते हैं।