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    सूरए निसा; आयतें 15-18 (कार्यक्रम 122)

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    आइये पहले सूरए निसा की 15वीं आयत की तिलावत सुनें।وَاللَّاتِي يَأْتِينَ الْفَاحِشَةَ مِنْ نِسَائِكُمْ فَاسْتَشْهِدُوا عَلَيْهِنَّ أَرْبَعَةً مِنْكُمْ فَإِنْ شَهِدُوا فَأَمْسِكُوهُنَّ فِي الْبُيُوتِ حَتَّى يَتَوَفَّاهُنَّ الْمَوْتُ أَوْ يَجْعَلَ اللَّهُ لَهُنَّ سَبِيلًا (15)और तुम्हारी महिलाओं में से जो कुकर्म करें उनके विरुद्ध अपने पुरुषों में से चार की गवाही लाओ तो यदि वे गवाही दे दें तो उन्हें उनके घरों में बंद कर दो यहां तक कि उन्हें मृत्य आ जाये या ईश्वर उनके लिए कोई मार्ग निकाले। (4:15)हमने बताया कि सूरए निसा की आरंभिक आयतें पारिवारिक मामलों से संबंधित हैं। इस कार्यक्रम में हम उन महिलाओं और पुरुषों के दंडों के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे जो कुकर्म करते हैं तथा परिवार के पवित्र वातावरण को दूषित करते हैं। 15वीं आयत ऐसी विवाहित महिलाओं के दंड से संबंधित है जो अन्य पुरुषों से अवैध संबंध रखती हैं। अलबत्ता इस बात पर ध्यान रखना चाहिये कि इस्लाम ने दूसरों की टोह में रहने की अनुमति नहीं दी है और दूसरों के ग़लत कार्यों को सिद्ध करने के लिए किसी को प्रोत्साहित नहीं किया है। इसी कारण यदि तीन विश्वस्त लोग भी गवाही दे दें कि अमुक महिला ने कुकर्म किया है तो जब तक चौथा व्यक्ति गवाही न दे दे उनकी बात स्वीकार नहीं की जायेगी।अलबत्ता इस आयत में जिस दंड का वर्णन किया गया है, जो कि आयत के अंतिम भाग से स्पष्ट है, कुकर्म के बारे में एक अस्थायी आदेश है और वह मृत्यु तक उस महिला को पति के घर में क़ैद रखना है अर्थात आजीवन कारावास। स्पष्ट है कि यह आदेश परिवार के सम्मान की रक्षा के लिए है तथा पापियों के एक स्थान पर एकत्रित होने और एक दूसरे की ग़लत आदतें सीखने में बाधा डालता है जैसा कि आजकल देखा जाता है कि कारावास ग़ुंडों, और पापियों के लिए ग़लत आदतें सीखने के केन्द्र बन गये हैं।अलबत्ता इस अस्थायी आदेश के पश्चात विवाहित कुकर्मियों को संगसार करने अर्थात पत्थर मार मार कर उनकी हत्या करने का स्थायी आदेश आया और नये आदेश के पश्चात घरों में बंद महिलाएं स्वतंत्र होकर अपने घरों को लौट गईं और अपने तथा अन्य महिलाओं के लिए पाठ बन गईं। इस आयत से हमने सीखा कि ईमान वाले व्यक्ति के सम्मान की रक्षा उसके ख़ून से भी अधिक महत्वपूर्ण है। हत्या दो गवाहों से सिद्ध हो जाती है परंतु कुकर्म सिद्ध करने के लिए चार गवाहों की आवश्यकता होती है। कुकर्म बहुत ही बुरा कार्य है परंतु कुकर्मी को अपमानित करने के लिए कोई काम करना उससे भी बुरा है।इस्लाम ने अपने पारिवारिक व सामाजिक आदेशों के क्रियान्वयन को सुनिश्चित बनाने के लिए कड़े दंड रखे हैं जिनमें से एक कुकर्मी को आजीवन कारावास दिया जाना है।समाज को स्वच्छ, स्वस्थ और पवित्र रखने के लिए अपराधी को गिरफ्तार करना और कारावास भेजना आवश्यक है। भावनाओं को ईश्वरीय आदेशों के पालन में आड़े नहीं आना चाहिये। आइये अब सूरए निसा की 16वीं आयत की तिलावत सुनें।وَاللَّذَانِ يَأْتِيَانِهَا مِنْكُمْ فَآَذُوهُمَا فَإِنْ تَابَا وَأَصْلَحَا فَأَعْرِضُوا عَنْهُمَا إِنَّ اللَّهَ كَانَ تَوَّابًا رَحِيمًا (16)और तुममें से उन दो व्यक्तियों को, जो कुकर्म करें, यातना दो और कोड़े लगाओ तो यदि उन्होंने तौबा कर ली और पिछली ग़लतियों को सुधार लिया तो उन्हें छोड़ दो कि नि:संदेह ईश्वर तौबा स्वीकार करने वाला और दयावान है। (4:16)यद्यपि विदित रूप से इस आयत में कुकर्म करने वाले सभी पुरुष शामिल हैं परंतु क़ुरआन की व्याख्या करने वाले अधिकांश विद्वानों की दृष्टि में इस आयत का संबोधन अविवाहित महिला और पुरुष से है और उनका दंड केवल उन्हें कोड़े लगाना है।अलबत्ता जब तक न्यायालय में उनका अपराध सिद्ध नहीं होता और उन्हें कोड़े लगाने का दंड निश्चित नहीं हो जाता यदि अपराधी तौबा कर ले और स्वयं को सुधारना चाहे तो उसके मामले को क्षमा करके ईश्वर के हवाले कर देना चाहिये ताकि वह जैसा चाहे उसके साथ व्यहार करे। ईश्वर भी दयावान है और वास्तविक तौबा करने वाले की तौबा को स्वीकार करता है।इस आयत से हमने सीखा कि अपराधी को इस्लामी समाज में सुरक्षा का आभास नहीं होना चाहिये बल्कि सरकार के अधिकारियों को उचित दंडों द्वारा अपराधियों को उनके किये की सज़ा देनी चाहिये।अपराधियों पर तौबा व प्रायश्चित का मार्ग बंद नहीं करना चाहिये बल्कि जो लोग वास्तव में अपने किये पर पछता रहे हैं उन्हें समाज में लौटने की अनुमति देनी चाहिये।आइये अब सूरए निसा की 17वीं और 18वीं आयतों की तिलावत सुनें।إِنَّمَا التَّوْبَةُ عَلَى اللَّهِ لِلَّذِينَ يَعْمَلُونَ السُّوءَ بِجَهَالَةٍ ثُمَّ يَتُوبُونَ مِنْ قَرِيبٍ فَأُولَئِكَ يَتُوبُ اللَّهُ عَلَيْهِمْ وَكَانَ اللَّهُ عَلِيمًا حَكِيمًا (17) وَلَيْسَتِ التَّوْبَةُ لِلَّذِينَ يَعْمَلُونَ السَّيِّئَاتِ حَتَّى إِذَا حَضَرَ أَحَدَهُمُ الْمَوْتُ قَالَ إِنِّي تُبْتُ الْآَنَ وَلَا الَّذِينَ يَمُوتُونَ وَهُمْ كُفَّارٌ أُولَئِكَ أَعْتَدْنَا لَهُمْ عَذَابًا أَلِيمًا (18)नि:संदेह ईश्वर उन लोगों की तौबा स्वीकार करता है जो अनजाने में कोई बुरा काम कर बैठते हैं और फिर शीघ्र ही तौबा कर लेते हैं यही वे लोग हैं जिनकी तौबा ईश्वर स्वीकार कर लेता है और ईश्वर जानने वाला तथा तत्वदर्शी है। (4:17) और तौबा उन लोगों के लिए नहीं है जो बुरे कर्म करते हैं यहां तक कि उनमें से एक को मौत आ लेती है और वह कहता है अब मैंने तौबा कर ली और इसी प्रकार जो लोग काफ़िर मर जायें उनकी भी तौबा स्वीकार नहीं है उनके लिए हमने बहुत ही कड़ा दंड तैयार कर रखा है। (4:18)पिछली आयतों में पापियों को तौबा की संभावना प्रदान करने के पश्चात इन आयतों में उसकी शर्त और समय को स्पष्ट किया गया है। तौबा की सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि पाप अनजाने में चिश्चेतना के कारण और पाप के बुरे परिणामों पर ध्यान दिये बिना तथा इच्छाओं के दबाव में आकर किया गया हो न कि आदत के आधार पर और पाप की बुराई को हीन समझ कर।दूसरी शर्त यह है कि पाप की बुराई से अवगत होने और पश्चाताप के तत्काल बाद तौबा की जाये न ये कि मनुष्य तौबा को टालता रहे और पाप को दोहराता जाये यहां तक कि उसका अंतिम समय आ जाये और पाप करने की कोई संभावना न रहे तब तौबा करे क्योंकि तौबा स्वीकार होने की शर्त सुधार है और ऐसी स्थिति में सुधार की कोई संभावना नहीं है।मूल रूप से तौबा में विलम्ब इस बात का कारण बनता है कि पाप मनुष्य की आदत व प्रवृत्ति बनता जाये और उसे इस प्रकार अपने घेरे में ले ले कि वह तौबा कर ही न सके और यदि ज़बान से तौबा कर भी ले तो भी उसका हृदय उसे स्वीकार न करे। इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर ने पापियों की वास्तविक तौबा को स्वीकार करने को स्वयं के लिए आवश्यक बताया है तो जब तक हम जीवित हैं इस अवसर से लाभ उठायें।जो मनुष्य अपनी आंतरिक इच्छाओं से मुक़ाबले की शक्ति न रखता हो वह अज्ञानी है चाहे विदित रूप से ज्ञानी ही क्यों न हो।तौबा स्वीकार होने की चाबी, तौबा में विलम्ब न करना है और मूल रूप से जब तक पाप अधिक न हुए हों तौबा सरल है।अपने अधिकार और स्वतंत्रता के साथ की गई तौबा का मूल्य व महत्व है न कि ख़तरे या मौत के समक्ष आ जाने के बाद की गई तौबा का।