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    सूरए निसा; आयतें 32-33 (कार्यक्रम 126)

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    आइये पहले सूरए निसा की 32वीं आयत की तिलावत सुनें।وَلَا تَتَمَنَّوْا مَا فَضَّلَ اللَّهُ بِهِ بَعْضَكُمْ عَلَى بَعْضٍ لِلرِّجَالِ نَصِيبٌ مِمَّا اكْتَسَبُوا وَلِلنِّسَاءِ نَصِيبٌ مِمَّا اكْتَسَبْنَ وَاسْأَلُوا اللَّهَ مِنْ فَضْلِهِ إِنَّ اللَّهَ كَانَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمًا (32)और ईश्वर ने तुम में से कुछ को कुछ दूसरों पर जिन बातों से वरीयता दी है, उनकी कामना मत करो। पुरुषों ने जो कुछ प्राप्त किया है उसमें उनका भाग है और महिलाओं ने जो कुछ प्राप्त किया है उसमें उनका भाग है। हे ईमान वालो! ईर्ष्या और अनुचित कामनाओं के स्थान पर ईश्वर से उसकी कृपा चाहो नि:संदेह वह हर बात का जानने वाला है। (4:32)ईश्वर द्वारा सृष्टि की व्यवस्था, अंतर और भिन्नता पर आधारित है। ईश्वर ने सृष्टि और संसार की व्यवस्था चलाने के लिए विभिन्न प्रकार के जीवों इत्यादि की रचना की है। कुछ की जड़ वस्तुओं के रूप में, कुछ की वनस्पति के रूप में, कुछ की जीवों की रूप में और कुछ की मनुष्य के रूप में रचना की है। मनुष्य के बीच भी उसने स्त्री व पुरुष जैसे दो गुट बनाये हैं पुरुषों और महिलाओं के बीच भी शायद दो मनुष्य ऐसे न मिलें जो हर प्रकार से समान हों बल्कि उनके शरीर या आत्मा में अवश्य ही कोई न कोई भिन्नता होगी। स्पष्ट है कि मनुष्यों के बीच यह अंतर और भिन्नता तत्वदर्शिता के आधार पर और मानव समाज की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए है। जैसाकि एक गाड़ी को चलाने के लिए लचकदार टायर भी आवश्यक है और इंजन के लिए मज़बूत फौलाद भी, इसी प्रकार चालक को आगे देखने के लिए पारदर्शी कांच भी आवश्यक है और रात में देखने के लिए हेड लाइट भी। तो एक गाड़ी के निर्माण में हज़ारों कल पुर्ज़ों का प्रयोग किया जाता है जो बनावट और प्रयोग की दृष्टि से समान नहीं होते परंतु जब उन्हें एक साथ जोड़ दिया जाये तो वे एक ऐसा साधन बन जाते हैं जो एक चाबी लगाते ही स्टार्ट हो जाता है।इस महान सृष्टि को भी अरबों विभिन्न वस्तुओं और जीवों की आवश्यकता है जिनमें से प्रत्येक पर कुछ न कुछ दायित्व है और वह सृष्टि का काम सही ढंग से चलने का कारण बनता है। मनुष्य की सामाजिक व्यवस्था में भी विभिन्न क्षमताओं व योग्यताओं वाले लोगों की आवश्यकता होती है ताकि सभी लोगों की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। यह अंतर और भिन्नता भेदभाव के अर्थ में नहीं है क्योंकि प्रथम तो यह कि किसी भी जीव का कोई दायित्व ईश्वर पर नहीं है और दूसरे यह कि यह अंतर तत्वदर्शिता के आधार पर है न कि अत्याचार, कंजूसी या ईर्ष्या के आधार पर। हां यदि ईश्वर सभी मनुष्यों से एक ही प्रकार के कर्तव्य पालन की मांग करता तो अत्याचार होता। क्योंकि उसने सबको एक प्रकार की संभावनाएं नहीं दी हैं परंतु क़ुरआन की कुछ आयतों और पैग़म्बर व उनके पवित्र परिजनों के कथनों से पता चलता है कि ईश्वर ने हर एक से उसकी क्षमता के अनुसार ही कर्तव्य पालन की मांग की है जैसा कि सूरए तलाक़ की ७वीं आयत में कहा गया है। ईश्वर किसी पर भी कर्तव्य पालन अनिवार्य नहीं करता सिवाय उस क्षमता के अनुसार जो उसने उसे दी है।अलबत्ता मनुष्य व अन्य जीवों के बीच एक मूल अंतर है और वह यह कि केवल मनुष्य ही वैचारिक शक्ति, चयन और संकल्प का अधिकार रखने के कारण अपनी प्रगति व उत्थान या पतन व बर्बादी का मार्ग स्वयं प्रशस्त कर सकता है। दूसरे शब्दों में ईश्वर ने जो कुछ मनुष्य को दिया है वह दो प्रकार का है। एक वह मामले जिनमें मनुष्य की कोई भूमिका नहीं है जैसे शारीरिक विशेषताएं इत्यादि और दूसरे वह बातें जो मनुष्य के अधिकार में और प्राप्त करने योग्य हैं जैसे ज्ञान, शक्ति और धन आदि।स्वाभाविक है कि इस दूसरे क्षेत्र में अपनी क्षमता व योग्यता के अनुसार प्रयास व मेहनत करके अपनी शक्ति की भूमि प्रशस्त करनी चाहिये तथा इस मामले में हर प्रकार की सुस्ती व आलस्य स्वयं मनुष्य से संबंधित है न कि ईश्वर से। इसी कारण इस आयत के आरंभ में ईश्वरीय और प्राप्त न किये जाने वाले गुणों तथा विभूतियों की ओर संकेत करते हुए ईश्वर कहता है। उन बातों में, जिन्हें हमने कुछ को दिया है और कुछ को नहीं दिया है, एक दूसरे से ईर्ष्या न करो और अनुचित कामनायें भी मत करो। इसी प्रकार प्राप्त न करने योग्य क्षेत्र में भी। जो स्त्री और पुरुष जितना प्रयास और परिश्रम करेगा उसे उतना ही लाभ होगा। तुम लोग भी प्रयास करो और ईश्वर से प्राथना करो कि वह अपनी कृपा से तुम्हारे प्रयासों को सफल बना दे।इस आयत से हमने सीखा कि दूसरों की विभूतियों और योग्यताओं को देखने के स्थान पर,जिससे हमारे भीतर ईर्ष्या की भावना उत्पन्न होती है, हमें अपनी संभावनाओं और योग्यताओं को देखना तथा उनसे लाभ उठाना चाहिये।अपने भीतर से अनुचित इच्छाओं और कामनाओं की भावनाओं को समाप्त करना चाहिये क्योंकि यह अनेक शिष्टाचारिक बुराइयों की जड़ है। यद्यपि हम परिश्रम व प्रयास करते हैं परंतु हमें कदापि यह नहीं सोचना चाहिये कि हमारी रोज़ी में ईश्वर की कोई भूमिका नहीं है। हमें कार्य व प्रयास भी करना चाहिये और ईश्वर से रोज़ी भी मांगनी चाहिये। जिस प्रकार पुरुष अपने कमाये हुए धन का स्वामी होता है उसी प्रकार महिलाएं भी मीरास, मेहर या व्यापार आदि से मिलने वाली राशि की स्वामी होती हैं। आइये अब सूरए निसा की 33वीं आयत की तिलावत सुनें।وَلِكُلٍّ جَعَلْنَا مَوَالِيَ مِمَّا تَرَكَ الْوَالِدَانِ وَالْأَقْرَبُونَ وَالَّذِينَ عَقَدَتْ أَيْمَانُكُمْ فَآَتُوهُمْ نَصِيبَهُمْ إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدًا (33)और जो कुछ माता-पिता और निकट परिजन छोड़ जाते हैं हमने उसमें वारिस बनाये हैं और जिन लोगों को तुम वचन दे चुके हो, मीरास में से उन्हें उनका भाग भी दे दो। नि:संदेह ईश्वर हर बात को देखने वाला है। (4:33)पिछली आयत में इस बात का उल्लेख करने के पश्चात कि स्त्री और जो कुछ परिश्रम द्वारा प्राप्त करें, वे उसके स्वामी होते हैं। इस आयत में ईश्वर कहता है इसी प्रकार स्त्री और पुरुष अपने माता-पिता तथा निकट परिजनों द्वारा छोड़े गये माल के भी मालिक होते हैं। आगे चलकर आयत में कहा गया है कि कमाई और मीरास के अतिरिक्त अन्य लोगों से वैध मामलों और समझौतों द्वारा मनुष्य को जो माल प्राप्त होता है वह उसका भी स्वामी होता है।इतिहास में वर्णित है कि इस्लाम से पूर्व अरबों में एक प्रकार का समझौता प्रचलित था जिसके अंतर्गत दो व्यक्ति एक दूसरे के साथ समझौता कर लेते थे कि जीवन में सदैव एक दूसरे की सहायता करेंगे और जब भी किसी एक को कोई क्षति होगी तो दूसरा उसकी क्षति पूर्ति करेगा। इसी प्रकार मरने के पश्चात वे एक दूसरे के वारिस होंगे। इस्लाम ने इस समझौते को, जो आजकल की बीमा योजनाओं की भांति है, स्वीकार कर लिया परंतु एक दूसरे के वारिस बनने की शर्त, मृतक का कोई अन्य वारिस न होना बताया।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम में मीरास का क़ानून, ईश्वरीय क़ानून है कोई भी इसमें पूर्ण या आरंभिक रूप से परिवर्तन नहीं कर सकता। समझौते या वचन का पालन अत्यंत आवश्यक है विशेषकर वे समझौते जिनका आर्थिक पहलू होता है और उसके उल्लंघन से दूसरों को क्षति होती है। हर किसी का समझौता या वचन सम्मानीय होता है यहां तक कि उसकी मृत्यु के पश्चात भी, मरने से वचन या समझौता नहीं टूटता।