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    सूरए निसा; आयतें 171-176 (कार्यक्रम 160)

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    आइये पहले सूरए निसा की आयत नंबर 171 की तिलावत सुनें।يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لَا تَغْلُوا فِي دِينِكُمْ وَلَا تَقُولُوا عَلَى اللَّهِ إِلَّا الْحَقَّ إِنَّمَا الْمَسِيحُ عِيسَى ابْنُ مَرْيَمَ رَسُولُ اللَّهِ وَكَلِمَتُهُ أَلْقَاهَا إِلَى مَرْيَمَ وَرُوحٌ مِنْهُ فَآَمِنُوا بِاللَّهِ وَرُسُلِهِ وَلَا تَقُولُوا ثَلَاثَةٌ انْتَهُوا خَيْرًا لَكُمْ إِنَّمَا اللَّهُ إِلَهٌ وَاحِدٌ سُبْحَانَهُ أَنْ يَكُونَ لَهُ وَلَدٌ لَهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ وَكَفَى بِاللَّهِ وَكِيلًا (171)हे आसमानी किताब वालो! अपने धर्म में अतिशयोक्ति न करो और सत्य के अतिरिक्त कोई बात ईश्वर से संबंधित न करो। निःसंदेह मरयम के पुत्र ईसा मसीह ईश्वर के पैग़म्बर और उसकी निशानी के अतिरिक्त कुछ नहीं, जिसे ईश्वर ने मरयम की ओर भेजा और (ईसा मसीह) ईश्वर की (ओर से) आत्मा हैं तो ईश्वर और उसके पैग़म्बरों पर ईमान लाओ और (कदापि) तीन का नाम भी न लो, इसे छोड़ दो कि यही तुम्हारे लिए बेहतर है, और ईश्वर तो केवल अनन्य अल्लाह है और यह उसकी महिमा के प्रतिकूल है कि उसके कोई पुत्र हो। जो कुछ आकाशों और धरती में है, उसी का है और संसार की अभिभावकता एवं युक्ति के लिए ईश्वर पर्याप्त है। (4:171)अतीत से लेकर अब तक ईसाइयों की एक आस्था तीन ईश्वरों पर विश्वास की रही है, अर्थात वे ईश्वर को ईशपिता, हज़रत ईसा मसीह को ईशपुत्र तथा पवित्र आत्मा को इन दोनों के बीच संपर्ककर्ता समझते हैं। यह बात मुसलमानों के दृष्टिकोण से अनकेश्वरवाद या शिर्क है क्योंकि हज़रत ईसा ईश्वर के बंदे और उसकी रचना हैं और बंदा कभी भी ईश्वर नहीं हो सकता चाहे उसकी सृष्टि और जन्म अन्य लोगों से भिन्न ही क्यों न हो।यदि ईश्वर की आज्ञा से अविवाहित हज़रत मरयम से ईसा मसीह का जन्म, ईश्वर होने की निशानी है हज़रत आदम अलैहिस्सलाम, जो बिना माता-पिता के ईश्वर की आज्ञा से संसार में आए, ईश्वर होने के अधिक समीप हैं। इसके अतिरिक्त ईश्वर की को पत्नी और समकक्ष भी नहीं है कि हज़रत ईसा उसके पुत्र हों बल्कि वे ईश्वर की शक्ति की निशानी हैं जो उसके इरादे के अंतर्गत हज़रत मरयम के माध्यम से संसार मे आए।इस आयत से हमने सीखा कि धार्मिक नेताओं और धर्म के बारे में अतिशयोक्ति मनुष्य को सत्य के मार्ग से विचलित करके असत्य के अंधेरों में पहुंचा देती है।ईश्वर के निकट बहुत उच्च स्थान रखने के बावजूद, ईश्वरीय पैग़म्बर मनुष्य ही हैं और वे कदापि ईश्वर नहीं हो सकते।आइये अब सूरए निसा की आयत नंबर 172 की तिलावत सुनें।لَنْ يَسْتَنْكِفَ الْمَسِيحُ أَنْ يَكُونَ عَبْدًا لِلَّهِ وَلَا الْمَلَائِكَةُ الْمُقَرَّبُونَ وَمَنْ يَسْتَنْكِفْ عَنْ عِبَادَتِهِ وَيَسْتَكْبِرْ فَسَيَحْشُرُهُمْ إِلَيْهِ جَمِيعًا (172)न (ईसा) मसीह को इस बात से इन्कार है कि वे ईश्वर के बंदे हैं और न (ईश्वर के) निकट फ़रिश्तों को (उसकी बंदगी से इन्कार है) और जो कोई ईश्वर की बंदगी का इन्कार करेगा तो (जान लो कि) ईश्वर शीघ्र ही सबको अपने पास एकत्रित करेगा। (4:172)यह आयत ईसाइयों को संबोधित करते हुए कहती है कि क्यों तुम लोग ईसा मसीह को ईश्वर के स्थान तक पहुंचा देते हो जबकि उन्हें स्वयं ईश्वर का बंदा होने से इन्कार नहीं है, जैसा कि ईश्वर के फ़रिश्ते भी उससे अत्यधिक समीप होने के बावजूद उसकी बंदगी से इन्कार नहीं करते और मूल रूप से क्या इस बात की संभावना पाई जाती है कि कोई ईश्वर की महानता के सामने बड़ाई दिखाए और उसकी बंदगी से इन्कार करे।इस्लामी इतिहास में वर्णित है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने अपने काल के ईसाइयों के नेता से कहा कि हज़रत ईसा मसीह की हर बात अच्छी थी किंतु वे उपासना नहीं करते थे। वह अप्रसन्न हो कर कहने लगा कि हज़रत ईसा मसीह सबसे अधिक उपासना किया करते थे। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने उससे पूछा कि वे किसकी उपासना करते थे? वह निरुत्तर हो कर चुप हो गया क्योंकि वह समझ गया था कि इमाम के कहने का उद्देश्य यह है कि उपासक कभी उपासनीय नहीं हो सकता।इस आयत से हमने सीखा कि धार्मिक मामलों में अतिशयोक्ति नहीं करनी चाहिए, जब हज़रत ईसा मसीह स्वयं को ईश्वर का बंदा कहते हैं तो हम उन्हें ईशपुत्र क्यों समझें?ईश्वर की उपासना और उसकी बंदगी छोड़ने का कारण मनुष्य में घमण्ड व अहं का अस्तित्व है जो मनुष्य को सभी आध्यात्मिक विभूतियों से वंचित करके अनके ख़तरों के समक्ष ढकेल देता है।आइये अब सूरए निसा की आयत नंबर 173 की तिलावत सुनें।فَأَمَّا الَّذِينَ آَمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ فَيُوَفِّيهِمْ أُجُورَهُمْ وَيَزِيدُهُمْ مِنْ فَضْلِهِ وَأَمَّا الَّذِينَ اسْتَنْكَفُوا وَاسْتَكْبَرُوا فَيُعَذِّبُهُمْ عَذَابًا أَلِيمًا وَلَا يَجِدُونَ لَهُمْ مِنْ دُونِ اللَّهِ وَلِيًّا وَلَا نَصِيرًا (173)तो जो लोग ईश्वर पर ईमान लाए और भले कर्म करते रहे, ईश्वर उन्हें पूर्ण बदला देगा और अपनी कृपा से उसमें वृद्धि भी करेगा। और जिन लोगों ने इन्कार और घमण्ड किया, ईश्वर उन्हें कठोर दण्ड देगा और उन्हें ईश्वर के अतिरिक्त न कोई अभिभावक मिलेगा और न ही कोई सहायक। (4:173)हज़रत ईसा मसीह के बारे में ईसाइयों की ग़लत आस्थाओं के वर्णन के पश्चात यह आयत कहती है कि आसमानी किताब वालों में जो लोग ईमान रखने और भले कर्म करने वाले थे, उन्हें ईश्वर की ओर से पूर्ण बदला और पारितोषिक प्राप्त होगा तथा उन्हें मुक्ति प्राप्त हो जाएगी किंतु जिन लोगों ने सत्य को स्वीकार करने से इन्कार किया और ईश्वर के मुक़ाबले में घमण्ड किया वे प्रलय के कड़े दण्ड में फंसेंगे क्योंकि प्रलय में ईमान और भला कर्म ही काम आएगा और किसी भी धर्म या पैग़म्बर से संबंध, मुक्ति का कारण नहीं बनेगा।इस आयत से हमने सीखा कि सच्चे ईमान को कर्म पर प्राथमिकता प्राप्त है और बिना ईमान के कर्म, जाली नोट की भांति महत्तवहीन होता है।ईमान व कर्म के बिना सिफ़ारिश की आशा नहीं रखनी चाहिए, यद्यपि ईश्वरीय पैग़म्बर सिफ़ारिश की क्षमता रखते हैं।आइये अब आइये अब सूरए निसा की आयत नंबर 174 और 175 की तिलावत सुनें।يَا أَيُّهَا النَّاسُ قَدْ جَاءَكُمْ بُرْهَانٌ مِنْ رَبِّكُمْ وَأَنْزَلْنَا إِلَيْكُمْ نُورًا مُبِينًا (174) فَأَمَّا الَّذِينَ آَمَنُوا بِاللَّهِ وَاعْتَصَمُوا بِهِ فَسَيُدْخِلُهُمْ فِي رَحْمَةٍ مِنْهُ وَفَضْلٍ وَيَهْدِيهِمْ إِلَيْهِ صِرَاطًا مُسْتَقِيمًا (175)हे लोगो! तुम्हारे पास तुम्हारे पालनहार की ओर से स्पष्ट तर्क आ चुका है और हमने (क़ुरआन जैसा) स्पष्ट करने वाला प्रकाश भी तुम्हारी ओर उतारा है। (4:174) तो जो लोग ईश्वर पर ईमान लाए और उस (की रस्सी) को मज़बूती से थामे रहे, उन्हें वह शीघ्र ही अपनी दया व कृपा में प्रविष्ट कर लेगा और सीधे रास्ते की ओर उनकी मार्गदर्शन करेगा। (4:175)यह आयत एक बार पुनः सभी मनुष्यों विशेष कर आसमानी किताब वालों को संबोधित करते हुए कहती है कि ईश्वर ने अपने अंतिम पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को भेज कर तुम्हारे मार्गदर्शन के संबंध में अपना दायित्व पूरा कर दिया है और इस संबंध में अब तुम्हारे पास कोई तर्क नहीं है क्योंकि अरब के पिछड़े वातावरण में किसी से भी शिक्षा प्राप्त न करने वाल व्यक्ति की ओर से इस प्रकार की उच्च शिक्षाएं उसकी किताब के ईश्वरीय होने का स्पष्टतम तर्क हैं। यह ऐसी किताब है जो तुम्हारे मार्ग पर प्रकाश डालती है और ईश्वर की ओर जाने वाले रास्ते पर तुम्हारा मार्गदर्शन करती है और स्पष्ट है कि इस किताब और इसकी शिक्षाओं से लाभान्वित होने वालों और केवल ईश्वर के आदेशों का पालन करने वालों को ही मुक्ति और मोक्ष प्राप्त होगा। यह मुक्ति और मोक्ष ईश्वर की दया व कृपा की छाया में होगा तथा लोक-परलोक में मनुष्य को ईश्वर की ओर अग्रसर करेगा।इन आयतों से हमने सीखा कि इस्लाम का संदेश पूरे संसार के लिए है और वह हर काल के सभी लोगों को संबोधित करता है।ईश्वर का पारितोषिक, उसकी दया व कृपा है न कि हमारा अधिकार जैसा कि मूल मार्गदर्शन भी ईश्वर की कृपा ही है।आइये अब सूरए निसा की आयत नंबर 176 की तिलावत सुनें।يَسْتَفْتُونَكَ قُلِ اللَّهُ يُفْتِيكُمْ فِي الْكَلَالَةِ إِنِ امْرُؤٌ هَلَكَ لَيْسَ لَهُ وَلَدٌ وَلَهُ أُخْتٌ فَلَهَا نِصْفُ مَا تَرَكَ وَهُوَ يَرِثُهَا إِنْ لَمْ يَكُنْ لَهَا وَلَدٌ فَإِنْ كَانَتَا اثْنَتَيْنِ فَلَهُمَا الثُّلُثَانِ مِمَّا تَرَكَ وَإِنْ كَانُوا إِخْوَةً رِجَالًا وَنِسَاءً فَلِلذَّكَرِ مِثْلُ حَظِّ الْأُنْثَيَيْنِ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمْ أَنْ تَضِلُّوا وَاللَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ (176)(हे पैग़म्बर!) ये लोग आपसे (मीरास के आदेशों के बारे में) फ़तवा पूछते हैं तो आप कह दीजिए कि कलाला (अर्थात एक पिता या एक माता-पिता से जन्म लेने वाले भाई-बहन) की मीरास के बारे में ईश्वर तुम्हें यह आदेश देता है कि यदि कोई व्यक्ति मर जाए और उसकी कोई संतान (या माता-पिता) न हों परंतु बहन हो तो उसे मृतक के माल का आधा भाग मिलेगा और यदि बहन मर जाए और उसके कोई संतान न हो तो भाई उसका वारिस होगा और यदि मरने वाले व्यक्ति की दो बहनें हों तो वे माल का दो तिहाई भाग मीरास में लेंगी और यदि कई भाई और कई बहनें हों तो पुरुष का भाग महिला के भाग से दोगुना है। ईश्वर यह सब आदेश बयान कर रहा है ताकि तुम लोग पथभ्रष्ट न हो जाओ और जान लो कि ईश्वर हर वस्तु से भली भांति अवगत है। (4:176)क़ुरआने मजीद का यह चौथा सूरा, महिलाओं की मीरास के बारे में एक अन्य आदेश के साथ समाप्त होता है। यह भाई से बहन को मिलने वाली मीरास है कि जो अन्य भाई बहनों की उपस्थिति से परिवर्तित होती रहती है। जैसा कि इसी सूरे की 11वीं आयत की व्याख्या के दौरान हमने कहा था कि ईश्वर वारिसों के अधिकारों के सम्मान पर, चाहे वे लड़कियां हो या लड़के, अत्यधिक बल देता है और उसने ईमान वालों को आदेश दिया है कि वे मीरास और वसीयत को लागू करने में बहुत अधिक ध्यान दें।इस आयत से हमने सीखा कि धर्म केवल लोगों के परलोक संबंधी कल्याण के लिए ही नहीं वरन् उनके सांसारिक जीवन के लिए भी कार्यक्रम रखता है, मीरास का विषय एक आयाम से आर्थिक है और दूसरे से पारिवारिक, तथा इस्लाम ने दोनों आयामों के लिए अलग-2 आदेश दिए हैं।पुरुष को महिला से दोगुनी मीरास की प्राप्ति, ईश्वरीय ज्ञान के आधार पर है न कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के काल की विशेष सामाजिक परिस्थिति के कारण, जिसमें महिलाओं को कमज़ोर समझा जाता था, अतः हमें ईश्वर के आदेश के समक्ष नतमस्तक रहना चाहिए।