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    सूरए निसा; आयतें 4-6 (कार्यक्रम 119)

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    आइये पहले सूरए निसा की आयत नम्बर 4 की तिलावत सुनें।وَآَتُوا النِّسَاءَ صَدُقَاتِهِنَّ نِحْلَةً فَإِنْ طِبْنَ لَكُمْ عَنْ شَيْءٍ مِنْهُ نَفْسًا فَكُلُوهُ هَنِيئًا مَرِيئًا (4)और महिलाओं का मेहर उन्हें उपहार स्वरूप और इच्छा से दो यदि उन्होंने अपनी इच्छा से उसमें से कोई चीज़ तुम्हें दे दी तो उसे तुम आनंद से खा सकते हो। (4:4)जैसा कि हमने पिछले कार्यक्रम में कहा कि सूरए निसा पारिवारिक आदेशों और विषयों से आरंभ होता है। सभी जातियों व राष्ट्रों के बीच परिवार के गठन के महत्वपूर्ण विषयों में एक पति द्वारा अपनी पत्नी को मेहर के रूप में उपहार दिया जाना है परंतु कुछ जातियों व समुदायों विशेषकर पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम के काल के अरबों के बीच, जहां व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में महिलाओं का कोई विशेष स्थान नहीं था, अनेक अवसरों पर पुरुष या तो मेहर देते ही नहीं थे या फिर मेहर देने के पश्चात उसे ज़बरदस्ती वापस ले लेते थे। महिला के पारिवारिक अधिकारों की रक्षा में क़ुरआन पुरुषों को आदेश देता है कि वे मेहर अदा करें और वह भी स्वेच्छा तथा प्रेम से न कि अनिच्छा से और मुंह बिगाड़ के। इसके पश्चात वह कहता है कि जो कुछ तुमने अपनी पत्नी को मेहर के रूप में दिया है उसे या उसके कुछ भाग को वापस लेने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं है बल्कि यदि वह अपनी इच्छा से तुम्हें कुछ वापस दे दे तो वह तुम्हारे लिए वैध है। इस आयत में प्रयोग होने वाले एक शब्द नहलह के बारे में एक रोचक बात यह है कि यह शब्द नहल से निकला है जिसका अर्थ मधुमक्खी होता है। जिस प्रकार से मुधमक्खी लोगों को बिना किसी स्वार्थ के मधु देती है और उनके मुंह में मिठास घोल देती है उसी प्रकार मेहर भी एक उपहार है जो पति अपनी पत्नी को देता है ताकि उनके जीवन में मिठास घुल जाये। अत: मेहर की वापसी की आशा नहीं रखनी चाहिये।मेहर पत्नी की क़ीमत और मूल्य नहीं बल्कि पति की ओर से उपहार और पत्नी के प्रति उसकी सच्चाई का प्रतीक है। इसी कारण मेहर को सेदाक़ भी कहते हैं जो सिद्क़ शब्द से निकला है जिसका अर्थ सच्चाई होता है। इस आयत से हमने सीखा कि मेहर पत्नी का अधिकार है और वह उसकी स्वामी होती है। पति को उसे मेहर देना ही पड़ता है और उससे वापस भी नहीं लिया जा सकता।किसी को कुछ देने में विदित इच्छा पर्याप्त नहीं है बल्कि स्वेच्छा से और मन के साथ देना आवश्यक है। यदि पत्नी विवश होकर या अनमनेपन से अपना मेहर माफ़ कर दे तो उसे लेना ठीक नहीं है चाहे वह विदित रूप से राज़ी ही क्यों न दिखाई दे।आइये अब सूरए निसा की 5वीं आयत की तिलावत सुनें।وَلَا تُؤْتُوا السُّفَهَاءَ أَمْوَالَكُمُ الَّتِي جَعَلَ اللَّهُ لَكُمْ قِيَامًا وَارْزُقُوهُمْ فِيهَا وَاكْسُوهُمْ وَقُولُوا لَهُمْ قَوْلًا مَعْرُوفًا (5)तुम अपने माल और धन सम्पत्ति को, जो तुम्हारे जीवन का आधार है, मूर्खों को मत दो परन्तु उस माल की आय से उन्हें खाना और कपड़ा दो तथा उनसे अच्छी और भली बात करो। (4:5) इस आयत से पहली और बाद वाली आयतों से यह बात स्पष्ट होती है कि इस आयत का तात्पर्य यह है कि अनाथों का माल तब तक उन्हें नहीं देना चाहिये जब तक वे बौद्धिक व आर्थिक रूप से वयस्क न हो जायें। यदि कुछ अनाथ बौद्धिक रूप से व्यस्क न हो सकें और बुद्धिहीन रह जायें तो उनका माल उन्हें नहीं देना चाहिये बल्कि मूल राशि और उसकी आय को सुरक्षित रखते हुए खाने और कपड़े जैसी उनकी मूल आवश्यकताओं की पूर्ति करनी चाहिये।इसके पश्चात एक महत्वपूर्ण शिष्टाचारिक सिफ़ारिश करते हुए ईश्वर कहता है कि बुद्धिहीनों के साथ भी अच्छी बात करो, न बुरी बात करो, न बुरे ढंग से बात करो। यद्यपि तुम उनका माल उन्हें नहीं देते परंतु उनके साथ बात और व्यवहार में उनका सम्मान करो।इस आयत से हमने सीखा कि धन सम्पत्ति समाज की सुदृढ़ता व प्रगति का साधन है परन्तु शर्त यह है कि यह पवित्र, भले व बुद्धिमान लोगों के हाथ में हो।परिवार व समाज के आर्थिक मामलों में व्यक्ति व समाज के हितों को दृष्टिगत रखना चाहिये न कि शीघ्र ही समाप्त हो जाने वाली भावनाओं और कल्पनाओं को।इस्लामी समाज के आर्थिक अधिकारियों को समझदार एवं अनुभवी होना चाहिये।इस्लाम की दृष्टि में सांसारिक धन-दौलत न केवल यह कि बुरी चीज़ नहीं है बल्कि अर्थ व्यवस्था की सुदृढ़ता का कारण भी है अलबत्ता केवल उस स्थिति में जब वह बुद्धिहीनों के हाथ में न हो। आइये अब सूरए निसा की 6ठी आयत की तिलावत सुनें।وَابْتَلُوا الْيَتَامَى حَتَّى إِذَا بَلَغُوا النِّكَاحَ فَإِنْ آَنَسْتُمْ مِنْهُمْ رُشْدًا فَادْفَعُوا إِلَيْهِمْ أَمْوَالَهُمْ وَلَا تَأْكُلُوهَا إِسْرَافًا وَبِدَارًا أَنْ يَكْبَرُوا وَمَنْ كَانَ غَنِيًّا فَلْيَسْتَعْفِفْ وَمَنْ كَانَ فَقِيرًا فَلْيَأْكُلْ بِالْمَعْرُوفِ فَإِذَا دَفَعْتُمْ إِلَيْهِمْ أَمْوَالَهُمْ فَأَشْهِدُوا عَلَيْهِمْ وَكَفَى بِاللَّهِ حَسِيبًا (6)और अनाथों को आज़माओ यहां तक कि वे विवाह के योग्य हो जायें तो यदि तुम उनके व्यवहार में प्रगति व युक्ति देखो तो उनका माल उन्हें लौटा दो और उसे इस भय से कि कहीं अनाथ बड़े न हो जायें जल्दी जल्दी अपव्यय के साथ ख़र्च मत करो और जो कोई भी आवश्यकतामुक्त है वह अनाथों की अभिभावकता का ख़र्चा न ले और जिसे आवश्यकता है वह प्रचलित और सामान्य मात्रा में ले सकता है। तो जब तुम उनका माल उन्हें लौटाओ तो उन पर गवाह बनाओ और जान लो कि हिसाब के लिए ईश्वर काफी है। (4:6)इस आयत ने, जिसमें अनाथों के माल की रक्षा और उसे उन्हें लौटाने की पद्धति का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है, समाज के निर्धन व कमज़ोर लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए कुछ क़ानून बनाये हैं। उदाहरण स्वरूप अनाथों को उनका माल लौटाने की शर्त उनका आर्थिक व वैचारिक दृष्टि से वयस्क होना है जो परीक्षण से सिद्ध हो चुका हो। दूसरी बात यह है कि उनका माल उन्हें देने तक सुरक्षित रखना चाहिये न यह कि उनके वयस्क होने से पूर्व उसे ख़र्च कर देना चाहिये। एक अन्य बात यह कि अनाथ के अभिभावक को उसकी सम्पत्ति से अपना ख़र्च चलाने का अधिकार नहीं है सिवाये इसके कि वह स्वयं दरिद्र हो कि ऐसी दशा में वह अपनी मेहनत के अनुरूप ख़र्च कर सकता है और इसी प्रकार अनाथ का माल उसे देते समय गवाह भी आवश्यक है ताकि भविष्य में संभावित मतभेदों से बचा जा सके।इस आयत से हमने सीखा कि अपने माल को ख़र्च करने के लिए शारीरिक वयस्कता के साथ ही वैचारिक व बौद्धिक विकास भी आवश्यक है। अत: बच्चों और नवयुवकों को अपना माल ख़र्च करने से पहले आर्थिक रूप से भी वयस्क होना चाहिये।आर्थिक मामलों में ठोस काम करना चाहिये। ईश्वर को भी दृष्टिगत रखना चाहिये और समाज में अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए गवाह भी रखना चाहिये।सम्पन्न लोगों को किसी अपेक्षा व लोभ के बिना समाज की सेवा करनी चाहिये तथा समाज के वंचित लोगों से कमाने के चक्कर में नहीं रहना चाहिये।