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    सूरए निसा; आयतें 53-57 (कार्यक्रम 132)

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    आइये पहले सूरए निसा की 53वीं, 54वीं और 55वीं आयतों की तिलावतों की सुनें।أَمْ لَهُمْ نَصِيبٌ مِنَ الْمُلْكِ فَإِذًا لَا يُؤْتُونَ النَّاسَ نَقِيرًا (53) أَمْ يَحْسُدُونَ النَّاسَ عَلَى مَا آَتَاهُمُ اللَّهُ مِنْ فَضْلِهِ فَقَدْ آَتَيْنَا آَلَ إِبْرَاهِيمَ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَآَتَيْنَاهُمْ مُلْكًا عَظِيمًا (54) فَمِنْهُمْ مَنْ آَمَنَ بِهِ وَمِنْهُمْ مَنْ صَدَّ عَنْهُ وَكَفَى بِجَهَنَّمَ سَعِيرًا (55)क्या यहूदियों का यह विचार है कि उन्हें सत्ता में भाग प्राप्त हो जायेगा कि यदि ऐसा हुआ तो वे किसी को थोड़ा सा भी नहीं देंगे। (4:53) या यह कि वे मुसलमानों से जो कुछ ईश्वर ने उन्हें अपनी कृपा से दिया है, उसके कारण ईर्ष्या करते हैं। नि:संदेह हमने इब्राहिम के परिवार को किताब व तत्वदर्शिता दी है और उन्हें महान सत्ता प्रदान की है। (4:54) तो उनमें से कुछ ऐसे थे जो ईमान लाये और कुछ अन्य न केवल यह कि ईमान नहीं लाए बल्कि दूसरों के ईमान लाने में बाधा बने और उनके दंड के लिए नरक की धधकती हुई ज्वालाएं काफ़ी हैं। (4:55)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि यहूदियों ने मदीने के मुसलमानों पर विजय प्राप्त करने के लिए मक्के के अनेकेश्वरवादियों से सहायता चाही और उनके साथ सांठ गांठ के लिए तैयार हो गये। ये आयतें उन्हें संबोधित करते हुए कहती हैं क्या तुम लोग सत्ता और शासन प्राप्त करने की आशा में यह काम कर रहे हो जबकि तुम में इस पद और स्थान की योग्यता नहीं है क्योंकि विशिष्टता, प्रेम और सत्तालोलुपता की भावना तुममें इतनी अधिक है कि यदि तुम्हें सत्ता और शासन प्राप्त हो जाये तो तुम किसी को कोई अधिकार नहीं दोगे और सारी विशिष्टताएं केवल अपने लिए रखोगे।इसके अतिरिक्त तुम मुसलमानों के शासन को क्यों सहन नहीं कर सकते और उनसे ईर्ष्या करते हो? क्या ईश्वर ने इससे पहले के पैग़म्बरों को, जो हज़रत इब्राहिम के वंश से थे, शासन नहीं दिया है जो यह तुम्हारे लिए अचरज की बात है? क्या ईश्वर हज़रत मूसा, सुलैमान और दावूद को आसमानी किताब और शासन नहीं दे चुका है जो तुम आज पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम और मुसलमानों को आसमानी किताब और शासन मिलने के कारण उनसे ईर्ष्या करते हो? यहां तक कि ग़लत फ़ैसला करके अनेकेश्वरवादियों को मुसलमानों से बेहतर बताते हो?इसके पश्चात क़ुरआन मजीद मुसलमानों को संबोधित करते हुए कहता है। यह बात दृष्टिगत रहे कि उस समय के लोगों में भी कुछ ईमान लाये और कुछ ने विरोध किया। तो तुम भी इस बात से निराश मत हो कि यहूदी इस्लाम नहीं लाते और ईर्ष्या करते हैं और जान लो कि अतीत में भी ऐसा होता रहा है।इन आयतों से हमने सीखा कि हमें अपने शत्रु को पहचानना और अपनी धार्मिक स्थिति को सुदृढ़ व सुरक्षित रखना चाहिये। यदि वे सत्ता में आ गये तो हमें अनदेखा कर देंगे।कंजूसी, संकीर्ण दृष्टि और अन्यायपूर्ण फ़ैसले, भौतिकवाद और सत्तालोलुपता की निशानियां हैं।दूसरों के पास जो कुछ है वह ईश्वर की कृपा से है और जो कोई ईर्ष्या करता है वो वास्तव में ईश्वर की इच्छा पर आपत्ति करता है दूसरों की अनुकम्पाओं की समाप्ति की कामना करने के बजाये ईश्वर की दया व कृपा की आशा रखनी चाहिये। सभी लोगों द्वारा ईमान लाने की आशा एक ग़लत आशा है। ईश्वर ने लोगों को मार्ग के चयन में स्वतंत्र रखा है।आइये अब सूरए निसा की 56वीं आयत की तिलावत सुनें।إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا بِآَيَاتِنَا سَوْفَ نُصْلِيهِمْ نَارًا كُلَّمَا نَضِجَتْ جُلُودُهُمْ بَدَّلْنَاهُمْ جُلُودًا غَيْرَهَا لِيَذُوقُوا الْعَذَابَ إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَزِيزًا حَكِيمًا (56)निसंदेह जिन लोगों ने हमारी निशानियों का इंकार किया हम शीघ्र ही उन्हें नरक में डाल देंगे जहां उनकी जितनी खाल जलेगी उसके स्थान पर हम दूसरी खाल ले आयेंगे ताकि वे कड़े दंड का स्वाद चख सकें। निसंदेह ईश्वर प्रभुत्वशाली और तत्वदर्शी है। (4:56)पिछली आयतों के पश्चात कि जो पैग़म्बरों और उनकी ईश्वरीय शिक्षाओं के प्रति कुछ लोगों के द्वेष व हठ को स्पष्ट करती थीं यह आयत प्रलय में उनको मिलने वाले कड़े दंड की ओर संकेत करती है जो उनके कर्मो के अनुकूल होंगे क्योंकि जो कोई जीवन भर सच के सामने डटा रहा और हर क्षण अपने द्वेष व शत्रुता में वृद्धि करता रहा वह स्थाई दंड पाने के योग्य है। इसी कारण यह आयत कहती है कि अवज्ञाकारी और पथभ्रष्ठ यह न सोचें कि प्रलय में एक बार दंडित किये जाने के पश्चात उन्हें दंड नहीं दिया जायेगा, नहीं बल्कि उन्हें निरंतर दंड दिया जाता रहेगा और उनकी जली हुई खाल नई खाल में परिवर्तित हो जायेगी और उन्हें नया दर्द तथा नया दंड मिलता रहेगा।इस आयत से हमने सीखा कि प्रलय में दण्ड की निरंतरता उसकी पीड़ा में कमी का कारण नहीं बनेगी।प्रलय आत्मिक नहीं शारीरिक होगा अर्थात केवल लोगों की आत्मा नहीं बल्कि उनके शरीर व खाल पर दंड दिया जायेगा।ईश्वरीय दंड हमारे कर्मों के आधार पर हैं न यह कि ईश्वर अपने बंदों पर अत्याचार करता है क्योंकि वह तत्वदर्शी है और तत्वदर्शिता के आधार पर अपने बंदों के साथ व्यवहार करता है।आइये अब सूरए निसा 57वीं आयत की तिलावत सुनें।وَالَّذِينَ آَمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ سَنُدْخِلُهُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا أَبَدًا لَهُمْ فِيهَا أَزْوَاجٌ مُطَهَّرَةٌ وَنُدْخِلُهُمْ ظِلًّا ظَلِيلًا (57)और जो लोग ईमान लाए और भले कर्म करते रहे हम शीघ्र ही उन्हें ऐसे बाग़ों में प्रविष्ट कर देंगे जिनके नीचे से नहरें बह रही होंगी, जहां वे सदैव रहेंगे वहां उनके लिए पवित्र पत्नियां होंगी और हम उन्हें स्थायी छाया वाले स्वर्ग में प्रविष्ट कर देंगे। (4:57)प्रलय में काफ़िरों को मिलने वाले कड़े दंड का उल्लेख करने के पश्चात इस आयत में ईश्वर ईमान वालों को मिलने वाले महान पारितोषिक की ओर संकेत करते हुए कहता है कि यदि ईश्वर पर ईमान और आस्था के साथ ही भले कर्म किये गये तो प्रलय मंए ऐसे लोगों को बहुत अच्छा स्थान प्राप्त होगा और ईश्वर ने उनके लिए घने पड़ों वाले स्वर्ग को तैयार कर रखा है जिनकी छाया स्थायी होगी।वे प्रलय में अकेले नहीं होंगे बल्कि पवित्र पत्नियां उनके साथ होंगी ताकि वे पूर्ण रूप से प्रसन्न रह सकें। ये ऐसे लोग होंगे जिन्होंने संसार में अनेक आनंदों को छोड़ दिया होगा और अपवित्र वस्तुओं तथा बातों को स्वयं के लिए वर्जित कर दिया होगा। इस आयत से हमने सीखा कि यद्यपि मनुष्य मार्ग के चयन में स्वतंत्र है परंतु कर्मों के परिणाम स्वाभाविक हैं न कि चयनित। कुफ़्र का परिणाम दंड होगा तथा ईमान का परिणाम शांति व सुरक्षा।पवित्रता हर स्त्री व पुरुष के लिए एक मान्यता है। इसी कारण ईश्वर ने स्वर्ग की पत्नियों के वर्णन में उनके लिए सुन्दरता के स्थान पर पवित्रता पर बल दिया है।