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    सूरए निसा; आयतें 147-152 (कार्यक्रम 155)

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    आइए पहले सूरए निसा की आयत संख्या 147 की तिलावत सुनते हैं।مَا يَفْعَلُ اللَّهُ بِعَذَابِكُمْ إِنْ شَكَرْتُمْ وَآَمَنْتُمْ وَكَانَ اللَّهُ شَاكِرًا عَلِيمًا (147)ईश्वर को तुम्हें दण्डित करने की क्या आवश्यकता है, यदि तुम कृतज्ञ रहो और ईमान लाओ तो ईश्वर सदैव कृतज्ञ और जानकार है। (4:147) पिछले कार्यक्रम में हमने जो आयतें सुनीं उनमें मथ्याचारियों को मिलने वाले कड़े दण्ड का उल्लेख किया गया था, इस आयत में कहा गया है कि यह मत सोचो कि ईश्वर द्वेष, प्रतिशोध या शक्ति प्रदर्शन के लिए अपराधियों को दण्डित करता है बल्कि उसके सभी दण्ड स्वयं तुम्हारे कर्मों के परिणाम हैं तथा ईश्वर को तुम्हे दण्डित करने की कोई आवश्यकता नहीं है। आगे चलकर आयत कहती है कि जिस प्रकार से कि ईश्वर कृतज्ञ है और तुम्हारे भले कर्मों पर पारितोषिक देता है उसी प्रकार तुम्हें भी उसकी विभूतियों पर कृतज्ञ रहना चाहिए और उन विभूतियों को एसे मार्गों में प्रयोग करना चाहिए जिनसे ईश्वर प्रसन्नत होता हो। और यदि विभूतियों पर यह कृतज्ञता ईमान और भले कर्मों के साथ हो तो तुम्हे कभी दण्डित नहीं किया जाएगा। इस आयत का पहला संदेश यह है कि ईश्वरीय विभूतियों और अनुकंपाओं पर कृतज्ञता के लिए ईश्वर पर ईमान रखना आवश्यक है जिस प्रकार से कि ईश्वर का इन्कार, उसकी विभूतियों से अकृतज्ञता की निशानी है। इस आयत का दूसरा संदेश यह है कि कृतज्ञता, ईश्वरीय कोप से बचाव का भी कारण है और, अधिक कृपा प्राप्त करने का साधन भी है। आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 148 और 149 की तिलावत सुनते हैं। لَا يُحِبُّ اللَّهُ الْجَهْرَ بِالسُّوءِ مِنَ الْقَوْلِ إِلَّا مَنْ ظُلِمَ وَكَانَ اللَّهُ سَمِيعًا عَلِيمًا (148) إِنْ تُبْدُوا خَيْرًا أَوْ تُخْفُوهُ أَوْ تَعْفُوا عَنْ سُوءٍ فَإِنَّ اللَّهَ كَانَ عَفُوًّا قَدِيرًا (149)ईश्वर पसंद नहीं करता कि कोई अपने कथनों द्वारा बुराइयों को स्पष्ट करे, सिवाए इसके कि उसपर अत्याचार हुआ हो और ईश्वर सुनने वाला तथा जानकार है। (4:148) (परन्तु) यदि तुम भलाइयों को स्पष्ट करो या उन्हें छिपाओ या फिर बुराई को क्षमा कर दो तो निःसन्देह, ईश्वर क्षमाशील और सामर्थ्य वाला है। (4:149) यह आयतें एक महत्वपूर्ण समाजिक सिद्धांत की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि समाज में दूसरों की बुराई और अवगुणों को स्पष्ट करने के चक्कर में रहने के बजाए दूसरों की ग़लतियों को क्षमा करने और उनकी भलाइयों को स्पष्ट करने का प्रयास करो, जैसाकि ईश्वर भी “सत्तारुल उयूब” है अर्थात बुराइयों को छिपाने वाला है जो लोगों की बुराइयों को स्पष्ट नहीं करता। अलबत्ता यदि किसी पर अत्याचार हुआ हो और वह अपने ऊपर होने वाले अत्याचार का वर्णन किये बिना, अत्याचारी से अपना हक़ न ले सकता हो तो उसे अधिकार है कि वह जवाब में शिकायत करे और अपने हक़ का प्रतिरोध करे। इन आयतों से हमने सीखा कि दूसरों की बुराइयों और अवगुणों को स्पष्ट करना वर्जित है सिवाए अत्याचारग्रस्त के प्रतिरोध और अत्याचार को रोकने के लिए। प्रतिशोध का सामर्थय रखने के बावजूद अपराधी को क्षमा करना मूल्यवान है जैसाकि ईश्वर भी सभी मनुष्यों पर प्रभुत्व रखने के बावजूद, बहुत से पापियों को क्षमा कर देता है।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 150 और 151 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ الَّذِينَ يَكْفُرُونَ بِاللَّهِ وَرُسُلِهِ وَيُرِيدُونَ أَنْ يُفَرِّقُوا بَيْنَ اللَّهِ وَرُسُلِهِ وَيَقُولُونَ نُؤْمِنُ بِبَعْضٍ وَنَكْفُرُ بِبَعْضٍ وَيُرِيدُونَ أَنْ يَتَّخِذُوا بَيْنَ ذَلِكَ سَبِيلًا (150) أُولَئِكَ هُمُ الْكَافِرُونَ حَقًّا وَأَعْتَدْنَا لِلْكَافِرِينَ عَذَابًا مُهِينًا (151)निसन्देह, जो लोग ईश्वर और उसके पैग़म्बरों का इन्कार करते हैं तथा ईश्वर और उसके पैग़म्बरों के बीच जुदाई डालना चाहते हैं और कहते हैं कि हम कुछ पर ईमान रखते हैं और कुछ का इन्कार करते हैं, वे चाहते हैं कि (अपनी इच्छा के अनुसार) बीच का कोई मार्ग अपनाएं। (4:150) यही लोग वास्तविक काफ़िर हैं और हमने काफ़िरों के लिए अपमानजनक दण्ड तैयार कर रखा है। (4:151) यह आयत सभी ईश्वरीय धर्मों के अनुयाइयों को लगे रहने वाले एक ख़तरे की ओर संकेत करते हुए कहती है कि ईश्वरवादियों का एक गुट केवल अपने पैग़म्बरों को ही सत्य पर समझता है और अन्य ईश्वरीय पैग़म्बरों को असत्य पर मानकर उनका इन्कार करता है। जबकि सारे ही पैग़म्बर ईश्वर की ओर से आए हैं और इस दृष्टि से उनके बीच कोई अंतर नहीं है और स्पष्ट सी बात है कि सदैव इनमें से अन्तिम पर ईमान लाना और उसके आदेशों का पालन करना चाहिए। इस आयत का संबोधन आरंभ में उन यहूदियों से है जो ईसा मसीह के आने के पश्चात उनपर ईमान नहीं लाए। इसके पश्चात आयत में उन यहूदियों और इसाइयों को संबोधित किया गया है जिन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के आने के पश्चात उनका इन्कार किया और उनकी पैग़म्बरी को स्वीकार किया। मूल रूप से ईमान के लिए ईश्वर का आज्ञापालन आवश्यक है न कि अपनी इच्छओं और स्वार्थों की पूर्ति और जो धार्मिक वास्तविकताओं में से कुछ को स्वीकार करता है और कुछ का इन्कार करता है न कि ईश्वर के आदेशों का पालन। इन आयतों से हमने सीखा कि सभी पैग़म्बरों की सत्यता पर ईमान रखना आवश्यक है तथा उन सभी का और उनकी पुस्तकों का आदर करना चाहिए। धर्म परस्पर जुड़ी हुई वास्तविकताओं का एक समूह है, जिनमें से कुछ वास्तविकताओं का इन्कार करके कुछ वास्तविकताओं पर ईमान नहीं रखा जा सकता। धर्म के छोटे से छोटे मामले का इन्कार भी कुफ़्र है।आइए अब सूरए निसा की 152वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَالَّذِينَ آَمَنُوا بِاللَّهِ وَرُسُلِهِ وَلَمْ يُفَرِّقُوا بَيْنَ أَحَدٍ مِنْهُمْ أُولَئِكَ سَوْفَ يُؤْتِيهِمْ أُجُورَهُمْ وَكَانَ اللَّهُ غَفُورًا رَحِيمًا (152)और जो लोग ईश्वर और उसके पैग़म्बरों पर ईमान रखते हैं और उनमें से किसी के बीच अंतर नहीं रखते उन्हें शीघ्र ही ईश्वर भला बदला देगा और ईश्वर क्षमाशील तथा दयावान है। (4:152) यह आयत वास्तविक ईमान वालों की विशेषताओं की ओर संकेत करते हुए कहती है कि वास्तविक ईमान वाला वह है जो सभी ईश्वरीय पैग़म्बरों पर ईमान रखता हो, न यह कि कुछ को स्वीकार करे और कुछ का इन्कार कर दे। उसमें ग़लत प्रकार की सांप्रदायिकता नहीं होती है कि केवल स्वयं को ईमान वाला समझे और अन्य धर्मों के अनुयाइयों को काफ़िर माने। स्पष्ट है कि ऐसे ही लोग ईश्वर की दया के पात्र होते हैं और लोक-परलोक में उन्हें ईश्वर की विशेष कृपा होती है। {