islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए निसा; आयतें 40-43 (कार्यक्रम 129)

    सूरए निसा; आयतें 40-43 (कार्यक्रम 129)

    Rate this post

    आइये सूरए निसा की 40वीं आयत की तिलावत सुनें।إِنَّ اللَّهَ لَا يَظْلِمُ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ وَإِنْ تَكُ حَسَنَةً يُضَاعِفْهَا وَيُؤْتِ مِنْ لَدُنْهُ أَجْرًا عَظِيمًا (40)निसंदेह ईश्वर कण बराबर भी अत्याचार नहीं करता और यदि अच्छा कर्म हो तो उसका बदला दो गुना कर देता है और अपनी ओर से भी बड़ा बदला देता है। (4:40)पिछली आयतों में हमने पढ़ा कि जो कोई भी वंचितों की सहायता करने में कंजूसी करेगा और ईश्वरीय अनुकम्पाओं की अकृतज्ञता करेगा तो उसे कड़ा दंड भुगतना पड़ेगा। यह आयत कहती है कि ईश्वरीय दंड लोगों पर ईश्वर का अत्याचार नहीं है बल्कि उन्हीं के कर्मों का परिणाम है। क्योंकि अत्याचार का आधार या अज्ञानता है या मनोवैज्ञानिक समस्याएं या फिर लोभ और सत्तालोलुपता जबकि ईश्वर इस प्रकार के सभी अवगुणों से पवित्र है और अपनी रचनाओं और कृतियों पर उसके अत्याचार का कोई तर्क नहीं है। यह स्वयं मनुष्य ही है जो अपने बुरे कर्मों द्वारा अपने आप पर अत्याचार करता है। आगे चलकर आयत कहती है ईश्वर ने तुम्हें अच्छे कर्मों और लोगों के साथ भलाई का आदेश दिया है जो कोई भी इसे स्वीकार करेगा उसे लोक-परलोक में ईश्वर भला बदला देगा और वह भी कई गुना अधिक कि जो मनुष्य को ईश्वर की विशेष कृपा की छाया में ले आयेगा। जैसाकि दूसरी आयतों में नि: स्वार्थता के साथ की गई आर्थिक सहायता या दान का बदला सात सौ गुना अधिक तक बताया गया है।इस आयत से हमने सीखा कि सांसारिक मुसीबतों और आपदाओं को ईश्वर का अत्याचार नहीं अपुति अपनी कंजूसी और कुफ़्र का फल समझना चाहिये। हम जो बोएंगे वही काटेंगे। बुरे कर्मों का दंड उन्हीं के समान है और ईश्वर उसमें कण भर भी वृद्धि नहीं करेगा पंरतु भले कर्मों का बदला मूल कार्य से बहुत अधिक है और ईश्वर उसमें कई गुना अधिक की वृद्धि कर देता है।आइये अब सूरए निसा की 41वीं और 42वीं आयतों की तिलावत सुनें।فَكَيْفَ إِذَا جِئْنَا مِنْ كُلِّ أُمَّةٍ بِشَهِيدٍ وَجِئْنَا بِكَ عَلَى هَؤُلَاءِ شَهِيدًا (41) يَوْمَئِذٍ يَوَدُّ الَّذِينَ كَفَرُوا وَعَصَوُا الرَّسُولَ لَوْ تُسَوَّى بِهِمُ الْأَرْضُ وَلَا يَكْتُمُونَ اللَّهَ حَدِيثًا (42)(हे पैग़म्बर!) तो उन लोगों का क्या हाल होगा जिस दिन हम हर समुदाय के लिए उन्हीं में से साक्षी लाएंगे और तुम्हें उन पर साक्षी बनायेंगे। (4:41) उस दिन संसार में कुफ़्र अपनाने वाले और पैग़म्बर की अवज्ञा करने वाले कामना करेंगे कि काश वे मिट्टी में मिल जाते और उनकी कोई निशानी बाक़ी न रहती और उस दिन ईश्वर से कोई बात छिपी नहीं रहेगी। (4:42)इस बात का उत्तम तर्क कि ईश्वर किसी पर अत्याचार नहीं करता, प्रलय के न्यायालय में अनेक गवाहों की उपस्थिति है। मनुष्य के अंगों और फरिश्तों की गवाही के अतिरिक्त हर पैग़म्बर भी अपने समुदाय के कर्मों का गवाह है तथा पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम भी अपने समुदाय के कर्मों के साक्षी हैं। अलबत्ता चूंकि हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ईश्वर के सबसे बड़े पैग़म्बर हैं अत: वे अपने समुदाय के साक्षी होने के साथ-साथ अपने से पहले वाले पैग़म्बरों के भी गवाह हैं और उनकी उपस्थिति सभी कर्मों का मानदण्ड है।प्रलय में पैग़म्बर की इसी गवाही के कारण उनका इंकार और विरोध करने वाले आशा करेंगे कि काश वे पैदा ही न हुए होते और मिट्टी ही रहते या मृत्यु के पश्चात धरती के भीतर ही रहते और उन्हें पुन: उठाया न जाता परंतु इससे क्या लाभ होगा क्योंकि प्रलय आशाओं का स्थान नहीं है। समय और अवसर बीत चुका होगा और जीवन में हमने जो कुछ बोया होगा उसके काटने का समय होगा। इतने सारे गवाहों की उपस्थिति में हमें अपने बुरे कर्मों को छिपाने का कोई मार्ग नहीं मिलेगा। अलबत्ता हमारा कोई भी काम बल्कि कोई भी बात व विचार ईश्वर से छिपा हुआ नहीं है।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय पैग़म्बर लोगों के समक्ष ईश्वर का तर्क और लोगों के कर्मों के गवाह हैं। प्रलय में ईश्वर हर जाति व समुदाय के कर्मों को उसके पैग़म्बर के आदेशों की कसौटी पर परखेगा और फैसला करेगा।ईश्वर को किसी भी गवाह की आवश्यकता नहीं है मनुष्य यदि यह जान ले कि ईश्वर के अतिरिक्त भी कुछ लोग उसे देख रहे हैं और प्रलय में उसके विरुद्ध गवाही देंगे तो यह बात स्वयं उसके नियंत्रण में प्रभावी है।पैग़म्बर के आदेशों का उल्लंघन तथा उनकी परम्पराओं व चरित्र का अनुसरण करना ईश्वर के इंकार के समान है।प्रलय का दिन पछतावे, अफ़सोस और काश कहने का दिन है, काश मैं मिट्टी होता और धरती से न उठाया जाता।आइये अब सूरए निसा की 43वीं आयत की तिलावत सुनें।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا لَا تَقْرَبُوا الصَّلَاةَ وَأَنْتُمْ سُكَارَى حَتَّى تَعْلَمُوا مَا تَقُولُونَ وَلَا جُنُبًا إِلَّا عَابِرِي سَبِيلٍ حَتَّى تَغْتَسِلُوا وَإِنْ كُنْتُمْ مَرْضَى أَوْ عَلَى سَفَرٍ أَوْ جَاءَ أَحَدٌ مِنْكُمْ مِنَ الْغَائِطِ أَوْ لَامَسْتُمُ النِّسَاءَ فَلَمْ تَجِدُوا مَاءً فَتَيَمَّمُوا صَعِيدًا طَيِّبًا فَامْسَحُوا بِوُجُوهِكُمْ وَأَيْدِيكُمْ إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَفُوًّا غَفُورًا (43)हे ईमान वालो! नशे और मस्ती की हालत में नमाज़ के निकट न जाओ यहां तक कि तुम्हें पता रहे कि तुम क्या बोल रहे हो और नापाक व अपवित्र स्थिति में हो तो मस्जिद में न जाओ जब तक कि स्नान न कर लो सिवाए इसके कि गुज़र जाना इच्छित हो और यदि तुम बीमार हो या यात्रा में हो या तुम में से कोई शौच करके आये या तुम स्त्रियों के पास गये हो और तुम्हें पानी न मिला हो ताकि तुम स्नान या वुज़ू कर सको तो पवित्र मिट्टी पर तयम्मुम करो इस प्रकार से कि अपने चेहरे और हाथों को उससे स्पर्श करो। नि:संदेह ईश्वर अत्यंत क्षमाशील व दयावान है। (4:43)इस आयत में, जिसमें नमाज़ के कुछ धार्मिक आदेशों का वर्णन है, आरंभ में नमाज़ की आत्मा व जान अर्थात ईश्वर पर ध्यान की बात कही गई है और फिर स्नान और तयम्मुम के आदेशों का उल्लेख किया गया है। मूल रूप से नमाज़ और अन्य उपासनाओं का लक्ष्य मनुष्य द्वारा सदैव अपने रचयिता की ओर ध्यान रखना और उस पर भरोसा करना है। जो मनुष्य ईश्वर से दिल लगा लेता है वह संसार के सारे बंधनों से मुक्त हो जाता है और यह उसी स्थिति में संभव है जब उपासना ईश्वर की सही पहचान के साथ हो। इसी कारण हर उस बात और वस्तु को छोड़ देना चाहिये जो नमाज़ की स्थिति में मनुष्य का ध्यान बंटाती है। इस आयत में नशे और मस्ती के कारक के रूप में शराब से रोका गया है जबकि दूसरी आयतों में निंदासी अवस्था में या सुस्ती के साथ नमाज़ पढ़ने से रोका गया है। प्रत्येक दशा में नमाज़ पढ़ते समय मनुष्य को यह ज्ञात होना चाहिये कि वह किसके समक्ष खड़ा है, क्या बोल रहा है और क्या मांग रहा है परंतु नमाज़ में मनुष्य की आत्मा के पूर्णरूप से ईश्वर पर ध्यान दिये जाने के अतिरिक्त मनुष्य का शरीर भी हर प्रकार की गंदगी से पवित्र होना चाहिये। इसी कारण जो भी व्यक्ति संभोग के कारण एक प्रकार की गंदगी में ग्रस्त हो जाता है उसे न केवल नमाज़ के निकट जाने का अधिकार नहीं है बल्कि वह नमाज़ के स्थान अर्थात मस्जिद में जाने और वहां रुकने का भी अधिकार नहीं रखता बल्कि वह केवल मस्जिद के एक द्वार से प्रवेश करके दूसरे द्वार से बाहर निकल सकता है। चूंकि स्नान के लिए पवित्र व स्वच्छ जल की आवश्यकता होती है और संभवत: यात्रा में पानी न मिले या मनुष्य बीमार हो और उसके लिए स्नान करना हानिकारक हो अत: ईश्वर ने मिट्टी को पानी विकल्प बनाया है ताकि मनुष्य उस पर अपने हाथों और चेहरे का स्पर्श करके नमाज़ पढ़ सके। अलबत्ता यह मिट्टी पवित्र होनी चाहिये न अपवित्र। इस आयत से हमने सीखा कि नमाज़ केवल शब्दों और शरीर के हिलने का नाम नहीं है। नमाज़ केवल कुछ शब्दों को दोहराने और बैठने को नहीं कहते। नमाज़ की आत्मा, ईश्वर पर ध्यान रखना है जिसके लिए चेतना की आवश्यकता होती है। मस्जिद और उपासना स्थल पवित्र स्थान हैं अत: अपवित्र हालत में उसमें नहीं जाना चाहिये।शरीर तथा आत्मा की पवित्रता, ईश्वर के समक्ष जाने और उससे बात की भूमिका है। यात्रा अथवा बीमारी में नमाज़ का आदेश समाप्त नहीं होता हां स्थितियों के परिवर्तन के दृष्टिगत उसके आदेशों में कुछ छूट अवश्य दी गई है।