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    सूरए निसा; आयतें 26-31 (कार्यक्रम 125)

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    आइये पहले सूरए निसा की 26वीं, 27वी और 28वीं आयतों की तिलावत सुनें।يُرِيدُ اللَّهُ لِيُبَيِّنَ لَكُمْ وَيَهْدِيَكُمْ سُنَنَ الَّذِينَ مِنْ قَبْلِكُمْ وَيَتُوبَ عَلَيْكُمْ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ (26) وَاللَّهُ يُرِيدُ أَنْ يَتُوبَ عَلَيْكُمْ وَيُرِيدُ الَّذِينَ يَتَّبِعُونَ الشَّهَوَاتِ أَنْ تَمِيلُوا مَيْلًا عَظِيمًا (27) يُرِيدُ اللَّهُ أَنْ يُخَفِّفَ عَنْكُمْ وَخُلِقَ الْإِنْسَانُ ضَعِيفًا (28)ईश्वर चाहता है कि इन आदेशों द्वारा कल्याण का मार्ग तुम्हारे लिए स्पष्ट कर दे और अतीत के भले लोगों की परम्पराओं की ओर तुम्हारा मार्गदर्शन करे और तुम्हारे पापों को क्षमा करके अपनी दया तुम तक पलटा दे और ईश्वर जानने वाला तथा तत्वदर्शी है। (4:26) और ईश्वर तुम्हारे पापों को क्षमा करना चाहता है परंतु जो लोग अपनी आंतरिक इच्छाओं का अनुसरण करते हैं वे तुम्हें बड़ी पथभ्रष्टता की ओर खींचना चाहते हैं। (4:27) ईश्वर चाहता है कि तुम्हारे कर्तव्यों का भार हल्का कर दे (क्योंकि) मनुष्य को कमज़ोर बनाया गया है। (4:28)पिछली आयतों में विवाह की ओर प्रोत्साहित करने और उसके आदेशों व शर्तों के वर्णन के पश्चात ईश्वर इन आयतों में कहता है कि ये सारे आदेश तुम्हारे ही हित में हैं। तुम्हें कल्याण तक पहुंचाने और बुराइयों से दूर रखने के लिए ही ईश्वर ने तुम्हारे लिए ये आदेश दिये हैं क्योंकि ईश्वर की परम्परा लोंगों के सुधार व मार्गदर्शन पर आधारित रही है और इसी कारण उसने लोगों के लिए पैग़म्बर व आसमानी किताबें भेजी हैं परंतु कुछ लोग, जो स्वयं पथभ्रष्ठ हैं, अन्य लोगों को भी बिगाड़ना चाहते हैं और आंतरिक इच्छाओं तथा वासना की बातें करके अन्य लोगों को भी तुच्छ आंतरिक इच्छाओं के अधीन बनाना चाहते हैं। २८वीं आयत कहती है कि ईश्वरीय आदेश कड़े और कठिन नहीं हैं बल्कि ईश्वर ने इस प्रकार की इच्छाओं के समक्ष आम लोगों के कमज़ोर इरादों के दृष्टिगत सरलता प्रदान की है और विभिन्न प्रकार के विवाह प्रस्तुत करके मनुष्य की इच्छाओं के समक्ष वैध व नियंत्रित मार्ग रखे हैं ताकि वह पाप से दूषित न हो और समाज में भी बुराई न फैलाए। इन आयतों से हमने सीखा कि धार्मिक आदेश, मनुष्य पर ईश्वर की कृपा हैं क्योंकि वे जीवन के सही मार्ग के चयन में मनुष्य का मार्गदर्शन करते हैं।मनुष्य की अन्य आवश्यकताओं की भांति ही उसकी शारीरिक आवश्यकताएं भी स्वाभाविक व प्राकृतिक हैं परन्तु अश्लीलता और अवैध संबंध पारिवारिक व्यवस्था और अंतत: समाज की तबाही का कारण बनते हैं।इस्लाम एक सरल धर्म है और इसमें कोई बंद गली नहीं है। धर्म का आधार ऐसे आदेशों पर है जिनका पालन मनुष्य की क्षमता से बाहर नहीं है। आइये अब सूरए निसा की 29वीं और 30वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا لَا تَأْكُلُوا أَمْوَالَكُمْ بَيْنَكُمْ بِالْبَاطِلِ إِلَّا أَنْ تَكُونَ تِجَارَةً عَنْ تَرَاضٍ مِنْكُمْ وَلَا تَقْتُلُوا أَنْفُسَكُمْ إِنَّ اللَّهَ كَانَ بِكُمْ رَحِيمًا (29) وَمَنْ يَفْعَلْ ذَلِكَ عُدْوَانًا وَظُلْمًا فَسَوْفَ نُصْلِيهِ نَارًا وَكَانَ ذَلِكَ عَلَى اللَّهِ يَسِيرًا (30)हे ईमान वालो! आपस में एक दूसरे का माल ग़लत ढंग से न खाओ सिवाये इसके कि वह तुम्हारी इच्छा से होने वाला व्यापार और लेन-देन हो और एक दूसरे की हत्या न करो। नि:संदेह ईश्वर तुम्हारे लिए दयावान है। (4:29) और जो कोई भी अतिक्रमण और अत्याचार के आधार पर ऐसा करे तो हम शीघ्र ही उसे नरक में डाल देंगे और यह ईश्वर के लिए बहुत ही सरल बात है। (4: 30)पिछली आयतों में, जो हर प्रकार व्याभिचारिक अतिक्रमण से स्वयं व्यक्ति व अन्य लोगों की इज़्ज़त की रक्षा के बारे में थीं, मनुष्य को अन्य लोगों की पवित्रता को दाग़दार करने से रोकने के पश्चात इन आयतों में ईश्वर ईमान वालों को लोंगो की जान व माल के प्रति अतिक्रमण से भी रोकता है और कहता है दूसरों की जान और माल को भी अपनी जान व माल की भांति समझो तथा दूसरों पर अत्याचार न करो। दूसरों के माल पर किसी भी प्रकार का नियंत्रण ग़लत व अवैध है सिवाए यह कि वह किसी प्रकार का वैध लेन-देन हो और उसके मालिक ने अपनी इच्छा से वह मामला किया हो। इसी प्रकार लोगों की जान पर अतिक्रमण करना भी अत्याचारी व अतिक्रमणकारी प्रवृत्ति का परिचायक है और इसी कारण इसका दंड भी बहुत कड़ा होता है। यह दंड प्रलय में नरक की दहकती हुई आग के रूप में प्रकट होगा और अत्याचारी के पूरे अस्तित्व को अपनी लपेट में ले लेगा।इन आयतों से हमने सीखा कि इस्लाम में व्यक्तिगत स्वामित्व सम्मानीय है और हर प्रकार के लेन-देन में मालिक का राज़ी होना आवश्यक है।ग़लत आर्थिक व्यवस्था समाज में असमानताएं उत्पन्न होने का कारण बनती है और हत्या व अन्य विवादों की भूमि प्रशस्त करती है।मनुष्य की जान अत्यंत सम्मानीय है, आत्म हत्या का करना वर्जित है और दूसरों की हत्या करना भी।ईश्वर अपने बंदों पर कृपाशील है पंरतु अतिक्रमणकारियों के प्रति कड़ाई बरतता है क्योंकि उसकी दृष्टि में लोगों के अधिकार सम्मानीय हैं।आइये अब सूरए निसा की 31वीं आयत की तिलावत सुनें।إِنْ تَجْتَنِبُوا كَبَائِرَ مَا تُنْهَوْنَ عَنْهُ نُكَفِّرْ عَنْكُمْ سَيِّئَاتِكُمْ وَنُدْخِلْكُمْ مُدْخَلًا كَرِيمًا (31)हे ईमान वालो! यदि तुम वर्जित किये गये बड़े पापों से बचोगे तो हम तुम्हारे छोटे पापों को छिपा देंगे और तुम्हें एक अच्छे स्थान में प्रविष्ट कर देंगे। (4: 31)इस आयत से पता चलता है कि ईश्वर की दृष्टि में पाप दो प्रकार के होते हैं, छोटे और बड़े। अलबत्ता स्पष्ट है कि हर पाप चाहे वह छोटा हो या बड़ा चूंकि ईश्वरीय आदेश के विरुद्ध होता है अत: अत्यंत बुरा व घृणित होता है परंतु हर पाप के परिणामों के दृष्टिगत उसे छोटे या बड़े पाप की श्रेणी में रखा जा सकता है।जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम व उनके पवित्र परिजनों के कथनों में इस प्रकार के पापों का विस्तार से वर्णन किया गया है या उनके छोटे अथवा बड़े होने के मानदण्ड का उल्लेख किया गया है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि पाप की सीमा जितनी अधिक होगी और जितना अधिक वह व्यक्ति परिवार व समाज को क्षति पहुंचाएगा वह उतना ही बड़ा और घृणित पाप होगा।इस आधार पर संभव है कि किसी व्यक्ति द्वारा किया गया पाप छोटा हो परंतु वही पाप यदि कोई दूसरा व्यक्ति करे तो बड़ा समझा जाये। उदाहरण स्वरूप यदि कोई साधारण व्यक्ति एक पाप करे तो वह छोटा माना जायेगा परंतु वही पाप समाज का यदि कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति करे तो वह बड़ा पाप कहलाएगा क्योंकि अनेक लोग उस व्यक्ति का अनुसरण करते हैं। बहरहाल इस आयत में ईश्वर दया व कृपा के अंतर्गत कहता है कि यदि तुम मनुष्य बड़े पापों से दूर रहोगे तो मैं तुम्हारे छोटे पापों की अनदेखी करते हुए तुम्हें क्षमा कर दूंगा और तुम्हें स्वर्ग में ले जाऊंगा। इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर हमारे छोटे पापों को क्षमा कर देता है। अत: हमें भी दूसरों की छोटी ग़लतियों को क्षमा कर देना चाहिये। यदि मनुष्य के वैचारिक व व्यवहारिक सिद्धांत ठीक हों तो ईश्वर छोटे पापों को हमारी तौबा के बिना भी क्षमा कर देता है।