islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए निसा; आयतें 156-161 (कार्यक्रम 157)

    सूरए निसा; आयतें 156-161 (कार्यक्रम 157)

    Rate this post

    आइये पहले सूरए निसा की आयत नंबर 156, 157 और 158 की तिलावत सुनें।وَبِكُفْرِهِمْ وَقَوْلِهِمْ عَلَى مَرْيَمَ بُهْتَانًا عَظِيمًا (156) وَقَوْلِهِمْ إِنَّا قَتَلْنَا الْمَسِيحَ عِيسَى ابْنَ مَرْيَمَ رَسُولَ اللَّهِ وَمَا قَتَلُوهُ وَمَا صَلَبُوهُ وَلَكِنْ شُبِّهَ لَهُمْ وَإِنَّ الَّذِينَ اخْتَلَفُوا فِيهِ لَفِي شَكٍّ مِنْهُ مَا لَهُمْ بِهِ مِنْ عِلْمٍ إِلَّا اتِّبَاعَ الظَّنِّ وَمَا قَتَلُوهُ يَقِينًا (157) بَلْ رَفَعَهُ اللَّهُ إِلَيْهِ وَكَانَ اللَّهُ عَزِيزًا حَكِيمًا (158) और अपने कुफ़्र तथा अपनी बातों के कारण उन्होंने मरयम पर बहुत बड़ा लांछन लगाया (4:156) और बहुत बड़ा पाप कर बैठे और इसी प्रकार उनके इस कथन के कारण कि हमने ईश्वर के पैग़म्बर, मरयम के पुत्र ईसा की हत्या की, (उन पर हमारा कोप हुआ) जबकि उन्होंने न तो ईसा की हत्या की और न ही उन्हें सूली पर चढ़ाया, बल्कि मामला उनके लिए संदिग्ध बना दिया गया। और निःसंदेह जिन लोगों ने ईसा के बारे में मतभेद किया वे सभी संदेह में थे, उनमें से किसी को भी विचारों और कल्पनाओं के अतिरिक्त विश्वास नहीं था, उन्होंने विश्वास के साथ उनकी हत्या नहीं की थी (4:157) बल्कि ईश्वर उन्हें अर्थात हज़रत ईसा को अपनी ओर ऊपर ले गया था और ईश्वर अत्यंत शक्तिशाली एवं तत्वदर्शी है। (4:158)पिछले कार्यक्रम में हमने उन आयतों का उल्लेख किया था जो बनी इस्राईल पर ईश्वरीय कोप और दण्ड के कारणों का वर्णन कर रही थीं, ये आयतें भी उसी विषय को आगे बढ़ाते हुए कहती हैं कि यहूदियों ने पवित्र मरयम पर व्यभिचार का आरोप लगाया जो वास्तव में हज़रत ईसा मसीह के अवैध होने तथा मार्गदर्शन व पैग़म्बरी के लिए उनकी अक्षमता का आरोप था और यही आरोप उनके द्वारा हज़रत ईसा की पैग़म्बरी के इन्कार और कुफ़्र का तर्क बन गया।वे न केवल यह कि इस प्रकार की अनुचित बातें करते थे बल्कि उन्होंने हज़रत ईसा मसीह की हत्या का षड्यंत्र भी रचा और अपने विचार में उन्हें सूली पर चढ़ा दिया, वे अपने हस कार्य पर गर्व भी करते थे और घमण्ड से कहते थे कि हम ही ने ईसा की हत्या की है परन्तु क़ुरआने मजीद कहता है कि उन लोगों ने ईसा के स्थान पर उन्हीं के जैसे किसी दूसरे व्यक्ति को सूली पर चढ़ा दिया था और मामला उनकी समझ में न आ सका क्योंकि ईश्वर हज़रत ईसा को आकाशों पर ले गया और उसने, उन्हें यहूदियों के षड्यंत्रों से बचा लिया।इन आयतों से हमने सीखा कि कभी-2 पवित्रतम लोगों पर सबसे बुरे आरोप लगाए जाते हैं, अपनी जाति में हज़रत मरयम से अधिक पवित्र कोई नहीं था तथा एक महिला के लिए व्यभिचार के आरोप से बढ़कर कोई आरोप नहीं हो सकता।मनुष्य का शिष्टाचारिक पतन कभी-2 इस सीमा तक बढ़ जाता है कि वह ईश्वरीय पैग़म्बर की हत्या पर गर्व करने लगता है।जिस प्रकार हज़रत ईसा मसीह का जन्म असामान्य थी, उसी प्रकार संसार से उनका जाना भी असामान्य था और वे आकाश पर चले गए।आइये अब सूरए निसा की आयत नंबर 159 की तिलावत सुनें।وَإِنْ مِنْ أَهْلِ الْكِتَابِ إِلَّا لَيُؤْمِنَنَّ بِهِ قَبْلَ مَوْتِهِ وَيَوْمَ الْقِيَامَةِ يَكُونُ عَلَيْهِمْ شَهِيدًا (159) और आसमानी किताब का कोई भी अनुयाई नहीं है जब तक वह मृत्यु से पूर्व हज़रत ईसा पर ईमान न ले आए। और वह (अर्थात हज़रत ईसा) प्रलय के दिन उनके लिए गवाही देंगे। (4:159)इस्लामी इतिहास और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम व उनके परिजनों के कथनों के आधार पर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम, ईश्वर के आदेश से आकाशों पर चले गए हैं और संसार के अंतिम काल में आकाश से नीचे आएंगे तथा पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के वंशज इमाम महदी अलैहिस्सलाम के पीछे नमाज़ पढ़ेंगे जो अत्याचार से लड़ने और न्याय व शांति स्थापित करने के लिए संघर्ष करेंगे।उस समय सभी ईसाई उन पर ईमान ले आएंगे किंतु सही और सच्चा ईमान, न यह कि उन्हें ईश्वर का पुत्र समझें। यहूदी भी हज़रत ईसा मसीह की पैग़म्बरी की गवाही देंगे।इस आयत से हमने सीखा कि मृत्यु, सभी मनुष्यों यहां तक कि पैग़म्बरों तक के लिए एक निश्चित परंपरा है। हज़रत ईसा मसीह भी जो शताब्दियों से आकाशों में जीवित हैं, धरती पर आएंगे और उन्हें भी मृत्यु आएगी।पैग़म्बर अपने अपने समुदाय के लोगों के कर्मों के गवाह हैं और प्रलय के दिन अपनी गवाही पेश करेंगे।आइये अब सूरए निसा की आयत नंबर 160 की तिलावत सुनें।فَبِظُلْمٍ مِنَ الَّذِينَ هَادُوا حَرَّمْنَا عَلَيْهِمْ طَيِّبَاتٍ أُحِلَّتْ لَهُمْ وَبِصَدِّهِمْ عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ كَثِيرًا (160) तो यहूदियों ने (अपने आप पर और दूसरों पर) जो अत्याचार किया उसके कारण उनके और उनके द्वारा अनेक लोगों को ईश्वर के मार्ग से रोके जाने के कारण, हमने उन पवित्र वस्तुओं को जो उनके लिए वैध थीं, अवैध कर दिया। (4:160)जैसा कि वर्तमान तौरैत में भी मौजूद है, ईश्वर ने यहूदी समुदाय को दंडित करने के लिए कुछ वैध वस्तुओं को उनके लिए अवैध कर दिया था और हज़रत ईसा मसीह के आने के पश्चात उन्हें फिर से वैध कर दिया गया। इस बात से पता चलता है कि ईश्वरीय अनुकंपाओं से लाभान्वित होने में लोगों व समाज के कर्मों तथा परिस्थितियों का प्रभाव होता है।क़ुरआने मजीद की कुछ अन्य आयतों में हम पढ़ते हैं कि कुछ अनुकंपाओं से वंचितता का कारण समाज के अनाथों एवं वंचितों की अनदेखी है। जिस प्रकार से कि ईश्वर पर ईमान और भले कर्म, आकाश से विभूतियों व अनुकंपाओं के उतरने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर की ओर से कुछ वंचितताएं, कभी-2 दण्ड देने के लिए होती हैं, न यह कि उनका कारण वस्तुओं में पाया जाने वाला नुक़्सान या गंदगी हो।दूसरों पर अत्याचार, ईश्वरीय विभूतियों व अनुकंपाओं से वंचित होने के कारणों में से एक है।आइये अब सूरए निसा की आयत नंबर 161 की तिलावत सुनें।وَأَخْذِهِمُ الرِّبَا وَقَدْ نُهُوا عَنْهُ وَأَكْلِهِمْ أَمْوَالَ النَّاسِ بِالْبَاطِلِ وَأَعْتَدْنَا لِلْكَافِرِينَ مِنْهُمْ عَذَابًا أَلِيمًا (161) और व्याज लेने के कारण, जिससे रोका गया था, तथा लोगों का माल अवैध रूप से खाने के कारण (वैध वस्तुओं को हमने उनके लिए अवैध कर दिया) और उनमें से जो लोग काफ़िर हैं हमने उनके लिए कड़ा दण्ड तैयार कर रखा है। (4:161)पिछली आयत में बनी इस्राईल पर ईश्वरीय कोप व दण्ड के कारणों का उल्लेख करने के पश्चात यह आयत कहती है कि। यद्यपि बनी इस्राईल को व्याज लेने से रोका गया था परंतु उन्होंने इस ईश्वरीय आदेश की अवहेलना की और अवैध ढंग से लोगों का माल खाते रहे, अतः ईश्वर ने भी संसार की अनेक हलाल व वैध वस्तुओं को उनके लिए अवैध कर दिया।इस आयत से हमने सीखा कि व्याज लेना सभी ईश्वरीय धर्मों में वर्जित रहा है और सभी ईश्वरीय विचारधाराओं में आर्थिक संबंधों के मामले में मानवाधिकारों की रक्षा पर बल दिया गया है।व्याज लेना, यद्यपि विदित रूप से अधिक आय का स्रोत और सफलता का कारण है परन्तु वास्तव में वंचितता और दण्ड की भूमिका है।