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    सूरए निसा; आयतें 162-165 (कार्यक्रम 158)

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    आइये पहले सूरए निसा की आयत नंबर 162 की तिलावत सुनें।لَكِنِ الرَّاسِخُونَ فِي الْعِلْمِ مِنْهُمْ وَالْمُؤْمِنُونَ يُؤْمِنُونَ بِمَا أُنْزِلَ إِلَيْكَ وَمَا أُنْزِلَ مِنْ قَبْلِكَ وَالْمُقِيمِينَ الصَّلَاةَ وَالْمُؤْتُونَ الزَّكَاةَ وَالْمُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآَخِرِ أُولَئِكَ سَنُؤْتِيهِمْ أَجْرًا عَظِيمًا (162)किंतु उनमें जो लोग ज्ञान में परिपक्व और ईमान वाले हैं, वे उन सब पर आस्था रखते हैं जो तुम पर उतरा है या तुमसे पूर्व उतर चुका है। और जो विशेष रूप से नमाज़ स्थापित करने वाले, ज़कात देने वाले और ईश्वर तथा प्रलय पर ईमान रखने वाले हैं, हम शीघ्र ही उन्हें पारितोषिक देंगे। (4:162)पिछले कुछ कार्यक्रमों में यहूदी जाति के बुरे लोगों के उल्लंघनों और पापों की ओर संकेत किया गया था परंतु यहूदी जाति में कुछ भले लोग भी पाए जाते थे जो सच्चे ईमान वालों की भांति ईश्वर के आदेशों का पालन करते और उसके समक्ष नतमस्तक रहते थे। क़ुरआने मजीद ने, जो पिछली जातियों की बातों और घटनाओं के वर्णन में पूर्णतः न्याय से काम लेता है, इस गुट की ओर भी संकेत किया है, वह कहता है।जिनके दिलों में ईमान घर कर चुका है, चाहे वे यहूदी हों या अन्य ईमान वाले, वे हर उस बात पर ईमान रखते हैं जो ईश्वर की ओर से हो। व्यवहारिक रूप से भी वे नमाज़ पढ़ने वाले तथा ज़कात देने वाले हैं। अतः ईश्वर अपनी दया व कृपा से उन्हें बहुत बड़ा बदला व पारितोषिक देगा।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर और सत्य पर ईमान के लिए कोई स्थान या सीमा निर्धारित नहीं है, जो भी ईश्वर पर ईमान रखेगा, चाहे वह किसी भी वर्ण या जाति का हो, उस पर ईश्वर की विशेष कृपा होगी।नमाज़ और ज़कात सभी ईश्वरीय धर्मों में रहे हैं परंतु सेवा के बिना उपासना का कोई अर्थ नहीं, जैसे कि बिना उपासना के सेवा, घमण्ड और अहं का कारण बनती है।आइये अब सूरए निसा की आयत नंबर 163 की तिलावत सुनें।إِنَّا أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ كَمَا أَوْحَيْنَا إِلَى نُوحٍ وَالنَّبِيِّينَ مِنْ بَعْدِهِ وَأَوْحَيْنَا إِلَى إِبْرَاهِيمَ وَإِسْمَاعِيلَ وَإِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ وَالْأَسْبَاطِ وَعِيسَى وَأَيُّوبَ وَيُونُسَ وَهَارُونَ وَسُلَيْمَانَ وَآَتَيْنَا دَاوُودَ زَبُورًا (163)(हे पैग़म्बर!) हमने आपके पास (ईश्वरीय संदेश) वहि भेजा जिस प्रकार से हमने नूह और उसके बाद के पैग़म्बरों के पास वहि भेजी। जैसा कि हमने इब्राहीम, इस्माईल, इस्हाक़, याक़ूब और उनके पुत्रों तथा ईसा, अय्यूब, युनुस, हारून और सुलैमान के पास वहि भेजी और हमने दावूद को ज़बूर दी। (4:163)यह आयत पूरे इतिहास में पैग़म्बरों के भेजे जाने और उनकी पैग़म्बरी की प्रक्रिया की ओर संकेत करते हुए कहती है कि स्वयं आसमानी किताब रखने के बावजूद यहूदी और ईसाई इस बात पर क्यों आश्चर्य करते हैं कि क़ुरआन तुम पर उतरा है? क्या उन्हें नहीं पता कि ईश्वर ने हज़रत ईसा व मूसा सहित अनेक मनुष्यो को पैग़म्बर बनाया तथा उन्हें किताब दी है? तो वे तुम पर ईश्वरीय संदेश वहि आने को क्यों स्वीकार नहीं करते और तुम्हारी पैग़म्बरी पर ईमान क्यों नहीं लाते?इस आयत से हमने सीखा कि सभी ईश्वरीय धर्मों के लक्ष्य और उद्देश्य एक हैं क्योंकि उन सभी का स्रोत ईश्वर है।पूरे इतिहास में पैग़म्बरी के क्रम पर ध्यान देने से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की पैग़म्बरी को स्वीकार करने का मार्ग प्रशस्त होता है।अब सूरए निसा की आयत नंबर 164 और 165 की तिलावत सुनते हैं।وَرُسُلًا قَدْ قَصَصْنَاهُمْ عَلَيْكَ مِنْ قَبْلُ وَرُسُلًا لَمْ نَقْصُصْهُمْ عَلَيْكَ وَكَلَّمَ اللَّهُ مُوسَى تَكْلِيمًا (164) رُسُلًا مُبَشِّرِينَ وَمُنْذِرِينَ لِئَلَّا يَكُونَ لِلنَّاسِ عَلَى اللَّهِ حُجَّةٌ بَعْدَ الرُّسُلِ وَكَانَ اللَّهُ عَزِيزًا حَكِيمًا (165)और हमने जिन का उल्लेख तुम से किया और जिनका उल्लेख तुमसे नहीं किया, उन सभी पैग़म्बरों पर भी वहि भेजी और ईश्वर ने मूसा से वैसे बात की जैसे बात करने का हक़ है। (4:164) ये सारे पैग़म्बर शुभ सूचना देने और डराने वाले थे ताकि पैग़म्बरों के आने के पश्चात ईश्वर के समक्ष लोगों का कोई तर्क (और बहाना) न रह जाए और ईश्वर सदैव ही शक्तिशाली एवं तत्वदर्शी है। (4:165)पिछली आयत में कुछ पैग़म्बरों के नामों का उल्लेख करने के पश्चात इस आयत में ईश्वर कहता है कि यह मत सोचो कि पैग़म्बरी केवल इतने ही लोगों में सीमित रही है, नहीं, बल्कि कुछ पैग़म्बरों का नाम क़ुरआने मजीदतक में नहीं है और बहुत कम ही पैग़म्बरों का उल्लेख किसी विशेष बात के अवसर पर किया गया है।इसके पश्चात ईश्वर, पैग़म्बरों के दायित्व की ओर संकेत करते हुए कहता है कि पैग़म्बरों का मूल दायित्व डराना और शुभ सूचना देना है। ख़तरों की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट कराना तथा भले कर्मों के लिए प्रोत्साहित करना और उनके पारितोषिक की ओर से आशावान रखना। जिस व्यक्ति तक यह भय और आशा पहुंच जाती है वह प्रलय के दिन ईश्वर के न्याय की अदालत में यह तर्क नहीं प्रस्तुत कर सकता कि मैं अच्छे और बुरे को नहीं पहचानता था कि उन पर अमल कर सकता।अलबत्ता यह बात यहां उल्लेखनीय है कि बुद्धि और अक़्ल भी ईश्वर का तर्क है परंतु चूंकि उसके सोचने और समझने की योग्यता संसार तक सीमित है अतः ईश्वर प्रलय में केवल उसी को दंडित करेगा जिस तक पैग़म्बरों का निमंत्रण पहुंच चुका हो।इन आयतों से हमने सीखा कि इतिहास की सभी घटनाओं को सुनने के लिए न मनुष्य की आयु पर्याप्त है और न ही पूरा इतिहास सुनने की आवश्यकता है। यदि हमारे पास सुनने वाले कान हों तो एक ही घटना शिक्षा के लिए काफ़ी है। इसी कारण क़ुरआने मजीद पैग़म्बरों के इतिहास की शिक्षाओं और पाठों की केवल कुछ झलक दिखाता है, उनका पूरा इतिहास नहीं सुनाता।वास्तविकता स्पष्ट होती है, पैग़म्बरों का काम पढ़ाना और सिखाना नहीं बल्कि भय और आशा के मार्ग से लोगों को सचेत और सावधान करना है।यद्यपि सभी पैग़म्बरों पर ईश्वरीय संदेश उतरा है और ईश्वर ने उनसे बात की है परंतु फ़िरऔन से संघर्ष के संबंध में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के कड़े दायित्व के कारण उन्हें ईश्वर से अधिक व निकट संपर्क की आवश्यकता थी इसी लिए उन्हें कलीमुल्लाह या ईश्वर से बात करने वाला कहते हैं।