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    सूरए निसा; आयतें 153-155 (कार्यक्रम 156)

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    आइए पहले सूरए निसा की आयत संख्या 153 की तिलावत सुनते हैं।يَسْأَلُكَ أَهْلُ الْكِتَابِ أَنْ تُنَزِّلَ عَلَيْهِمْ كِتَابًا مِنَ السَّمَاءِ فَقَدْ سَأَلُوا مُوسَى أَكْبَرَ مِنْ ذَلِكَ فَقَالُوا أَرِنَا اللَّهَ جَهْرَةً فَأَخَذَتْهُمُ الصَّاعِقَةُ بِظُلْمِهِمْ ثُمَّ اتَّخَذُوا الْعِجْلَ مِنْ بَعْدِ مَا جَاءَتْهُمُ الْبَيِّنَاتُ فَعَفَوْنَا عَنْ ذَلِكَ وَآَتَيْنَا مُوسَى سُلْطَانًا مُبِينًا (153)(हे पैग़म्बर!) आसमानी किताब वाले आप से चाहते हैं कि आप आसमान से उनके लिए कोई किताब उतारिए, निःसन्देह, उन्होंने इससे बड़ी बात मूसा से चाही थी जब उन्होंने मूसा से कहा था कि हमें ईश्वर को स्पष्ट रूप से दिखाओ, तो उनके अत्याचार के दण्ड स्वरूप उन्हें बिजली ने अपनी लपेट में ले लिया। और इसके बावजूद कि उनके लिए स्पष्ट चमत्कार आ चुके थे, उन्होंने बछड़े की पूजा आरंभ कर दी तब भी हमने उन्हें क्षमा कर दिया और हमने मूसा को स्पष्ट तर्क प्रदान किया। (4:153)पिछले कार्यक्रम में हमने जाना था कि पैग़म्बरों के बीच अंतर रखने और कुछ को स्वीकार करने और कुछ का इन्कार करने के कारण क़ुरआन मजीद आसमानी किताब रखने वालों की आलोचना करता है। यह आयत इस्लाम स्वीकार न करने हेतु मदीने के यहूदियों के एक बहाने की ओर संकेत करते हुए कहती है कि उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से मांग की कि क़ुरआन भी तौरेत ही भांति एक बार आसमान से उतरे, जबकि वहि या ईश्वरीय संदेश उतरने की पद्धति ईश्वर के हाथ में है न कि पैग़म्बर के हाथ में।इसके अतरिक्त ईश्वरीय संदेश के एक साथ आने या क्रमशः आने की उसके सत्य या असत्य होने में कोई भूमिका नहीं है जैसाकि क़ुरआने मजीद के सूरए अनआम की १७वीं आयत में कहा गया है कि यदि हम क़ुरआन को काग़ज़ में भी उतारते और यह उसे छू भी लेते तो काफ़िर बहाना बनाते और उसे स्पष्ट जादू कहते।इसके पश्चात क़ुरआन, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को सांत्वना देते हुए कहता है कि यहूदियों द्वारा इस प्रकार के बहाने बनाने से दुखी मत हो, क्योंकि उनके पूर्वजों ने भी मूसा से कहा था कि वे उन्हें ईश्वर को स्पष्ट रूप से दिखाएं ताकि वह उनपर ईमान ला सकें। उनकी इसी ज़िद और द्वेष के कारण, उनपर ईश्वर का कोप हुआ। यद्यपि यहूदियों के समक्ष हज़रत मूसा का तर्क अत्यन्त स्पष्ट था परन्तु उन्होंने बछड़े की पूजा आरंभ कर दी और ईश्वर को भुला दिया किंतु जब उन्होंने तौबा की तो ईश्वर ने उन्हें क्षमा कर दिया। इस आयत से हमने सीखा कि सत्य की खोज में रहना, बहानेबाज़ी से अलग है, जो सत्य को प्राप्त करने के प्रयास में रहता है स्पष्ट तर्क मिलने पर संतुष्ट हो जाता है परन्तु बहानेबाज़, प्रतिदिन एक नई मांग सामने रखता है।ज़िद, द्वेष और इन्कार इस संसार में ईश्वरीय कोप की भूमिकाएं हैं पैग़म्बरों के आसमानी धर्मों के सामने मोर्चा नहीं खोलना चाहिए।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 154 की तिलावत सुनते हैं।وَرَفَعْنَا فَوْقَهُمُ الطُّورَ بِمِيثَاقِهِمْ وَقُلْنَا لَهُمُ ادْخُلُوا الْبَابَ سُجَّدًا وَقُلْنَا لَهُمْ لَا تَعْدُوا فِي السَّبْتِ وَأَخَذْنَا مِنْهُمْ مِيثَاقًا غَلِيظًا (154)और हमने बनी इस्राईल से वचन लेने के लिए तूर पर्वत को उनके सिरों पर लटका दिया और उनसे कहा कि सज्दा करते हुए द्वार से प्रवेष करो और उनसे कहा कि शनिवार के (आदेशों के) संबंध में ज़्यादती न करना और हमने उनसे ठोस वचन लिया। (4:154)सूरए बक़रह की आयत संख्या ६३ और ९३ के समान विषय वाली यह आयत ईश्वर द्वारा बनी इस्राईल से वचन लेने की पद्धति की ओर संकेत करते हुए कहती है कि ईश्वर के इरादे से तूर नामक पर्वत अपने स्थान से उखड़ कर उनके सरों पर आकर ठहर गया। इसके पश्चात हज़रत मूसा ने ईश्वरीय वचनों का उल्लेख किया जिन्हें बनी इस्राईल ने स्वीकार कर लिया।उन वचनों में एकेश्वरवाद, माता-पिता के साथ भलाई, वंचितों की देख-भाल, नमाज़ पढ़ना और ज़कात देना इत्यादि शामिल थे। इन वचनों का विस्तारपूर्ण उल्लेख सूरए बक़रह में ४०वीं आयत और ८३वीं आयत के बाद किया गया है। इस आयत में भी उनमें से दो वचनों की ओर संकेत करते हुए कहा गया है कि अपने पापों से तौबा और प्रायश्चित के लिए उन्हें बैतुल मुक़द्दस में प्रवेष करते समय ईश्वर के भय के साथ सज्दा करते हुए प्रविष्ट होना चाहिए, जैसाकि शनिवार के दिन उन्हें भौतिक कार्यों और व्यापार को त्यागना चाहिए था और शनिवार को मछली के शिकार को वर्जित करने वाले ईश्वरीय आदेश का सम्मान करना चाहिए था परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया जबकि ईश्वर उनसे ठोस वचन ले चुका है।इस आयत में हमने सीखा कि धर्म की स्वीकृति केवल बुद्धि और मन से नहीं होती बल्कि इसके लिए ईश्वरीय वचनों और आदेशों पर प्रतिबद्ध रहना चाहिए।पवित्र स्थानों विशेषकर मस्जिदों के कुछ विशेष संस्कार हैं जिनका सम्मान करना चाहिए।उपासना के विशेष समय में कोई सांसारिक काम करना एक प्रकार से ईश्वरीय आदेशों का उल्लंघन है।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 155 की तिलावत सुनते हैं।فَبِمَا نَقْضِهِمْ مِيثَاقَهُمْ وَكُفْرِهِمْ بِآَيَاتِ اللَّهِ وَقَتْلِهِمُ الْأَنْبِيَاءَ بِغَيْرِ حَقٍّ وَقَوْلِهِمْ قُلُوبُنَا غُلْفٌ بَلْ طَبَعَ اللَّهُ عَلَيْهَا بِكُفْرِهِمْ فَلَا يُؤْمِنُونَ إِلَّا قَلِيلًا (155)तो हमने उनके द्वारा कथनों के उल्लंघन, ईश्वर की निशानियों के इन्कार, पैग़म्बरों की अनर्थ हत्या और इस कथन के कारण कि हमारे हृदय बंद हो चुके हैं और उन पर ताले लग गए हैं (हमने उनको दण्डित किया) बल्कि (इससे भी बढ़कर) ईश्वर ने उनके कुफ़्र के कारण उनके हृदयों पर मोहर लगा दी है और केवल कुछ ही लोग ईमान लाते हैं। (4:155)पिछली आयत में बनी इस्राईल के सिरों पर तूर पर्वत को लटका कर उनसे कड़ा ईश्वरीय वचन लेने के वर्णन के पश्चात यह आयत कहती है कि इतनी ढेर सारी ईश्वरीय निशानियों के बावजूद उन्होंने अपने वचनों को तोड़ा और न केवल ईश्वरीय आदेशों का उल्लंघन किया बल्कि चमत्कारों का भी इन्कार कर दिया यहां तक कि ईश्वरीय पैग़म्बरों की हत्या भी की और अपने इस कार्य के औचित्य में वे कहने लगे कि इन कामों के लिए हमारे हृदय ढंके हुए हैं और यदि हमने कोई उल्लंघन किया तो यह हमारे बस में नहीं है। क़ुरआन उनके उत्तर में कहता है कि इस कुफ़्र, द्वेष और ज़िद के कारण ही तुम्हारे हृदयों पर मुहर लगा दी गई और अब तुम्हारे मोक्ष और कल्याण का कोई मार्ग नहीं बचा है।इस आयत से हमने सीखा कि अनुकंपा और विभूति पर अकृतज्ञता कभी इस सीमा तक पहुंच जाती है कि पैग़म्बरों के हाथों स्वतंत्र होने वाले ही उनके हत्यारे बन जाते हैं।ईश्वरीय दण्ड, हमारे ही विचारों और कर्मों का परिणाम है। स्वेच्छा से किए गए कर्मों पर दण्ड भी स्वाभाविक है।