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    सूरए निसा; आयतें 58-59 (कार्यक्रम 133)

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    आइये पहले सूरए निसा की 58वीं आयत की तिलावत सुनें।إِنَّ اللَّهَ يَأْمُرُكُمْ أَنْ تُؤَدُّوا الْأَمَانَاتِ إِلَى أَهْلِهَا وَإِذَا حَكَمْتُمْ بَيْنَ النَّاسِ أَنْ تَحْكُمُوا بِالْعَدْلِ إِنَّ اللَّهَ نِعِمَّا يَعِظُكُمْ بِهِ إِنَّ اللَّهَ كَانَ سَمِيعًا بَصِيرًا (58)नि:संदेह ईश्वर तुम्हें आदेश देता है कि अमानतों को उनके मालिकों को लौटा दो और जब कभी लोगों के बीच फ़ैसला करो तो न्याय से फ़ैसला करो, नि:संदेह ईश्वर तुम्हें अच्छे उपदेश देता है, निश्चित रूप से वह सुनने और देखने वाला भी है। (4:58)उन लोगों की कल्पना के विरुद्ध, जो धर्म को एक व्यक्तिगत मामला और अपने तथा ईश्वर के बीच संपर्क समझते हैं, ईश्वरीय धर्मों विशेषकर इस्लाम ने अपनी आसमानी शिक्षाओं को व्यक्ति व समाज के कल्याण के लिए पेश किया है। यहां तक कि ईमान और धर्म के पालन के लिए समाज में न्याय और अमानतदारी को शर्त बताया गया है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम एवं उनके परिजनों के कथनों में आया है कि लोगों के लम्बे-2 सज्दों और रूकू को न देखो बल्कि उनकी सच्चाई और अमानतदारी को देखो क्योंकि अमानत में विश्वासघात, मिथ्या और दोमुंहेपन की निशानी है। अलबत्ता यहां यह बात ध्यान में रहे कि अमानत का अर्थ बहुत व्यापक है और इसमें ज्ञान, धन और परिवार जैसी सभी प्रकार की अमानतें शामिल हैं बल्कि पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों के कथनों के अनुसार समाज का नेतृत्व भी एक ईश्वरीय अमानत है जिसे सही हाथों में सौंपने के लिए जनता को अत्यधिक ध्यान देना चाहिये। कहा जा सकता है कि समाज के कल्याण की चाबी भले व न्यायप्रेमी लोगों का सत्ता में होना है जिस प्रकार से अधिकांश सामाजिक बुराइयों व समस्याओं का कारण अयोग्य लोगों का सत्ता में होना और उनका अत्याचारपूर्ण व्यवहार है।मनुष्य के हाथों में जो अमानते हैं वे तीन प्रकार की हैं। एक मनुष्य और ईश्वर के बीच की अमानत है अर्थात ईश्वरीय आदेशों का पालन। यह ऐसी अमानत है जो मनुष्य के ज़िम्मे है। दूसरी वह अमानतें हैं जो मनुष्य एक दूसरे के पास रखते हैं तथा उनमें कण भर भी कमी किये बिना उनके मालिकों को लौटा देना चाहिये। तीसरी वे अमानतें हैं जो मनुष्य और स्वयं उसी के बीच मौजूद हैं जैसे आयु, शक्ति, शारीरिक व आत्मिक योग्यता इत्यादि। धर्म की दृष्टि से ये सारी बातें हमारे पास अमानत हैं और हम स्वयं अपने मालिक तक नहीं हैं बल्कि इन अंगों के अमानतदार हैं और हमें इन्हें इनके वास्तविक मालिक अर्थात ईश्वर की प्रसन्नता के मार्ग में बेहतरीन ढंग से प्रयोग करना चाहिये।हर अमानत का कोई मालिक होता है और अमानत को उसी के हवाले करना चाहिये। सत्ता, शासन और न्याय जैसी सामाजिक अमानतों को अयोग्य लोगों के हाथों में देना ईमान से मेल नहीं खाता।अमानत को उसके मालिक तक पहुंचाना चाहिये, चाहे वह काफ़िर हो या ईमान वाला। अमानत हवाले करने में उसके मालिक के काफ़िर या मोमिन होने की शर्त नहीं है।केवल क़ाज़ी अर्थात पंच या न्यायाधीश को ही न्यायप्रेमी नहीं होना चाहिये बल्कि सभी ईमान वालों को पारिवारिक और सामाजिक मामलों में फ़ैसला करते समय न्याय से काम लेना चाहिये।अमानत की रक्षा और न्याय के पालन में ईश्वर को उपस्थित और साक्षी मानना चाहिये। क्योंकि वह सुनने और देखने वाला है।मनुष्य को सदैव उपदेश की आवश्यकता रहती है और सबसे अच्छा उपदेशक दयावान ईश्वर है।आइये अब सूरए निसा की 59वीं आयत की तिलावत सुनें।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا أَطِيعُوا اللَّهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ وَأُولِي الْأَمْرِ مِنْكُمْ فَإِنْ تَنَازَعْتُمْ فِي شَيْءٍ فَرُدُّوهُ إِلَى اللَّهِ وَالرَّسُولِ إِنْ كُنْتُمْ تُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآَخِرِ ذَلِكَ خَيْرٌ وَأَحْسَنُ تَأْوِيلًا (59)हे ईमान वालो! ईश्वर का आज्ञापालन करो तथा पैग़म्बर और स्वयं तुम में से ईश्वर द्वारा निर्धारित लोगों की आज्ञा का पालन करो। यदि किसी बात में तुममें विवाद हो जाये तो उसे ईश्वर की किताब और पैग़म्बर की ओर पलटाओ, यदि तुम ईश्वर और प्रलय पर ईमान रखते हो। नि:संदेह विवादों को समाप्त करने के लिए यह पद्धति बेहतर है और इसका अंत अधिक भला है। (4:59)पिछली आयत में हमने कहा कि इस बात की सिफारिश की गई है कि शासन और न्याय का मामला योग्य और न्यायप्रेमी लोगों के हवाले करना चाहिये। यह आयत ईमान वालों से कहती है कि ईश्वर और उसके पैग़म्बर के अतिरिक्त उन न्यायप्रेमी मार्गदर्शकों का भी आज्ञापालन करो जिन्होंने समाज का मामला अपने हाथ में लिया है और उनका अनुसरण व आज्ञापालन ईश्वर तथा प्रलय पर ईमान की शर्त है।इतिहास में वर्णित है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने तबूक नामक युद्ध के लिए जाते हज़रत अली अलैहिस्सलाम को मदीने में अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया और कहा कि हे अली! तुम मेरे लिए वैसे ही हो जैसे मूसा के लिए हारून थे सिवाय इसके कि मेरे पश्चात कोई नबी या ईश्वरीय पैग़म्बर नहीं है। उसी के पश्चात ईश्वर की ओर से यह आयत उतरी और हमने लोगों को हज़रत अली अलैहिस्सलाम के आज्ञा पालन का आदेश दिया।चूंकि संभव है कि कुछ लोग उलुलअम्र या ईश्वरीय अधिकार रखने वालों की विशेषताओं के निर्धारण या उन्हें पहचानने में मतभेद कर बैठें अत: आगे चलकर आयत कहती है कि ऐसी स्थिति में तुम्हें ईश्वर की किताब और पैग़म्बर के चरित्र तथा उनकी परंपरा को देखना चाहिये कि यह दोनों तुम्हारे लिए सबसे अच्छे पंच हैं और उनके निर्णय पर चलने से सबसे अच्छा अंत होगा।अलबत्ता स्पष्ट है कि पैग़म्बर और ईश्वरीय अधिकार रखने वालों का आज्ञापालन, ईश्वर के आज्ञापालन के परिप्रेक्ष्य में है और यह एकेश्वरवाद के विरुद्ध नहीं है क्योंकि हम ईश्वर के आदेश पर पैग़म्बर और ईश्वरीय अधिकार रखने वाले के आदेशों का आज्ञापालन करते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि इस आयत में पैग़म्बर और ईश्वरीय अधिकार रखने वालों का आज्ञापालन बिना किसी शर्त के आया है जो यह स्पष्ट करता है कि यह लोग पाप और ग़लती से दूर अर्थात मासूम हैं।पैग़म्बर के दो पद और स्थान थे एक ईश्वरीय आदेशों का वर्णन अर्थात जनता तक उसका संदेश पहुंचाना और दूसरे समाज में शासन स्थापित करना और समाज की विशेष आवश्यकताओं के आधार पर शासन के आदेशों का वर्णन।लोगों को इस्लामी व्यवस्था को स्वीकार करना चाहिये तथा उसके न्यायप्रेमी नेताओं का अनुसरण व समर्थन करना चाहिये। विभिन्न इस्लामी समुदायों के बीच विवाद और मतभेद के समाधान का सबसे अच्छा मार्ग, ईश्वरीय किताब कुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम की परंपरा से संपर्क है जिसे सभी मुसलमान स्वीकार करते हैं। जो लोग मुसलमानों के बीच मतभेद उत्पन्न करना चाहते हैं उन्हें अपने ईमान पर संदेह करना चाहिये। मतभेदों को हवा देने के स्थान पर उन्हें समाप्त करने के लिए मार्ग खोजने के प्रयास में रहना चाहिये।