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    सूरए निसा; आयतें 166-170 (कार्यक्रम 159)

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    आइये पहले सूरए निसा की आयत नंबर 166 की तिलावत सुनें।لَكِنِ اللَّهُ يَشْهَدُ بِمَا أَنْزَلَ إِلَيْكَ أَنْزَلَهُ بِعِلْمِهِ وَالْمَلَائِكَةُ يَشْهَدُونَ وَكَفَى بِاللَّهِ شَهِيدًا (166)(हे पैग़म्बर! यद्यपि काफ़िर आपकी पैग़म्बरी को स्वीकार नहीं करते) परंतु ईश्वर उस चीज़ के बारे में गवाही देता है जो उसने आपकी ओर भेजी है क्योंकि उसने उसे अपने ज्ञान के आधार पर उतारा है और फ़रिश्ते भी आपकी सत्यता पर गवाही देते हैं (यद्यपि) ईश्वर की गवाही (आपके लिए) काफ़ी है। (4:166)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि काफ़िर और आसमानी किताब वाले सांप्रदायिकता और द्वेष के कारण इस्लाम धर्म और पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की सत्यता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुए। यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम को सांत्वना देते हुए कहती है कि यदि ये लोग आपकी पैग़म्बरी को नकार रहे हैं तो इसका कोई महत्व नहीं है क्योंकि ईश्वर ने क़ुरआने मजीद को अपने अपार ज्ञान के आधार पर उतारा है और उसकी बातें इसका स्पष्ट प्रमाण हैं कि यह किताब मनुष्यों के विचारों से कहीं ऊपर है और यही बात उसके ईश्वरीय होने का सबसे अच्छा प्रमाण है।यह बात किस प्रकार संभव है कि जिस व्यक्ति ने किसी भी मनुष्य से लिखना-पढ़ना न सीखा हो वह अनेकेश्वरवाद, अज्ञान और अंधविश्वास से भरे क्षेत्र में लोगों को ऐसी शिक्षाएं दे जिनका महत्व और मूल्य आज 14 शताब्दियां बीत जाने के बाद समझ में आ रहा है। ऐसी शिक्षाएं जिनकी छाया में लोगों में परिवर्तन आया तथा फूट, एकता में, कंजूसी, बलिदान में, अनेकेश्वरवाद, एकेश्वरवाद में, अज्ञान, ज्ञान में तथा अपमान, सम्मान में परिवर्तित हो गया और एक महान इस्लामी समुदाय अस्तित्व में आया।इस आयत से हमने सीखा कि वहि अर्थात ईश्वरीय संदेश का स्रोत ईश्वर का अपार ज्ञान है, इसी कारण जैसे जैसे विज्ञान प्रगति करता जा रहा है, वैसे वैसे ईश्वरीय शिक्षाओं और रहस्यों के बारे में जानकारी बढ़ती जा रही है।हर धर्म प्रचारक की आशा का केंद्र और सबसे अच्छा सहारा, ईश्वर होना चाहिए तथा लोगों का इन्कार, उसके मार्ग की सत्यता को प्रभावित न करे।आइये अब सूरए निसा की आयत नंबर 167, 168 और 169 की तिलावत सुनें।إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا وَصَدُّوا عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ قَدْ ضَلُّوا ضَلَالًا بَعِيدًا (167) إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا وَظَلَمُوا لَمْ يَكُنِ اللَّهُ لِيَغْفِرَ لَهُمْ وَلَا لِيَهْدِيَهُمْ طَرِيقًا (168) إِلَّا طَرِيقَ جَهَنَّمَ خَالِدِينَ فِيهَا أَبَدًا وَكَانَ ذَلِكَ عَلَى اللَّهِ يَسِيرًا (169)निसंदेह जो लोग काफ़िर हुए और लोगों को ईश्वर के मार्ग (पर चलने) रोकते रहे वे बड़ी पथभ्रष्टता में जा गिरे। (4:167) निसंदेह जिन काफ़िरों ने अत्याचार किया, ईश्वर उन्हें क्षमा करना तथा किसी मार्ग की ओर उनका मार्गदर्शन नहीं करना चाहता। (4:168) सिवाए नरक के मार्ग के जहां वे सदैव रहेंगे और यह ईश्वर के लिए अत्यंत सरल है। (4:169)पिछली आयतों में ईमान न लाने वाले लोगों तथा उनके बारे में इस्लाम के व्यवहार के संबंध में बात की गई। ये आयतें काफ़िरों के एक गुट की ओर संकेत करती हैं जो स्वयं पथभ्रष्ट होने के साथ ही दूसरों को भी बहकाने का प्रयास करता है। उसने अपने ऊपर भी अत्याचार किया और दूसरों पर भी। स्वयं भी पथभ्रष्ट हुआ और अनेक लोगों की पथभ्रष्टता का भी कारण बना।इसी कारण ऐसा प्रतीत नहीं होता कि ऐसे लोग अपना मार्ग छोड़ेंगे अतः उनके मोक्ष व मुक्ति और उन पर ईश्वर की दया की भी कोई आशा नहीं है। वे केवल नरक में जाएंगे जिसे उन्होंने अपने कर्मों द्वारा स्वयं के लिए तैयार किया है। अलबत्ता अधिकांश काफ़िर, ईश्वर की चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लेते जबकि वे एक दिन देखेंगे कि यह कड़ा दंड ईश्वर के लिए अत्यंत सरल है।इन आयतों से हमने सीखा कि कुफ़्र स्वयं व अन्य लोगों पर अत्याचार का कारण है और स्वयं अपने, अपने वंश और समाज के प्रति वैचारिक और सांस्कृतिक अत्याचार से बढ़ कर कौन सा अत्याचार हो सकता है?हर प्रकार का अत्याचार, ईश्वरीय क्षमा और मार्गदर्शन से वंचित होने और नरक में जाने का कारण है।आइये अब सूरए निसा की आयत नंबर 170 की तिलावत सुनें।يَا أَيُّهَا النَّاسُ قَدْ جَاءَكُمُ الرَّسُولُ بِالْحَقِّ مِنْ رَبِّكُمْ فَآَمِنُوا خَيْرًا لَكُمْ وَإِنْ تَكْفُرُوا فَإِنَّ لِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَكَانَ اللَّهُ عَلِيمًا حَكِيمًا (170)हे लोगो! पैग़म्बर सत्य के साथ तुम्हारे पास तुम्हारे पालनहार की ओर से आए हैं तो उन पर ईमान लाओ और यदि तुम इन्कार करते हो तो निसंदेह जो कुछ आकाशों और धरती में है वह सब ईश्वर ही का है और ईश्वर अत्यंत जानकार तथा तत्वदर्शी है। (4:170)ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर ज्ञात होता है कि आसमानी किताब वाले, विशेष कर यहूदी अपनी किताबों में मौजूद शुभ सूचनाओं के अंतर्गत अरब मूल के एक पैग़म्बर के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे और इसी कारण उनका एक गुट मदीना नगर भी गया था। इसी प्रकार अनेकेश्वरवादियों ने भी इस संबंध में कुछ बातें सुन रखी थीं और वे भी पैग़म्बर के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे।अतः इस संबंध में क़ुरआने मजीद कहता है कि वही पैग़म्बर जिसकी तुम प्रतीक्षा कर रहे थे, सत्य कथन के साथ और वास्तविकता के आधार पर तुम्हारी ओर आया है। जान लो कि यदि तुम उस पर ईमान लाओगे और उसकी बताई बातों का पालन करोगे तो यह तुम्हारे हित में है और यदि तुम उसका इन्कार करते हो तो इससे उसे या उसके ईश्वर को कोई क्षति नहीं होगी।क्योंकि ईश्वर सभी आकाशों और धरती का स्वामी है और तुम्हारी नमाज़ों या उपासना की उसे कोई आवश्यकता नहीं है। अलबत्ता ईश्वर ने तुम्हें जो आदेश दिए हैं वे उसके अनंत ज्ञान व तत्वदर्शिता के आधार पर हैं और उसने तुम्हारे हितों को दृष्टिगत रखा है।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों की शिक्षाओं की सबसे बड़ी विशेषता, उनका सत्य और सत्यता पर आधारित होना है और यही बात उनके निमंत्रण के फैलने का कारण है।हमें अपने ईमान से ईश्वर पर उपकार नहीं जताना चाहिए बल्कि हम पर ईश्वर का उपकार है कि उसने हमारा मार्गदर्शन किया है।न लोगों का कुफ़्र ईश्वर को क्षति पहुंचाता है और न उनके ईमान से उसे कोई लाभ होता है। ईमान स्वयं लोगों के हित में है।