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    सूरए निसा; आयतें 19-23 (कार्यक्रम 123)

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    आइये पहले सूरए निसा की 19वीं आयत की तिलावत सुनें।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا لَا يَحِلُّ لَكُمْ أَنْ تَرِثُوا النِّسَاءَ كَرْهًا وَلَا تَعْضُلُوهُنَّ لِتَذْهَبُوا بِبَعْضِ مَا آَتَيْتُمُوهُنَّ إِلَّا أَنْ يَأْتِينَ بِفَاحِشَةٍ مُبَيِّنَةٍ وَعَاشِرُوهُنَّ بِالْمَعْرُوفِ فَإِنْ كَرِهْتُمُوهُنَّ فَعَسَى أَنْ تَكْرَهُوا شَيْئًا وَيَجْعَلَ اللَّهُ فِيهِ خَيْرًا كَثِيرًا (19)हे ईमान वालो! तुम्हारे लिए वैध नहीं है कि ज़बरदस्ती महिलाओं के वारिस बन जाओ या महिलाओं से अनिच्छा के बावजूद तुम केवल इसलिए उनसे विवाह करो ताकि उनके वारिस बन जाओ और उन पर कड़ाई न करो कि तुमने उन्हें जो मेहर दिया है उसका कुछ भाग अत्याचारपूर्वक ले सको सिवाए इसके कि वे खुल्लम खुल्ला कोई बुरा काम करें और उनके साथ भला व्यवहार करो तो यदि वे तुम्हें पसंद न आयें तो उन्हें तलाक़ मत दो क्योंकि बहुत सी चीज़ें तुम्हें पसंद नहीं हैं परंतु ईश्वर ने इसमें तुम्हारे लिए बहुत अधिक भलाई रखी है। (4:19)यह आयत जो पारिवारिक मामलों में महिला के अधिकारों की रक्षा से संबंधित है, आरंभ में पुरुषों को महिलाओं के प्रति हर प्रकार के बुरे व्यवहार से रोकती है और अंत में पारिवारिक व्यवस्था की सुरक्षा के लिए एक मूल नियम का उल्लेख करती है।पत्नी के चयन में एक ग़लत और अनुचित भावना उसकी धन सम्पत्ति को दृष्टिगत रखना है। अर्थात पुरुष किसी महिला को पसंद न करने के बावजूद केवल उसके माल का स्वामी बनने के लिए उससे विवाह करे। यह आयत इस कार्य से रोकती हुए कहती है तुम लोगों के लिए, जो ईमान का दावा करते हो, यह कार्य वैध नहीं है। इसी प्रकार कुछ जातियों में यह बुरी बात प्रचलित है कि पुरुष पत्नी को दिये गये मेहर का कुछ भाग वापस लेने के लिए उस पर दबाव डालता है। विशेष कर ऐसी स्थिति में जब मेहर काफ़ी अधिक हो। क़ुरआन इस ग़लत व्यवहार से रोकते हुए पत्नियों के धन और उनके अधिकारों के सम्मान को आवश्यक बताता है और केवल पत्नी द्वारा खुल्लम खुल्ला ग़लत काम करने पर ही उसके साथ कड़ाई को वैध समझता है ताकि वह अपना मेहर माफ़ करके तलाक़ ले ले और यह वास्तव में ग़लत काम करने वाली पत्नियों के लिए एक प्रकार का दंड है। इसके पश्चात ईश्वर एक मूल सिद्धांत का उल्लेख करके पुरुषों को अपनी पत्नियों के साथ भला व्यवहार करने की सिफ़ारिश करते हुए कहता है यदि किसी कारण तुम अपनी पत्नी को पसंद नहीं करते और वह तुम्हें अच्छी नहीं लगती तो तत्काल ही अलग होने और तलाक़ देने का निर्णय न लो और उसके साथ बुरा व्यवहार न करो क्योंकि बहुत सी बातें मनुष्य को विदित रूप से अच्छी नहीं लगतीं परंतु ईश्वर ने उनमें बहुत भलाई और हित रखे हैं।इस आयत से हमने सीखा कि पत्नी के चयन में उसके धन या संपत्ति को मापदंड नहीं बनाना चाहिये बल्कि विवाह में मूल आधार प्रेम होता है न कि धन दौलत। महिलाएं अपने मेहर और धन दौलत की मालिक होती हैं पुरुषों को उन्हें अपने अधिकार में लेने का कोई हक़ नहीं है। परिवार की व्यवस्था की रक्षा का दायित्व पुरुष पर है और उसे संदेह तथा कड़ाई को दुर्व्यवहार और अंतत: तलाक़ का कारण नहीं बनने देना चाहिये। आइये अब सूरए निसा की आयत नम्बर 20 और 21 की तिलावत सुनें।وَإِنْ أَرَدْتُمُ اسْتِبْدَالَ زَوْجٍ مَكَانَ زَوْجٍ وَآَتَيْتُمْ إِحْدَاهُنَّ قِنْطَارًا فَلَا تَأْخُذُوا مِنْهُ شَيْئًا أَتَأْخُذُونَهُ بُهْتَانًا وَإِثْمًا مُبِينًا (20) وَكَيْفَ تَأْخُذُونَهُ وَقَدْ أَفْضَى بَعْضُكُمْ إِلَى بَعْضٍ وَأَخَذْنَ مِنْكُمْ مِيثَاقًا غَلِيظًا (21)और यदि तुमने एक पत्नी के स्थान पर दूसरी पत्नी को लाने का संकल्प किया और तुम पहली पत्नी को मेहर के रूप में बहुत माल दे चुके हो तो उसमें से कुछ वापस न लो। क्या तुम आरोप लगाकर मेहर वापस लोगे? और यह बहुत बुरा व स्पष्ट पाप है। (4:20) और तुम किस प्रकार मेहर वापस लोगे जबकि तुम दोनों में से हर एक अपना अधिकार प्राप्त कर चुका है और इसके अतिरिक्त तुम्हारी पत्नियों ने विवाह के समय तुमसे ठोस प्रतिज्ञा ली थी। (4:21)इस्लाम से पूर्व के अरब जगत में एक अत्यंत बुरी प्रथा यह थी कि जब कोई पुरुष दूसरा विवाह करना चाहता था तो अपनी पहली पत्नी पर आरोप लगाता था ताकि वह आत्मिक दबाव का शिकार हो जाये और अपना मेहर माफ़ कर दे तथा पति से तलाक़ ले ले। उसके पश्चात पति उसी वापस लिए हुए मेहर से दूसरा विवाह कर लेता था। यह आयत इस बुरी परंपरा को रद्द करते हुए विवाह के समय की जाने वाली प्रतिज्ञा की ओर संकेत करती है और कहती है तुमने एक दूसरे के साथ रहने का समझौता किया है और पुरुषों ने उसमें अपनी पत्नियों को मेहर देने का वादा किया है और इसी आधार पर तुमने वर्षों तक एक दूसरे की इच्छाओं का पालन किया है तो अब तुम किस प्रकार किसी अन्य से अपनी इच्छा की पूर्ति कराने के लिए अपनी पिछली प्रतिज्ञा का उल्लंघन कर रहे हो यहां तक कि इसके लिए तुम अपनी पत्नी के चरित्र पर उंगली उठाने के लिए भी तैयार हो।इन आयतों से हमने सीखा कि इस्लाम महिला के अधिकारों का समर्थन करता है और पहली पत्नी के अधिकारों के हनन के मूल्य पर पुरुष के दूसरे विवाह को स्वीकार नहीं करता। मेहर वापस लेना वैध नहीं है विशेषकर यदि पुरुष, पत्नी को अपमानित करके इस उद्देश्य की पूर्ति करना चाहे तो ऐसी स्थिति में उसका पाप दोहरा होगा।विवाह का बंधन एक मज़बूत बंधन है जिसके आधार पर ईश्वर ने पति-पत्नी को एक दूसरे के लिए वैध कर दिया है। अत: इस बंधन की रक्षा दोनों पक्षों के लिए आवश्यक है। आइये अब सूरए निसा की 22वीं और 23वीं आयतों की तिलावत सुनें।وَلَا تَنْكِحُوا مَا نَكَحَ آَبَاؤُكُمْ مِنَ النِّسَاءِ إِلَّا مَا قَدْ سَلَفَ إِنَّهُ كَانَ فَاحِشَةً وَمَقْتًا وَسَاءَ سَبِيلًا (22) حُرِّمَتْ عَلَيْكُمْ أُمَّهَاتُكُمْ وَبَنَاتُكُمْ وَأَخَوَاتُكُمْ وَعَمَّاتُكُمْ وَخَالَاتُكُمْ وَبَنَاتُ الْأَخِ وَبَنَاتُ الْأُخْتِ وَأُمَّهَاتُكُمُ اللَّاتِي أَرْضَعْنَكُمْ وَأَخَوَاتُكُمْ مِنَ الرَّضَاعَةِ وَأُمَّهَاتُ نِسَائِكُمْ وَرَبَائِبُكُمُ اللَّاتِي فِي حُجُورِكُمْ مِنْ نِسَائِكُمُ اللَّاتِي دَخَلْتُمْ بِهِنَّ فَإِنْ لَمْ تَكُونُوا دَخَلْتُمْ بِهِنَّ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ وَحَلَائِلُ أَبْنَائِكُمُ الَّذِينَ مِنْ أَصْلَابِكُمْ وَأَنْ تَجْمَعُوا بَيْنَ الْأُخْتَيْنِ إِلَّا مَا قَدْ سَلَفَ إِنَّ اللَّهَ كَانَ غَفُورًا رَحِيمًا (23)और उन महिलाओं से विवाह न करो जिनसे तुम्हारे बाप दादा विवाह कर चुके हों सिवाय उसके कि जो इस आदेश से पहले हो चुका हो। नि:संदेह यह अत्यंत बुरा कर्म, घृणित और बहुत ही बुरी पद्धति है। (4:22) तुम्हारे ऊपर विवाह करना हराम किया गया है अपनी माताओं से, बेटियों से, बहनों से, फूफियों से, मौसियों से, भाई की बेटियों से, बहन की बेटियों से, उन माओं से, जिन्होंने तुम्हें दूध पिलाया हो, दूध पिलाने वाली मां की बेटियों से, अपनी पत्नियों की माताओं से, अपनी पत्नी की, पिछले पति की बेटियों से, जो तुम्हारी गोदियों में पली हों इस शर्त के साथ कि तुमने उनकी माताओं से संबंध स्थापित किया हो और यदि संबंध स्थापित न किया हो तो कोई रुकावट नहीं है और इसी प्रकार विवाह करना वैध नहीं है तुम्हारे उन बेटों की पत्नियों से जो तुम्हारे वंश से हों और एक ही समय में दो सगी बहनों से सिवाय इसके कि जो इस आदेश से पहले हो चुका हो। नि:संदेह ईश्वर अत्यंत क्षमाशील और दयावान है। (4:23)इन दो आयतों में महरम अर्थात उन महिलाओं का विस्तार से वर्णन किया गया है जिनके साथ विवाह करना अवैध है। इन आयतों में इसे मानव प्रवृत्ति के विरुद्ध बताया गया है। मूल रूप से तीन बातें महिलाओं के इस गुट से विवाह के अवैध होने का कारण हैं। पहली बात वंशीय रिश्ता जो मां, बहन, बेटी, फूफी, मौसी, भांजी और भतीजी के साथ विवाह के हराम होने का कारण बनता है। दूसरा विवाह के कारण बनने वाला रिश्ता कि किसी महिला से किसी पुरुष के विवाह के पश्चात उस महिला की मां, बहन और बेटी उस व्यक्ति पर हराम हो जाती हैं और तीसरा दूध पिलाने का रिश्ता कि यदि कोई महिला किसी शीशु को निर्धारित अवधि तक अपना दूध पिलाये तो उस महिला और उसका दूध पीने वाली सभी लड़कियों से उस बच्चे का विवाह नहीं हो सकता। इन आयतों से हमने सीखा कि परिवार के सम्मान की रक्षा के लिए उन महिलाओं से विवाह करना वैध नहीं है जो मनुष्य की महरम हों ताकि उनके साथ व्यवहार में उसकी दृष्टि ग़लत न होने पाये।हर बात में हलाल व हराम अर्थात वैध या अवैध का निर्धारण केवल ईश्वर के हाथ में है चाहे वह खाने पीने का मामला हो या विवाह जैसे अन्य मामले हों क्योंकि ईश्वर मनुष्य का रचयिता है और उसकी आवश्यकताओं से भलि-भांति अवगत है।