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    सूरए निसा; आयतें 44-47 (कार्यक्रम 130)

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    आइये पहले सूरए निसा की 44वीं और 45वीं आयतों की तिलावत सुनें।أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ أُوتُوا نَصِيبًا مِنَ الْكِتَابِ يَشْتَرُونَ الضَّلَالَةَ وَيُرِيدُونَ أَنْ تَضِلُّوا السَّبِيلَ (44) وَاللَّهُ أَعْلَمُ بِأَعْدَائِكُمْ وَكَفَى بِاللَّهِ وَلِيًّا وَكَفَى بِاللَّهِ نَصِيرًا (45)क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जिन्हें ईश्वरीय किताब का कुछ भाग दिया गया है, वे भथभ्रष्ठता मोल लेना चाहते हैं और तुम्हें भी पथभ्रष्ठ करना चाहते हैं। (4:44) (परंतु) जान लो कि ईश्वर तुम्हारे शत्रुओं को भली-भांति जानता है तथा ईश्वर की अभिभावकता और उसकी सहायता तुम्हारे लिए पर्याप्त है। (4:45)ये आयतें यहूदी जाति के विद्वानों के बारे में हैं जो इस्लाम के उदय के समय मदीने में थे परंतु उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम व क़ुरआन पर सबसे पहले ईमान लाने के स्थान पर आरंभ से ही विरोध और शत्रुता का मार्ग अपनाया और मक्के के अनेकिश्वरवादियों तक से सांठ गांठ कर ली। ये आयतें याद दिलाती हैं कि ईश्वरीय किताब के ज्ञानी यद्यपि ईश्वर के कथनों से परिचित थे पंरतु उन्होंने उन कथनों को अपने और अन्य लोगों के मार्गदर्शन तथा कल्याण का साधन नहीं बनाया बल्कि दूसरों को पथभ्रष्ठ करने और उनके ईमान में बाधा डालने का प्रयास करने लगे। इसके पश्चात ईश्वर मुसलमानों को संबोधित करते हुए कहता है कि तुम लोग उनकी शत्रुता से मत डरो क्योंकि वे ईश्वर की शक्ति और उसके शासन से बाहर नहीं हैं और तुम्हें भी ईश्वरीय सहायता प्राप्त है।इन आयतों से हमने सीखा कि केवल ईश्वरीय किताब और ईश्वरीय आदेशों की पहचान कल्याण का साधन नहीं है। ऐसे कितने धार्मिक विद्वान हैं जो स्वयं भी पथभ्रष्ठ हैं और दूसरों को पथभ्रष्ठ करते हैं। कल्याण के लिए पवित्र आत्मा और सत्य की खोज में रहने की भावना की आवश्यकता होती है।इस्लामी समाज के वास्तविक शत्रु धर्म और जनता के विचारों के शत्रु हैं चाहे वह भीतर हों या बाहर।उन्हीं लोगों को ईश्वरीय सहायता प्राप्त होती है जो ईश्वर की शक्ति में आस्था रखते हैं अपनी व दूसरों की सांसारिक शक्ति पर भरोसा करने वालों को ईश्वरीय सहायता नहीं मिलती। आइये अब सूरए निसा की 46वीं आयत की तिलावत सुनें।مِنَ الَّذِينَ هَادُوا يُحَرِّفُونَ الْكَلِمَ عَنْ مَوَاضِعِهِ وَيَقُولُونَ سَمِعْنَا وَعَصَيْنَا وَاسْمَعْ غَيْرَ مُسْمَعٍ وَرَاعِنَا لَيًّا بِأَلْسِنَتِهِمْ وَطَعْنًا فِي الدِّينِ وَلَوْ أَنَّهُمْ قَالُوا سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا وَاسْمَعْ وَانْظُرْنَا لَكَانَ خَيْرًا لَهُمْ وَأَقْوَمَ وَلَكِنْ لَعَنَهُمُ اللَّهُ بِكُفْرِهِمْ فَلَا يُؤْمِنُونَ إِلَّا قَلِيلًا (46)यहूदियों में वे लोग भी हैं जो ईश्वरीय कथनों में फेर-बदल कर देते हैं और हमने सुना तथा अनुसरण किया कहने के स्थान पर कहते हैं हमने सुना और अवज्ञा की। वे अनादर के साथ पैग़म्बर से कहते हैं सुनो कि तुम्हारी बात कदापि न सुनी जाये और हमारी ओर ध्यान दो। ये सब ज़बान तोड़-मरोड़ कर ईश्वर के धर्म पर चोट करते हुए कहते हैं और यदि वे कहते कि हमने सुना और अनुसरण किया तथा आप भी सुनिये और हमें भी समय दीजिये ताकि हम वास्तविकताओं को बेहतर ढंग से समझ सकें तो यह उनके लिए बेहतर और सही बात के समीप होता परंतु ईश्वर ने उनके कुफ़्र के कारण उन पर लानत की है तो वे ईमान नहीं लाएंगे सिवाए थोड़े से लोगों के। (4:46)इस्लाम के विरोधियों की एक बुरी पद्धति उपहास व हीन समझने की थी। इस आयत में उनमें से कुछ की ओर संकेत किया गया है। स्पष्ट है कि जो लोग इन पद्धतियों का प्रयोग करते हैं उनमें इस्लाम के तर्क का मुक़ाबला करने की क्षमता नहीं है और वे केवल अपने द्वेष को प्रकट करना चाहते हैं जैसाकि इस आयत में कहा गया है कि कुछ यहूदी अनुचित शब्दों का प्रयोग करके तथा तान देते हुए पैग़म्बरे इस्लाम से कहते थे। आप कहते रहिये परंतु हम नहीं सुनेंगे। हम कहते रहें आप भी न सुनें क्योंकि जो कुछ आप कहते हैं वह हमें मूर्ख बनाने के लिए है अत: हम उसे नहीं मानेंगे।वे बहुअर्थीय शब्दों का भी प्रयोग करते थे। जब कभी पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम लोगों को ईश्वरीय कथन सुनाते थे तो वे कहते थे हे पैग़म्बर राएना अर्थात हमें थोड़ा समय दीजिये ताकि हम आपकी बातों को भली-भांति सुनकर याद रख सकें परंतु यहूदी यह शब्द पैग़म्बर के लिए प्रयोग करते थे जिसका दूसरा अर्थ मूर्ख या चरवाहा है।इसी कारण ईश्वर उन्हें और अन्य मुसलमानों को संबोधित करते हुए कहता है हे पैग़म्बर राएना के स्थान पर उन्ज़ुरना शब्द का प्रयोग करो जिसका अर्थ समय देना है तथा इसका कोई दूसरा बुरा अर्थ भी नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि अपने विरोधियों के साथ व्यवहार में भी न्याय करना चाहिये। यह आयत सभी यहूदियों को बुरा भला नहीं कहती बल्कि कहती है कुछ यहूदी ऐसा करते हैं। इसलिए कुछ लोगों के पाप को सभी के सिर नहीं मढ़ा जा सकता।धार्मिक पवित्रताओं का अनादर ठीक नहीं है चाहे वह धर्मगुरूओं का अनादर हो या धार्मिक आदेश का।मनुष्य की भलाई और उसका कल्याण, पैग़म्बरों के निमंत्रण को स्वीकार करने और धार्मिक आदेशों के पालन में है।आइये अब सूरए निसा की 47वीं आयत की तिलावत सुनें।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ آَمِنُوا بِمَا نَزَّلْنَا مُصَدِّقًا لِمَا مَعَكُمْ مِنْ قَبْلِ أَنْ نَطْمِسَ وُجُوهًا فَنَرُدَّهَا عَلَى أَدْبَارِهَا أَوْ نَلْعَنَهُمْ كَمَا لَعَنَّا أَصْحَابَ السَّبْتِ وَكَانَ أَمْرُ اللَّهِ مَفْعُولًا (47)हे आसमानी किताब दिये जाने वाले लोगो! उस चीज़ पर ईमान ले आओ जिसे हमने (पैग़म्बरे इस्लाम पर) उतारा है और जो तुम्हारी किताबों की भी पुष्टि करने वाला है इससे पूर्व कि हम चेहरों को बिगाड़ कर उन्हें पीछे की ओर फेर दें या उन पर इस प्रकार लानत भेजें जिस प्रकार हमने असहाबे सब्त अर्थात शनिवार वालों पर लानत भेजी है और ईश्वर का आदेश तो होकर ही रहेगा। (4:47)पिछली आयतों में आसमानी किताब वालों विशेषकर यहूदियों को संबोधित करने के पश्चात ईश्वर इस आयत में उनसे कहता है तुम लोग जो आसमानी किताब से अवगत हो, इस्लाम स्वीकार करने के लिए अधिक उपयुक्त हो और वह भी ऐसा इस्लाम जिसकी किताब तुम्हारी किताब से समन्वित और ईश्वर की ओर से है। इसके पश्चात ईश्वर एक महत्वपूर्ण सिद्धांत की ओर संकेत करते हुए कहता है जब तुम हठ और द्वेष के चलते वास्तविकता का इंकार करते हो और उसका मज़ाक उड़ाते हो तो तुम उसकी प्रवृत्ति तथा अपने विचारों को बदल देते हो और धीरे-2 तुम्हारा मानवीय चेहरा मिट जाता है। चूंकि मनुष्य की इंद्रियां और उसके अधिकतर संवेदनशील अंग उसके चेहरे तथा सिर में होते हैं, इसी कारण क़ुरआने मजीद ने वास्तविकताओं को समझने और उन्हें प्राप्त करने से मनुष्य की वंचितता को उसका चेहरा बिगड़ने और मिटने के समान बताया है कि जो पथभ्रष्ठता और पतन की ओर पलटने के अर्थ में है। जी हां जब ज़बान धर्म की वास्तविकता को मानने से इंकार कर दे तो आंख, कान और मस्तिष्क भी पथभ्रष्ठ होकर वास्तविकता को उल्टा देखने लगते हैं ठीक उस आंख की भांति जो काले चश्मे के पीछे से दिन को भी अंधकारमय देखती है।यह आयत इसी प्रकार कुछ यहूदियों द्वारा शनिवार को मछली का शिकार न करने के ईश्वरीय आदेश के उल्लंघन की ओर संकेत करते हुए कहती है” जिस प्रकार वे लोग ईश्वरीय आदेश का उपहास करने के कारण सांसारिक दंड में ग्रस्त और रूप तथा चरित्र में बंदर समान हो गये उसी प्रकार तुम लोग भी क़ुरआन की आयतों की उपहास के कारण अपमानित और तबाह हो जाओगे।इस आयत से हमने सीखा कि दूसरों को इस्लाम का निमंत्रण देते समय हमें उनकी भलाइयों और विशेषताओं को भी स्वीकार करना चाहिये तथा उनकी पुष्टि करनी चाहिये।सभी धर्मों के मूल सिद्धांत तथा पैग़म्बरों की शिक्षाएं और कार्यक्रम समन्वित व एक दिशा में हैं।इस्लाम अन्य एकेश्वरवादी धर्मों के अनुयाइयों को ईमान में प्रगति और इस्लाम स्वीकार करने का निमंत्रण देता है।संसार में ईश्वरीय कोप का एक कारण धार्मिक वास्तविकताओं का परिहास करना है।