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    सूरए निसा; आयतें 48-52 (कार्यक्रम 131)

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    आइये पहले सूरए निसा की 48वीं आयत की तिलावत सुनें।إِنَّ اللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَنْ يُشْرَكَ بِهِ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَلِكَ لِمَنْ يَشَاءُ وَمَنْ يُشْرِكْ بِاللَّهِ فَقَدِ افْتَرَى إِثْمًا عَظِيمًا (48)नि:संदेह ईश्वर अपने साथ किसी को समकक्ष या शरीक ठहराये जाने को क्षमा नहीं करेगा पंरतु इसके अतिरिक्त जो पाप होगा उसे जिसे वह चाहेगा उसके लिए क्षमा कर देगा और जिसने भी किसी को ईश्वर का भागीदार ठहराया निश्चित रूप से उसने बहुत बड़ा पाप किया। (4:48)पिछली आयतों में यहूदियों और ईसाइयों जैसे आसमानी किताब वालों को संबोधित करने के पश्चात इस आयत में ईश्वर उन्हें और इसी प्रकार मुसलमानों को हर प्रकार के ऐसे विचार और कर्म से रोकता है जिसका परिणाम किसी को ईश्वर का शरीक ठहराना और एकेश्वरवाद से दूरी हो।आयत कहती है कि यद्यपि ईश्वर अत्यंत क्षमाशील और दयावान है पंरतु किसी को उसके समकक्ष ठहराने का पाप क्षमा योग्य नहीं है क्योंकि यह ईमान के आधार को ढ़ा देता है। अलबत्ता इस आयत में ईश्वरीय क्षमा का तात्पर्य बिना तौबा के पापों को क्षमा करना है। अर्थात ईश्वर जिस किसी को उपयुक्त समझेगा उसके अन्य पापों को क्षमा कर देगा चाहे उसने तौबा न की हो परंतु ईश्वर के समकक्ष ठहराने का पाप ऐसा नहीं है और जब तक इसका पापी तौबा न कर सके और ईमान न लाए उसे ईश्वरीय क्षमा प्राप्त नहीं हो सकती। पैग़म्बरे इस्लाम और उनके परिजनों के कथनों में आया है कि यह आयत ईमान वालों के लिए क़ुरआन की सबसे आशादायी आयत है क्योंकि इसके कारण पापी लोग चाहे उनका पाप कितना ही बड़ा क्यों न हो ईश्वरीय दया की ओर से निराश नहीं होते बल्कि इस आयत से उन्हें ईश्वरीय क्षमा की आशा मिलती है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर के समकक्ष ठहराने का पाप ईश्वरीय दया में बाधा बनता है और उसका पापी स्वयं को ईश्वरीय दया से वंचित कर लेता है।सबसे बड़ा झूठ किसी भी रूप में किसी को ईश्वर का समकक्ष ठहराना है।आइये अब सूरए निसा 49वीं और 50वीं आयतों की तिलावत सुनें।أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ يُزَكُّونَ أَنْفُسَهُمْ بَلِ اللَّهُ يُزَكِّي مَنْ يَشَاءُ وَلَا يُظْلَمُونَ فَتِيلًا (49) انْظُرْ كَيْفَ يَفْتَرُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ وَكَفَى بِهِ إِثْمًا مُبِينًا (50)क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जो अपनी पवित्रता का दम भरते हैं बल्कि ईश्वर ही जिसे चाहता है पवित्रता प्रदान करता है और उन पर बाल बराबर भी अत्याचार नहीं होगा। (4:49) देखो कि वे लोग किस प्रकार ईश्वर पर झूठ बांधते हैं और यही उनके खुले पाप के लिए काफ़ी है। (4:50)यह आयत भी ईश्वरीय किताब रखने वालों तथा मुसलमानों को हर प्रकार की विशिष्टता और श्रेष्ठता प्राप्ति से रोकते हुए कहती है क्यों तुम दूसरे को दोषी और स्वयं को पवित्र व भला कहते हो?क्यों तुम सदैव अपने आपकी सराहना करते हो और स्वयं को हर बुराई से पवित्र मानते हो? जबकि यह तो ईश्वर है जो तुम्हारे अंदर की बातों को जानता है और उसे पता है कि तुम में से कौन सराहना के योग्य है। वही तो लोगों के कर्मो के आधार पर उन्हें बुराइयों से पवित्र करता है। दूसरे शब्दों में वास्तविक श्रेष्ठता वह है जिसे ईश्वर श्रेष्ठता माने न वह कि जिसे घमंडी और स्वार्थी लोग अपनी उत्कृष्टता का कारण मानते हैं। यहां तक कि वे इसे ईश्वर से संबंधित कर देते हैं कि जो स्वयं बहुत बड़ा झूठ है।उपासना के कारण धर्म का पालन करने वाले कुछ लोगों में जो घमंड पैदा हो जाता है वह ईश्वरीय धर्म वालों के लिए एक बड़ा ख़तरा है क्योंकि अन्य धर्मों से इस्लाम के श्रेष्ठ होने का अर्थ हर मुसलमान का अन्य लोगों से श्रेष्ठ होना नहीं है। इसी कारण इस आयत और कई अन्य आयतों में धार्मिक अंह या घमंड की बात करते हुए ईमान वालों को सचेत किया गया है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने एक भाषण में कहते हैं ईश्वर से सच्चे अर्थों में भय रखने वाले वे लोग हैं कि जब कभी उनकी सराहना की जाती है तो वे भयभीत हो जाते हैं। वे न केवल यह कि स्वयं अपनी सराहना नहीं करते बल्कि यदि दूसरे उनको सराहते हैं तो वे घमंड में फंसने से भयभीत हो जाते हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि मज़ा तो इसमें है कि मनुष्य ईश्वर की सराहना करे न यह कि मनुष्य अपने मुंह मियां मिट्ठू बने। अपनी सराहना की भावना घमंडी और अहंकारी आत्मा की भावना है और यह ईश्वर की बंदगी की भावना से मेल नहीं खाती।ईश्वर से स्वयं के सामीप्य का दावा ईश्वर पर सबसे बड़ा झूठ है और इसका कड़ा दंड होगा।आइये अब सूरए निसा की 51वीं और 52वीं आयतों की तिलावत सुनें।أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ أُوتُوا نَصِيبًا مِنَ الْكِتَابِ يُؤْمِنُونَ بِالْجِبْتِ وَالطَّاغُوتِ وَيَقُولُونَ لِلَّذِينَ كَفَرُوا هَؤُلَاءِ أَهْدَى مِنَ الَّذِينَ آَمَنُوا سَبِيلًا (51) أُولَئِكَ الَّذِينَ لَعَنَهُمُ اللَّهُ وَمَنْ يَلْعَنِ اللَّهُ فَلَنْ تَجِدَ لَهُ نَصِيرًا (52)क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जिन्हें ईश्वरीय किताब के ज्ञान का कुछ भाग दिया गया था, कि किस प्रकार वे मूर्तियों और मूर्तिपूजा करने वालों पर ईमान लाये और काफ़िरों के बारे में कहने लगे कि ये लोग इस्लाम लाने वालों से अधिक मार्गदर्शित हैं। (4:51) यही वे लोग हैं जिन पर इस्लाम ने लानत (धिक्कार) की है और जिस पर भी ईश्वर लानत करे उसके लिए तुम्हें कदापि कोई सहायक नहीं मिलेगा। (4:52)जैसा कि इस्लामी इतिहास में वर्णित है कि ओहोद के युद्ध के पश्चात मदीने के यहूदियों का एक गुट मक्के के अनेकेश्वरवादियों के पास गया ताकि मुसलमानों के विरुद्ध उनसे सहयोग करे। उस गुट ने अनेकेश्वरवादियों को प्रसन्न करने के लिए उनकी मूर्तियों के समक्ष सज्दा किया और कहा कि तुम्हारी मूर्तिपूजा मुसलमानों के ईमान से बेहतर है। यद्यपि यहूदियों ने पैग़म्बरे इस्लाम से समझौता किया था कि वे मुसलमानों के विरुद्ध कोई षड्यंत्र नहीं करेंगे परंतु उन्होंने अपने इस समझौते को तोड़ दिया और मुसलमानों के विरुद्ध क़ुरैश के सरदारों के साथ हो गये। यह बात अपने ग़लत उद्देश्यों की पूर्ति के लिए यहूदियों की षड्यंत्रकारी प्रवृत्ति को दर्शाती है। यद्यपि उन्हें आसमानी किताब का ज्ञान था परंतु उन्होंने अनेकेश्वरवादियों के भ्रष्ठ विश्वासों को इस्लाम पर वरीयता दी, यहां तक कि वे अनेकेश्वरवादियों की सहायता करके इस्लाम के विरुद्ध युद्ध करने के लिए भी तैयार हो गये। यही बड़ा पाप ईश्वर द्वारा उन पर लानत व धिक्कार और उनके ईश्वरीय दया से दूर होने का कारण बना।इन आयतों से हमने सीखा कि यहूदी इस्लाम का मुक़ाबला करने के लिए अधर्मी काफ़िरों से भी समझौता कर सकते हैं। अत: हमें उनके प्रति सचेत रहना चाहिये।द्वेष व शत्रुता की भावना मनुष्य की आंख, कान और ज़बान को सत्य देखने, सुनने और कहने से रोकती है। जो लोग इस्लाम का विरोध करते हैं वह इस कारण नहीं है कि इस्लाम बुरा है नहीं बल्कि इस कारण है कि इस्लाम उनके सांसारिक हितों की पूर्ति में बाधा है।मनुष्य का वास्तविक सहायक, ईश्वर है और जो कोई अपने कर्मों द्वारा ईश्वरीय दया को स्वयं से दूर कर लेता है, वह वास्तव में अपने सहायक को दूर कर लेता है।